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त्वचा रोग का असरदार घरेलू उपचार

फोड़े – फुंसियां

कारण

गर्मी के दिनों में अथवा अन्य कारण वश शरीर में फोड़े – फुंसियां निकल जाते हैं, जो बेहद कष्ट देते हैं। त्वचा की स्नेह ग्रंथियों से अधिक मात्रा में स्राव होने, खट्टे या मीठे पदार्थों का सेवन अधिक करने, शरीर की भली – भांति सफाई न करने आदि कारणों से शरीर में फोड़े – फुंसियां निकल आते हैं। गर्मी के मौसम में धूप में अधिक रहने या गर्मी वाले स्थान पर अधिक समय तक कार्य करने से आये पसीने से रोमकूप रूक जाते हैं। ऐसे में यदि किसी अच्छे साबुन से दिन में कई बार शरीर की सफाई न की जाए, तो रुके हुए रोमकूपों के नीचे फोड़े – फुंसियां बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त त्वचा पर खुजलाने से यदि कोई क्षत हो जाए, तो जीवाणु संक्रमण से फोड़े – फुंसी हो सकते हैं।

लक्षण

शुरू में त्वचा पर लाल दाने बनते हैं, जिनमें सूजन व दर्द होती हैं। पकने पर फोड़े में मवाद बन जाती हैं – जो फूटने पर निकलती हैं।

घरेलू चिकित्सा

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  • यदि फोड़ा निकलना शुरू हुआ हो, तो पीपल का पत्ता गर्म करके सीधी ओर से फोड़े पर बाँध दें, फोड़ा वहीं बैठ जाएगा।
  • कुनेर की जड़ की छाल को पानी में पीसकर फोड़े पर लेप करने से फोड़ा फूट जाता हैं।
  • 50 ग्राम गेरू व 3 ग्राम नीला थोथा मिलाकर बारीक पीस लें। पिसी हुई यह दवा 4 गुना सरसों के तेल में मिलाकर लगाएं।
  • कचूर बारीक पीस लें व 1 – 1 ग्राम सुबह – शाम पानी के साथ खिलाएं।
  • प्याज कूट – कूटकर तथा उसकी पुल्टिस बनाकर बाँधने से फोड़ा जल्दी पककर फूट जाता हैं।
  • नीम की 10 कोपलें सुबह खाली पेट चबाकर खाएं।
  • रोगी को सहजन की सब्जी बनाकर खिलाएं। सहजन की जड़ की छाल को कूटकर और इसके पत्तों का रस मिलाकर फोड़े पर बांध दें।
  • चिरायता रात को भिंगोकर रखें, सुबह रोगी को पिलाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

सारिवाद्यारिष्ट, महामंजिष्ठाद्यारिष्ट, सारिवाद्यासव, खादिरारिष्ट, महामंजिष्ठादिक्वाथ आदि रोगी को दे सकते हैं।

पेटेंट औषधियां

साफी, सुरक्ता व एमीप्योर शर्बत, नीमेलिया सीरप, गोलियां, पाउडर व तेल (माहेश्वरी), निम्बोलीन कैप्सूल (संजीवन)।

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दाद

कारण

त्वचा का यह रोग फफूंदी के कारण उत्पन्न होता हैं। यह रोग शरीर में कहीं भी हो सकता हैं, लेकिन जांघ आदि स्थानों पर विशेष रूप से होता हैं।

लक्षण

त्वचा में खुजली होती हैं तथा संक्रमण के स्थान पर गोलाकार बाहरी सीमा वाला घेरा सा बन जाता हैं, जिसमें दाने या पपड़ी सी बन जाती हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • दाद पर आक का दूध लगाएं।
  • नीम के पत्तों को दही में पीसकर दाद पर लगाएं।
  • हलदी को बारीक पीसकर पानी में मिलाकर लगाएं।
  • ढाक के बीजों को पीसकर दाद पर लगाएं।
  • सहजन की जड़ की छाल पीसकर लगाएं।
  • पपड़ियाँ नौसादार व आंवलासार गंधक बराबर मात्रा में तिल के तेल में मिलाकर अच्छी तरह घोंट लें। नीम के पानी से साफ़ कर यह दवा दाद पर लगाएं।
  • आंवलासार गंधक व कपूर बराबर मात्रा में मिलाकर दोनों के पांच गुना मिट्टी के तेल में घोटकर दाद पर लगाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

पारदादि मलहम स्थानिक प्रयोग हेतु व आरोग्यवर्धिकी वटी खाने के लिए प्रयोग करें।

पेटेंट औषधियां

स्किनेल मलहम (चरक)।

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खुजली

कारण

एकेरस स्केबीयाई से होने वाला यह एक छूत का रोग है, जो एक दुसरे के वस्त्र प्रयोग करने, एक ही बिस्तर पर सोने से परस्पर हो जाता हैं। शरीर के जिस भाग में त्वचा मृदु और पतले हो , वहाँ कृमि आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। कलाई के आगे वाले भाग पर, बगलों, जांघो, अंडकोष, शिश्न व अँगुलियों के बीच में इस रोग का कृमि आसानी से प्रवेश कर जाता हैं।

लक्षण

शुरू – शुरू में खुजली होती हैं। खुजलियों का स्थान सर्वप्रथम हाथों के अंगुलियों के बीच में तथा हाथों के पीछे होता हैं। बाद में खुजलाने से दाने बन सकते हैं। एक साथ रहने वाले कई व्यक्तियों में यदि खुजली के लक्षण हैं, तो यही रोग समझना चाहिए।

घरेलू चिकित्सा

नीम के पानी से नहा कर, पोंछकर 5 – 10 प्रतिशत वाले शुद्ध गंधक के मिश्रण का लेप करें। कपड़े भी गर्म पानी में उबालकर धोएं व तेज धुप में सुखाएं। शुद्ध गंधक को 8 गुना कडवे तेल में मिलाकर भी लगा सकते हैं।

आयुर्वेदिक औषधियां

महामरिच्यादि तेल स्थानिक प्रयोग हेतु व शुद्ध गंधक अथवा ब्राह्मी वटी खाने के लिए प्रयोग करें।

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शीतपित्त

कारण

त्वचा में उभरे हुए, स्पष्ट किनारों वाले, खुजली युक्त लाल रंग के चकत्तों को शीतपित्त कहा जाता हैं। ये चकत्ते अस्थायी होते हैं। वातावरण में उपस्थित किसी भी तत्व भोजन, दवा, वस्त्र द्वारा शरीर में पैदा हुई असात्म्यता (एलर्जी) के कारण ऐसे चकत्ते शरीर में होते हैं। पेट में कीड़े होने पर भी ऐसे चकत्ते हो जाते हैं। जीवाणु संक्रमण के अतिरिक्त भावनात्मक उद्वेग के कारण भी यह संभव हैं। शीतल जल या वायु के संपर्क में आने से भी लक्षण प्रकट हो सकते हैं।

लक्षण

त्वचा में स्पष्ट किनारों वाले, खुजली युक्त उठे हुए उभार हो जाते हैं। गले या जीभ में सूजन भी हो सकती हैं। कभी – कभी सांस लेने में कठिनाई, सिर दर्द, पेट दर्द के लक्षण भी मिल सकते हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • यदि पेट में कीड़ों के कारण शीतपित्त के लक्षण प्रकट हुए हो, तो कीड़ों की चिकित्सा करें।
  • नीम के पानी में नमक मिलाकर रोगी को पिलाएं व उलटी करा दें।
  • 2 ग्राम अजवायन को दोगुने गुड़ में मिलाकर सुबह – शाम लें।
  • 1 ग्राम नीम के पत्तों का चूर्ण घी में मिलाकर चटाएं।
  • सोंठ, पिप्पली, काली मिर्च व अजवायन सभी समान भाग लेकर कूट – पीस लें। आधा – आधा चमच्च सुबह – शाम लें।
  • 2 चमच्च अदरक का रस 15 – 20 ग्राम गुड़ के साथ सुबह – शाम सेवन करें। 1 – 2 ग्राम गेरू 1 चमच्च शहद या घी में मिलाकर सेवन करें।

आयुर्वेदिक औषधियां

हरिद्राखंड, अमृतादिक्वाथ, सूतशेखर रस, त्रिकुट चूर्ण व अरटीप्लेक्स गोलियां (चरक) लाभदायक होती है।

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बिवाई

कारण

आयुर्वेद में एड़ियां फटने की स्थिति का वर्णन विपादिका के नाम से किया गया हैं। इसमें अत्यधिक तकलीफ होती हैं तथा एड़ियों में दरारें पड़कर खून निकलने लगता हैं। पैरों की उचित देखभाल न होने से एड़ियों में बिवाइयां फटती हैं। यह बीमारी स्त्रियों में अधिक होती हैं, क्योंकि स्त्रियाँ अधिकतर चप्पल ही पहनती हैं।

लक्षण

एड़ियों में दरारें आकर फट जाती हैं। जिससे चलने में कठिनाई, जलन व दर्द होता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • रोज रात को गर्म पानी में नमक डालकर एड़ियों को डुबोकर रखें। कोई भी दवा उसके बाद लगाएं। नहाते समय भी पैरों को रगड़ कर साफ़ करें।
  • अजवायन को बारीक पीसकर व शहद में मिलाकर रात में बिवाइयों में लगाएं व सुबह उठकर गोमूत्र या स्वमूत्र से धो लें।
  • एरंड के बीजों को पीसकर बिवाई में लगाएं।
  • पुराना गुड़, मोम, सेंधानमक, गुग्गुल व राल सममात्रा में लेकर बारीक पीस लें। इसमें दोगुनी मात्रा में गाय का घी मिलाकर मलहम बनाकर रख लें। रात को नमक मिले गर्म पानी से पैर धोकर, पोंछकर लगाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

सैन्फवादि लेप व मदनादि लेप का प्रयोग बिवाइयों की चिकित्सा हेतु करते हैं।

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एथलीट पाँव

कारण

यह रोग एक फफूंदी के संक्रमण के कारण होता हैं। उँगलियों के बीच के भाग की समुचित सफाई न होने, बगैर पोंछे जूते पहन लेने, दिन में अधिकाँश समय ही जूते पहने रहने आदि कारणों से यह रोग होता हैं। इसके अलावा अधिक समय तक पानी में पांव भींगे रहने पर भी यह रोग हो जाता हैं।

लक्षण

इस रोग में पाँव की उँगलियों के बीच में छाले व घाव हो जाते है, जिनमें से पानी निकलता हैं। उँगलियों के बीच का भाग गल सा जाता हैं और पैरों में से दुर्गन्ध आने लगती हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • जुराब व जूते साफ़ रखें, जूतों में बंद पैरों में हवा लगती रहे, ताकि पसीना न आए।
  • गर्म पानी में नमक डालकर सुबह – शाम उंगलियों को साफ़ करें। जुराब – जूते अच्छी तरह पोंछकर पहनें।
  • हलदी को बारीक पीसकर सरसों के तेल में मिलाकर लगाएं।
  • नीम का तेल लगाएं।

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मस्से

कारण

शरीर के किसी भी हिंस्से में त्वचा के बाहर अंकुर के रूप में मस्से उभर आते हैं। यह वायरस जन्य रोग हैं जो विशेष चिंता, तनाव आदि मानसिक भावों के कारण विशेष रूप से होता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • धनिया, लोध्र और तज सामान मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसें व मस्सों पर लेप करें। धनिया अकेले भी पीसकर लगा सकते हैं।
  • सीपी को राख सिरके में मिलाकर लगाएं।
  • चूना और घी बराबर मात्रा में लेकर फेंटकर रख लें व दिन में तीन – चार बार लगाएं।
  • एरंड के तेल की मालिश सुबह – शाम करें।
  • अदरक का रस और चूना मिलाकर मस्सों पर लगाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

काशीशादि तेल का प्रयोग लगभग 2 सप्ताह तक करें।

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