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अपूर्व शक्तिशाली है मनुष्य का मन – Uncommonly powerful man’s heart

मनोयोग की अनंत शक्ति के विषय में कहा गया हैं –

यह सर्वज्ञ प्रभु की वाणी है की मन इतना बलशाली हैं कि एक पल में घोर नरक का निर्माण कर देता है और दुसरे ही पल मोक्ष में भी पहुंचा देता हैं।

 

मन जब आत्मा का सहयोगी होता हैं तो उसके लिए मोक्ष का निर्माण कर देता हैं , और जब उसका शत्रु बनता हैं तो उसे नीचे नरकों में भी ले जाता हैं।

 

उत्थान और पतन में शरीर की अपेक्षा मन शीघ्र परिणाम प्रस्तुत करने वाला होता हैं। वस्तुतः सम्यक मन मोक्ष का द्वार उद्घाटित करता हैं और असम्यक मन नरक का द्वार खोलता हैं।

एतदर्थ राजर्षि प्रसन्नचन्द्र का उदाहरण द्रष्टव्य हैं।

 

एक दिन महाराजा श्रेणिक भगवान् महावीर के दर्शन करने जा रहे थे। उनके साथ , उनके अंगरक्षक और कुछ और सैनिक भी चल रहे थे। मार्ग में एक किनारे पर प्रसन्नचन्द्र कठोर तप कर ररहे थे। उनकी अपूर्व ध्यान मुद्रा को देखकर राजा श्रेणिक बड़े प्रभावित हुए। वे उनके तप के विषय में सोचते हुए आगे बढ़ गए।

 

राजा श्रेणिक के साथ चल रहे दो सैनिक आपस में वार्तालाप कर रहे थे। एक सैनिक ने कहा – देखो ! यह मुनि एक दिन राजा था , लेकिन यह अब साधना कर रहा हैं। इसने अपने राजकर्मचारियों के विश्वास पर अपने अल्पायु राजकुमार को छोड़ दिया था। लेकिन अब उन कर्मचारियों की नीयत बदल गयी हैं और वे उस राजकुमार की ह्त्या का षड़यंत्र रच रहे हैं।

 

सैनिक के ये शब्द प्रसन्नचन्द्र के कानों में भी पड़े। उनका विश्वास तोड़ने वाले कर्मचारियों पर उनके ह्रदय में तीव्र रोष जाग उठा। उनका चिंतन अपने पुत्र की रक्षार्थ और पुत्र के शत्रुओं के विनाशार्थ उनके मन में भयंकर द्वंद्व मचाने लगे।

 

राजा श्रेणिक तब तक महावीर के चरणों में पहुँच चुके थे। वे राजर्षि प्रसन्नचन्द्र की कठोर साधना से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने प्रभु से पूछा – भगवन ! यदि राजर्षि प्रसन्नचन्द्र अभी शरीर त्याग करें तो किस गति में जाएं ?

भगवान् ने उत्तर दिया – सातवीं नरक में।

श्रेणिक विचलित हो उठे। वे बोले – प्रभु ! ऐसा महासाधक क्या सातवीं नरक में जाएगा ?

 

भगवान् बोले – राजन ! प्रसन्नचन्द्र को केवल ज्ञान हो गया हैं। हतप्रभ हो उठे थे श्रेणिक। वे बोले – प्रभु ! मुझे समझाइये आपके कथन का रहस्य।

 

महावीर ने कहा – राजन ! प्रसन्नचन्द्र महान ध्यानी हैं। महान तप किया हैं उन्होंने। लेकिन तुम्हारे सैनिकों के वार्तालाप ने उनका ध्यान भंग कर दिया था। उनका पुत्र – मोह जाग उठा था। वे मन ही मन शत्रुओं से भयंकर युद्ध में लीन हो गये थे। हजारों का वध कर दिया था उन्होंने। लेकिन अकस्मात उनका हाथ उनके मुंडित सिर पर गया तो उनके मन में पुनः श्रमणत्व का विवेक जागृत हो उठा।

 

उन्होंने पश्चात्ताप करते हुए आर्त्त – रौद्र ध्यान की काराओं को तोड़ डाला और उनकी आत्मा शुक्ल्ध्यान की पराकाष्ठाओं पर पहुँच गयी। जब वे युद्ध में रत थे तो उन्होंने इतने कर्म एकत्र कर लिए थे कि उस समय देह त्याग देते तो वे नरक में जाते , लेकिन पुनः जब उनका विवेक जागृत हुआ तो उन्होंने सर्वबंधनों को तोड़कर केवलज्ञान प्राप्त कर लिया।

प्रभु की वाणी सुनकर और मन की अनंत शक्ति का वर्णन सुनकर राजा श्रेणिक आह्लादित हो उठे थे।

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