Home / स्वास्थ / बुखार के प्रकार कारण एवं घरेलू उपचार
fiver
fiver

बुखार के प्रकार कारण एवं घरेलू उपचार

ज्वर – Fiver

कारण

शरीर का तापक्रम सामान्य अवस्था में (98.60 फारेनहाईट या 370 सेंटीग्रेड) से बढना ज्वर का सूचक हैं। वात , पित्त और कफ दोषों की न्यूनाधिकता के आधार पर आयुर्वेद में ज्वर के अनेक भेद बताये गए है। वास्तव में ज्वर तो एक सामान्य लक्षण हैं , जो शरीरगत किसी अन्य रोग को इंगित करता हैं। इसके निम्न कारण हैं :

  1. ऋतु के अनुसार शास्त्रों में वर्णित भोजन न करना अर्थात मिथ्या आहार – विहार करना विशेषकर बदलते हुए मौसम में ठंडी चीजें खाना।
  2. बासी भोजन , सड़ी – गली वस्तुएं , कटे हुए फल व सब्जियों का प्रयोग करना।
  3. अधिक गर्मी , धूप , ठंड , शीतल वायु व वर्षा से अपना बचाव न करना।
  4. ईर्ष्या , द्वेष , क्रोध , लोभ , अभिमान आदि मानसिक भावों से मन में क्षोभ उत्पन्न होना।

घरेलू चिकित्सा

  ज्वर के लक्षणों के आधार पर रोग विशेष की अलग – अलग चिकत्सा की जाती है , तथापि हल्का – फुल्का बुखार होने पर निम्नलिखित चिकित्सा रोगी को दे सकते हैं। फायदा न मिलने और बुखार न उतरने पर रोग का भली – भांति निदान करने के लिए चिकत्सक की परामर्श लेनी चाहिए।

  • लहसुन को पीसकर कल्क बनाएं और 5 से 10 ग्राम की मात्रा में सुबह – शाम रोगी को दें।
  • फुलाई हुई गुलाबी फिटकरी 250 मि.ग्रा. की मात्रा में सुबह – शाम दें।
  • छोटी पीपल का चूर्ण शहद के साथ एक – एक चमच्च की मात्रा में सुबह – शाम दें।
  • सिर दर्द हो , तो बादाम रोगन अथवा भृंगराज तेल की मालिश करें।
  • पसीना न आ रहा हो ,तो रोगी को गुनगुना पानी पिलायें।
  • बेचैनी हो तो बादाम रोगन और गुलरोगन मिलाकर माथे पर मालिश करें।
  • सिर में दर्द होने पर घी में कपूर मिलाकर मलें।
  • रोगी को कब्ज और बेचैनी हो , तो 20 – 30 मिलीलीटर एरंड तेल को गर्म दूध के साथ दें। एरंड तेल के स्थान पर हरड़ व सोंठ या हरड़ व सौंफ आधा – आधा चमच्च मिलाकर दूध के साथ ले सकते हैं।
  • ज्वर के साथ जुकाम भी हो , तो छोटी कटोरी और पित्त्पापड़ा बराबर मात्रा में लेकर उसका काढा बनाएं और दिन में तीन बार 20 मि.ली. की मात्रा में लें।
  • यदि वर्षा में भींगने या ठंडी हवा में रहने के कारण बुखार हुआ हो , तो चाय में तुलसी के 5 पत्ते , 2 लौंग , 3 काली मिर्च व चुटकी भर काला नमक डालकर दें।
  • शीत ऋतु में , ठंडी हवा में या वर्षा में भींगने से होने वाले बुखार में 5 पिण्डखजूर या छुहारे दूध में उबालकर पहले खजूर को खाएं , ऊपर से दूध पीकर पसीना लें।
  • वाइरल बुखार में 5 बादाम व 3 काली मिर्चें कूटकर एक चमच्च देसी घी में भूनें। इन दोनों के भुन जाने पर इसमें 5 किशमिश भी डाल दें और ऊपर से 400 ग्राम भी डाल दें। जब 250 ग्राम बचा रह जाए , तो इसे पीकर कपड़ा ओढ़कर पसीना लें। जैसे – जैसे पसीना निकलता जाएगा , वाइरल बुखार उतरता जाएगा।
  • 7 तुलसी की पत्तियां , 4 काली मिर्चें व एक पिप्पल पानी के साथ पीसकर आधा कप पानी में मिला लें व दस ग्राम मिसरी मिलाकर सुबह खाली पेट पिलाएं। बुखार पूरी तरह उतरने तक दवा पिलातें रहे।
  • धनिया और सोंठ का सम भाग करके चूर्ण बना लें। 10 ग्राम नीम की छाल को 250 ग्राम पानी में पकाकर काढा बना लें। इस काढ़े में 1 चमच्च चूर्ण मिलाकर सुबह – शाम रोगी को दें।
  • बेलगिरी के 30 पत्तों का रस दिन में तीन बार दें। नीम की 20 कोपलें व 3 काली मिर्चें एक गिलास पानी में उबालें। एक चौथाई रह जाने पर इसे उतारकर सुबह – शाम पिएं।
  • बुखार तेज हो , तो चन्दन पीसकर माथे पर लगाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

ज्वरान्तकवटी , ज्वरघ्नवटी , हिंगुलेश्वर रस , ज्वरभैरव चूर्ण , ज्वर नागमयूर चूर्ण , त्रिपुर भैरव रस आदि।

पेटेंट औषधियां

क्यूरिल गोलियां व शरबत (चरक) , डिवाइन रिलीफ कैप्सूल (बी.एम.सी. फार्मा) , फीवम गोलियां (माहेश्वरी) , जवरीना (संजीवन) लाभदायक हैं।

 

 

न्यूमोनिया ( फुफ्फुस शोथ ) Pneumonia

कारण

प्रायः सर्दियों में होने वाला यह रोग उन बच्चों या बड़ों में किसी भी मौसम में हो सकता हैं , जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो। शारीरिक दुर्बलता या वायु प्रदूषण के कारण अथवा दिन में प्रायः बंद कमरों में रहने वाले व्यक्तियों में ठंड लगने , जीवाणु संक्रमण या किसी अन्य विक्षोभक कारण से फेफड़ों में सूजन आ जाती हैं। आयुर्वेद में इसका उल्लेख श्वसनक ज्वर के नाम से आया हैं।

सर्दी के मौसम में एकदम ठंड में जाने से , गर्मी में पसीने की हालत में ठंडा पानी पी लेने से , ऐसे व्यक्तियों या बच्चों में जिनकी रोग प्रतिरोधक शक्ति कम होती हैं , कफ के प्रकोप से या जीवाणु का संक्रमण होने से यह रोग होता हैं। पुरानी खांसी , दमा या ह्रदय रोग के चलते इस रोग के होने की संभावना बढ़ जाती हैं।

लक्षण

रोगी को बलगम के साथ खांसी , छाती में दर्द , भारीपन व बुखार रहता हैं। बलगम बहुत ही चिपचिपा (चिपकने वाला) होता हैं। रोगी की नाड़ी मंद चलती हैं। फेफड़ों में बलगम जमा होने के कारण रोगी को सांस लेने में बहुत कठिनाई होती हैं तथा सांस तेज चलती हैं। रोगी सांस लेने में रूकावट अनुभव करता हैं तथा उसकी पसलियों में दर्द रहता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • अदरक और तुलसी के पत्तों का रस एक – एक चमच्च तथा एक चमच्च शहद मिलाकर रोगी को तीन बार दें।
  • एक भिलावां लेकर उसे आग पर गर्म करें। उसमें लोहे की सलाख से छेड़ करके दो बूँद तेल एक गिलास गर्म दूध में पका लें। तेल को दूध में अच्छी तरह मिलाकर रोगे को पिला दें और रोगी को कपड़ा ओढ़ा कर पसीना दिलवाएं। ऐसा दिन में एक ही बार करें।
  • टाआ४ण के तेल की छाती पर मालिश करें।
  • सरसों के तेल या देसी घी को गर्म करके उसमें चुटकी भर नमक डालकर मालिश करें।
  • तारपीन के तेल में बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर उसमें थोड़ा सा कपूर मिला लें व इससे मालिश करें।
  • तीन काली मिर्चें और तीन तुलसी के पत्ते को लेकर पानी में घोंटकर सुबह – शाम लें।
  • आधा चमच्च लहसुन का रस , 1 कटोरी दूध व 4 कटोरी पानी उबालें। एक चौथाई रह जाने पर इसे उतारकर ठंडा कर लें। यह काढा दिन में तीन बार लें।
  • लहसुन का एक – एक चमच्च रस बराबर मात्रा में गर्म पानी मिलाकर दिन में तीन बार दें।
  • तुलसी के ताजा 20 पत्तों को 5 काली मिर्चों के साथ पीस लें और पानी में घोलकर सुबह – शाम पिएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

स्वर्णभूपति रस , वृहत कस्तूरी भैरव रस , विश्वेश्वर रस , गोरोचानादि वटी , संजीवनी वटी , कफकेतु रस।

 

 

मलेरिया – Malaria

कारण

यह रोग प्लाजमोडियम नामक जीवाणु से फैलता हैं और मादा एनाफेलीज मच्छर द्वारा मनुष्य को काटे जाने पर इसका संक्रमण होता है। मादा एनाफेलीज मच्छर द्वारा काटे जाने पर प्लाजमोडियम नामक जीवाणु शरीर में प्रवेश करता हैं। प्रवेश के लगभग 9 दिन बाद अपनी संख्या में हजारों गुणा वृद्धि करके प्लाजमोडियम शरीर में मलेरिया बुखार को उत्पन्न करते हैं।

लक्षण

प्लाजमोडियम की विभिन्न तीन प्रकार की किस्मों के संक्रमण के आधार पर बुखार एक दिन , दो दिन या तीन दिन छोड़कर आता हैं। बुखार चढ़ने से पहले रोगी को ठंड लगती हैं। कुछ देर के बाद पसीना आकर बुखार उतर जाता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • 5 तुलसी के पत्ते व 3 काली मिर्च घोटकर सुबह – शाम रोगी को पिलाएं।
  • तीन ग्राम सत्यानाशी के साबुत बीज गर्म पानी से खिलाएं।
  • फिटकरी को भूनकर पीस लें। एक ग्राम की मात्रा में सम भाग मिसरी मिलाकर सुबह – शाम तीन दिन तक दें।
  • बारीक पीसा हुआ कुटकी का 1 ग्राम चूर्ण , समभाग चीनी मिलाकर दो से तीन बार रोगी कोताजे पानी के साथ 3 दिन तक दें।
  • 1 ग्राम कुटकी व 1 ग्राम काली मिर्चों का चूर्ण , 1 चमच्च तुलसी का स्वरस व 1 चमच्च शहद के साथ सुबह – शाम दें।
  • खाने का पिसा हुआ साधारण नमक तवे पर धीमी आंच में भूनें। भुनते – भुनते जब कॉफ़ी के रंग का हो जाए , तो उतार कर ठंडा करके बोतल में भरकर रख लो। ज्वर आने के नियत समय से थोड़ी देर पहले 1 चमच्च भुना हुआ यह नमक एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर लें। इसकी एक खुराक बुखार उतर जाने पर भी लें। यह दवा लगातार दो दिन तक लें।
  • बेलगिरी के फूल व तुलसी की पत्तियां बराबर मात्रा में लेकर पीस लें व उनका रस निकाल लें। 1 चमच्च रस , 1 चमच्च शहद के साथ दिन में तीन बार लें।
  • रोगी को दिन में तीन – चार बार चकोतरे खिलाएं। चकोतरे में प्राकृतिक रूप से कुनैन विद्यमान होती हैं।

आयुर्वेदिक औषधियां

सप्तपर्ण घनवटी , महाज्वरांकुश रस , कृष्णचतुर्मुख रस , चंदनादि लौह , विषम ज्वारंतक लौह , सर्वज्वरहर लौह आदि।

पेटेंट औषधियां

चिराकिन गोलियां (झंडु) , सुदर्शनधनवटी (वैद्यनाथ)

 

 

 

मियादी बुखार – Typhoid

कारण

इसे मंथन ज्वर , आंत्र ज्वर , मोतीझारा इत्यादि नामों से भी जाना जाता हैं। इस रोग में लगातार कई दिनों तक बुखार रहता हैं। यह प्रायः गर्मी के मौसम में फैलता हैं। आँतों में मुख्य रूप से इसका संक्रमण होने के कारण ही इसका नाम आंत्र ज्वर पड़ा।

सालमैनोला टाइफी नामक जीवाणु से फैलने वाला यह रोग अशुद्ध पानी व भोजन के कारण होता हैं।

लक्षण

जीवाणु संक्रमण के 12 – 14 दिन के बाद इस रोग के लक्षण प्रकट होते हैं। 12 – 14 दिन के इस समय में शरीर में सुस्ती , सिर में दर्द व भूख की कमी रहती हैं। 12 – 14 दिन बाद बुखार चढ़ता हैं , जो बढ़ता चला जाता हैं। सुबह बुखार कम होता हैं , परन्तु सांयकाल से बढना शुरू हो जाता हैं। रोगी सुस्त रहता हैं , उसका पेट कुछ अफारा हुआ व स्पर्श करने पर गर्म प्रतीत होता हैं। प्यास अधिक लगती हैं। प्रथम सप्ताह के अंत में पेट तथा छाती पर मोती जैसे चमकते हुए छोटे – छोटे दाने नजर आने लगते हैं। दुसरे सप्ताह में दाने लुप्त होने लगते हैं व बुखार उतरने लगता हैं। यदि चिकित्सा न की जाए , तो यह बुखार लम्बे समय तक चलता हैं।

घरेलू चिकित्सा

यदि दाने निकलने शुरू हो गए हो या न निकले हों और प्रयोगशाला की जांच से मोतीझारा की पुष्टि हो जाए , तो निम्न योग प्रयोग में ले आएं :

  1. 2 पके हुए अंजीर , 5 दाने मुनक्के व 3 ग्राम खूबकलां को 400 ग्राम पानी में पकाएं। आधा बचा रहने पर अच्छी तरह मलकर छान लें और मिसरी मिलाकर रोगी को पिलाएं। यह दवा सुबह शाम , दोनों समय दें। जब तक दाने निकलते रहे , दवा देते रहे। साथ में तुलसी के 5 – 5 पत्ते भी खिलाते रहे। इसके सेवन से 3 दिन से लेकर 1 सप्ताह के अन्दर बुखार उतर जाएगा। यदि बीच में दस्त लग जाएं , तो दवा बंद कर दें।
  2. केसर 1 ग्राम व 15 तुलसी के पत्ते पीसकर पानी में घोलकर रोगी को पिलायें।
  3. यदि दाने खूब निकल आए हो , तो निम्न योग दें – 250 ग्राम ऊर्क गावजबां मिट्टी के सकोरे में लेकर उसमें 19 हरे पत्ते लिसौड़ा के भिंगो दें। प्यास लगने पर यह दवा मिसरी डालकर पिलाएं , इससे 3 – 4 दिन में बुखार उतर जाएगा।
  4. 1 ग्राम केसर , 2 ग्राम काली मिर्च , 5 ग्राम लौंग , 5 ग्राम जावित्री व 10 ग्राम तुलसी के पत्ते लेकर साफ़ पानी के साथ पीस लें। पिसने पर इसमें 5 ग्राम मोती भस्म अच्छी तरह से मिला लें और इसकी 125 मिलीग्राम की गोलियां बना लें। एक – एक गोली सुबह – शाम गुनगुने पानी के साथ दें।
  5. एक पका केला और चार चमच्च शहद मिलाकर सुबह – शाम लें।

आयुर्वेदिक औषधियां

सौभाग्य वटी , सिद्ध प्राणेश्वर रस , संजीवनी वटी , सितोपलादि चूर्ण , ज्वरहर लौह , पंचतिक्तादि क्वाथ आदि।

पेटेंट औषधियां

खमीरा मरवारीद ख़ास (हमदर्द) जो कि एक यूनानी दवा हैं , आंत्र ज्वर में दी जाए तो दाने शीघ्र व सुगमता से निकल आते हैं।

About admin

आपने कीमती समय देकर ब्लॉग पढ़ा धन्यबाद, ये पोस्ट आपको पसंद आया हो तो शेयर करना न भूले, ताकि इसे ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें, अपना विचार जरूर लिखे, इससे हमें और ज्यादा अच्छी और लेटेस्ट जानकारियाँ लिखने के लिए प्रेरित करेगा.

Check Also

helth is weilth

जानकारी खास है, खुद से करें ये 10 वादे, बीमारियां रहेंगी दूर

अपनी सेहत का खास ध्यान रखना तो हमारी अपनी ही जिम्मेदारी है। तो फिर क्यों …

प्रातिक्रिया दे