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स्त्रियों के रोग कारण एवं उपचार

लेटेस्ट जानकारी में आप सभी का स्वागत है आज आपको स्त्रियों के रोग के कारण एवं घरेलू उपचार बताएंगे इस पोस्ट के माध्यम से यह जानना बहुत ही दिलचस्प होगा स्त्रियों के रोग मर्दों के रोग के मुकाबले थोड़ा अलग होता है आज उन्हीं रोगों में से दो रोग के बारे में बताएंगे एक है श्वेत प्रदर और दूसरा रक्त प्रदर इस पोस्ट को पूरा आगे तक पढ़े आज आप जान पाएंगे कि क्या है इसके कारण और क्या हो इसका घरेलू इलाज वैसे हर कोई यही चाहता है कि वह रोग मुक्त लेकिन शरीर की बनावट ऐसी है और साथ में खानपान का ख्याल नहीं रख पाने के कारण कुछ रोग ऐसे होते हैं जो अनचाहा जन्म ले लेते हैं आज इस पोस्ट में जानिए श्वेत प्रदर एवं रक्त प्रदर का कैसे घरेलू उपचार से निपटा जाए अब आगे….

श्वेत प्रदर

कारण

स्त्रियों की योनि से सफ़ेद रंग का स्राव निकलना श्वेत प्रदर कहलाता हैं। योनि को नम रखने व संक्रमण से बचाने हेतु होने वाले स्वाभाविक स्राव से यह भिन्न होती हैं।

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यौनांगों की सफाई न रखने, किसी यौन रोग से संक्रमित पुरूष से यौन सम्बन्ध बनाने के कारण तथा हस्तमैथुन के कारण होने वाले संक्रमण से यह रोग हो जाता हैं। सिंथेटिक धागों से बने अन्तः वस्त्र भी इस रोग की उत्पत्ति में सहायक हैं।

लक्षण

योनि  से सफ़ेद रंग का स्राव निकलना श्वेत प्रदर रोग का मुख्य लक्षण हैं। यह स्राव दुर्गंधित भी हो सकता हैं और इससे योनि मार्ग में खुजली भी उत्पन्न हो सकती है।

घरेलू चिकित्सा

  • भुने हुए चनों का छिलका उतार कर केवल चनों का चूर्ण बना लें और सम भाग मिसरी मिला लें। यह चूर्ण एक – एक चमच्च की मात्रा में सुबह – शाम ठन्डे पानी से दें।
  • माजफूल 1 भाग व मिसरी दो भाग। इनका चूर्ण बना लें। इसकी 2 – 2 ग्राम दवा सुबह – शाम पानी के साथ दें।
  • किशमिश 10 ग्राम व भुने हुए चने की दाल 10 ग्राम मिलाकर सुबह – शाम लें।
  • एक – एक पका हुआ केला सुबह – शाम घी के साथ लें।
  • पिसा हुआ माजफूल 3 – 3 ग्राम की मात्रा में सुबह – शाम लें।
  • एक साबुत गोला (नारियल) लेकर उसके ऊपर की ओर से एक छोटा सा टुकडा काट दें, फिर उसमें पिसा हुआ कमरकस भर दें। काटा हुआ टुकड़ा वापस उसके स्थान पर रख कर पूरे गोले पर गुंधे हुए आटे का मोटा लेप कर दें। इसे उपलों की हल्की आंच में रख दें। जब आटा पककर लाल हो जाए, तो इसे निकाल लें। आटे को हटाकर, गोले के भार के बराबर मिसरी मिलाकर कूट लें। एक से दो चमच्च तक सुबह – शाम गाय के दूध के साथ खिलाएं। यह चूर्ण प्रदर के साथ – साथ शारीरिक कमजोरी को भी ख़त्म करता हैं।
  • गूलर का पका हुआ फल साबुत खाकर पानी पिएं।
  • अनार के पत्ते 20 ग्राम व सौंफ एक ग्राम में 5 काली मिर्च पानी के साथ पीसकर छानें और सुबह – शाम पिएं।
  • 1 चमच्च नीम का तेल एक कटोरी मिलाकर मिसरी मिले गाय के दूध से सुबह के समय रोगी को पिलाएं।
  • चौलाई की जड़ का चूर्ण आधा से एक चमच्च की मात्रा में चावलों के धोवन में या शहद में मिलाकर सुबह – शाम दें।
  • रोगी को दिन में चार – पांच बार सौ – सौ ग्राम अंगूर खिलाएं।
  • आधा चमच्च आंवले का चूर्ण एक चमच्च शहद में मिलाकर सुबह – शाम रोगी को दें।
  • चौलाई की जड़ का छिलका एक पाव पानी के साथ रगडें व इसे सुबह – शाम रोगी को दें। यदि जड़ न मिले, पत्तियों व टहनियां ही प्रयोग में लायें।

आयुर्वेदिक औषधियां

 

गोदंती भस्म, शिलाजीत्वादि लौह, सुपारी पाक, नागकेसर चूर्ण, आंवला चूर्ण, मोचरस चूर्ण, माजफूल चूर्ण, आशोकारिष्ट, प्रदरादि लौह, पुष्यानुग चूर्ण, प्रदरान्तक लौह आदि।

पेटेंट औषधियां

एन. एस. ल्यू. गोलियां (एमिल), फैमीप्लेक्स गोलियां (चरक), ल्यूमिटॉल गोलियां (सोल्यूमिक्स) व ल्यूकोल गोलियां (हिमालय), ल्यूकैम सीरप व गोलियां (माहेश्वरी)।

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रक्त प्रदर

कारण

हारमोन का असंतुलन, श्रोणि प्रदेश में संक्रमण, चिंता, शोक, भय आदि कारणों से रक्त प्रदर की शिकायत होती हैं।

लक्षण

मासिक धर्म के समय रक्त अधिक मात्रा में आना, चार दिन (सामान्य) से अधिक दिन तक चलना रक्त प्रदर कहलाता हैं। मासिक स्राव अपने नियत समय (सामान्यतया 20 से 30 दिन ) से काफी पहले आ जाना भी रक्त प्रदर की श्रेणी में गिना जाता हैं।

घरेलू चिकित्सा

 

  • 20 ग्राम राल सफ़ेद व 30 ग्राम असगंध नागोरी को कूट- पीसकर चूर्ण कर लें। इसमें इनके वजन के बराबर मिसरी कूटकर मिला लें। 2 – 2 चमच्च दवा सुबह – शाम पानी के साथ दें। इससे रक्तस्राव तुरंत ही नियंत्रित हो जाएगा।
  • 5 – 5 गुलाब के ताजा फूल सुबह – शाम आधा चमच्च मिसरी के साथ खिलाकर ऊपर से गाय का दूध पिलाएं। यह दवा लगभग 1 माह तक खिलाएं।
  • पके हुए गूलर के फलों को सुखाकर कूटकर चूर्ण बना लें। इसमें सम भाग मिसरी मिलाकर रख लें। सुबह – शाम 2 – 2 चमच्च दवा दूध के साथ दें।
  • एक भाग सोना गेरू व तीन भाग मुलेठी को कूट – पीसकर रख लें। 1 – 1 चमच्च चूर्ण दिन में तीन बार चावल के धोवन के साथ दें। इस दवा को एक सप्ताह तक प्रयोग कराएं।
  • माजूफल, गेरू व पठानी लोध बराबर मात्रा में कूट – पीसकर छान लें। आधा – आधा चमच्च सुबह – शाम दूध के साथ दो सप्ताह खिलाएं।
  • अनार के सूखे छिलके कूटकर चूर्ण बनाएं और एक – एक चमच्च दवा पानी के साथ सुबह व शाम को दें।

आयुर्वेदिक औषधियां

पुष्नायुग चूर्ण, धात्री लौह।

पेटेंट औषधियां

एमीकोर्डियल सीरप व गोलियां (एमिल), पोसैक्स फोर्ट कैप्सूल (चरक), ल्यूकैम गोलियां व सीरप (माहेश्वरी)।

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कारण

कमजोरी, शरीर में खून की कमी, हारमोन की गड़बड़ी के कारण यह रोग होता हैं।

लक्षण

बच्चों के जन्म के बाद माता के स्तनों में दूध नहीं उतरता या कम उतरता हैं। बच्चे को माँ का दूध यदि न मिले, तो बच्चा न केवल कमजोर रहता हैं, बल्कि उसके शरीर में रोगों से लड़ने हेतु प्रतिरोधात्मक शक्ति का भी अभाव रहता हैं, जिससे बच्चा बार – बार बीमार पड़ जाता है।

घरेलू चिकित्सा

  • माता को पौष्टिक आहार जैसे – दूध, फल, जूस आदि पर्याप्त मात्रा में दें।
  • शतावरी चूर्ण 1 – 1 चमच्च सुबह – शाम गर्म दूध में चीनी मिलकर दें।
  • सौंफ, सफ़ेद जीरा और मिसरी तीनों का अलग – अलग चूर्ण बनाकर समभाग लेकर मिला लें। एक – एक चमच्च दवा सुबह – शाम दूध के साथ दें।
  • स्तनों पर सुबह – शाम एरंड के तेल की मालिश करें।
  • 10 – 12 किशमिश सुबह – शाम दूध में उबाल कर खाएं।
  • पपीता व अंगूर सुबह – शाम खाने को दें।
  • अंगूर या गाजर का 1 – 1 गिलास रस सुबह – शाम पीने को दें।

आयुर्वेदिक औषधियां

गैलाकोल गोलियां (चरक), लैप्टाडीन गोलियां (एलारसिन), शातावारैक्स दाने (झंडु)।

 

कष्टार्तव

कारण

10 – 12 वर्ष की आयु में मासिक धर्म शुरू हो जाए, तो कमर व पेडू में रह – रहकर दर्द उठता हैं। कुछ स्त्रियाँ जो शारीरिक श्रम बिलकुल नहीं करती, उनमें भी हर माह मासिक धर्म शुरू होने से पहले पेडू व कमर में दर्द रहता हैं।

दोषों के कुपित होने, गर्भाशय में व्रण, क्षत या मस्सा आदि होने से भी मासिक स्राव कष्टपूर्ण होता हैं। उपवास, रक्ताल्पता, श्वेत प्रदर, चिंता, शोक, क्रोध आदि से भी यह संभव हैं।

लक्षण

पेडू व कमर में दर्द के अलावा मेरूदंड व सिर में भी पीड़ा हो सकती हैं। उलटी व चक्कर, भूख में कमी आदि लक्षण भी साथ में हो सकते हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • भोजन पौष्टिक करें, हरी सब्जियों का प्रयोग करें। इसके अतिरिक्त पेडू पर सेंक करें।
  • आक की जड़ को छाया में सुखाकर, कूट – पीसकर, छानकर रख लें। आधा ग्राम चूर्ण पाव भर गर्म दूध से दें।
  • हरे आंवले से निकाले तीन चमच्च रस में बराबर मात्रा में शहद मिलाकर लें। यदि ज्यादा आंवले उपलब्ध न हो, तो चार चमच्च आंवले का चूर्ण ले सकते हैं।
  • एक चमच्च मेथी के दाने कूटकर पाव भर पानी में उबालें। आधा रह जाने पर उतार लें व गुनगुना हो जाने पर पी लें। इसे दिन में दो बार लें।
  • आधा चमच्च तिल का चूर्ण दिन में दो – तीन बार लें।
  • बथुए का साग खाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

विजयावटी व रजः प्रवर्तिनीवटी इस रोग में काफी लाभदायक होती हैं।

पेटेंट औषधियां

एमीकोर्डियल सीरप व गोलियां (एमिल), एलोय कंपाउंड गोलियां (एलारसिन), रजोप्लैक्स कैप (माहेश्वरी), मीनोक्रेम्प गोलियां (सोल्यूमिक्स), सनकार्डिल सीरप (संजीवन)।

नोट: बताये हुए बिधि को यूज़ करते रहे आपको फायदा अवश्य मिलेगा, और फिर भी मन में कोई संकोच है, तो एक बार डॉक्टर की परामर्श अवश्य लें. हमारे लेटेस्ट जानकारी के पोस्ट को इसी तरह पढ़ते रहे और फायदा प्राप्त करते रहें।

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बांझपन

कारण

गर्भधारण न कर पाना बांझपन कहलाता हैं। यदि पुरूष वीर्य में शुक्राणुओं की कमी हैं, तो नारी स्वस्थ होते हुए भी गर्भधारण में असमर्थ रहती हैं। यदि शुक्राणु स्वस्थ हैं और संख्या में 1000 – 1250 लाख प्रति मि.ली. हैं, तो नारी की विकृतियों के विषय में विचार करना चाहिए। गर्भाशय का आकार छोटा होना, गर्भाशय उलटा स्थित होना, गर्भाशय में सूजन, गर्भाशय का मुख सुई की नोक जैसा होना, डिम्ब ग्रंथियों में संक्रमण या अन्य कोई रोग, डिम्बवाही नलिकाओं में सूजन पर उनका बंद होना आदि कारण ऐसे हैं, जिनसे गर्भधारण संभव नहीं हो पाता।

लक्षण

एक वर्ष तक लगातार यौन संबंधों के बाद भी गर्भधारण न कर पाना ही इस रोग का लक्षण हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • सर्वप्रथम पुरूष के वीर्य की जांच कराएं। यदि वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम हो या अन्य कोई असामान्यता हो, तो उसकी चिकित्सा कराएं।
  • कायफल को कूट – पीसकर उसमें समभाग मिसरी मिला लें। मासिक आरम्भ होने के पांचवे दिन से 6 – 6 ग्राम दवा चार दिन तक सेवन करें।
  • सोंठ, काली मिर्च, नागकेसर व छोटी पिप्पल सममात्रा में लेकर कूट – पीसकर चूर्ण बना लें। आधा चमच्च दवा गाय के घी में मिलाकर सेवन कराएं।
  • नागदमनी को गाय के घी में मिलाकर योनि में लेप करें।
  • नागकेसर को बारीक पीसकर 4 ग्राम की मात्रा में बछड़े वाली गाय के दूध से मासिक शुरू होने के दिन से आठ दिन तक खिलाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

 

लक्ष्मणा लौह, लक्ष्मणारिष्ट, अशोकारिष्ट, मुक्तापिष्टी, प्रवाल भस्म एवं लौह भस्म का प्रयोग बाँझपन की चिकित्सा हेतु कर सकते हैं।

पेटेंट औषधियां

एम – 2 टोन सीरप (चरक), एमीकोर्डियल सीरप व गोलियां (एमिल)।

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