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सत्य परम बल हैं – Truth is the ultimate force

सत्य की महत्ता का दिग्दर्शन करते हुए कहा गया हैं –

सत्य परम बल हैं। सत्यवादी परम बलशाली होता हैं। कायर सत्य का पुजारी नहीं हो सकता हैं। सत्य चूंकी बलशालियों का महागुण होता हैं , इसलिए सत्य स्वयं परमबल हैं। सत्य जब गूंजता हैं तो कायरता दुम दबा कर अदृश्य हो जाती हैं।

 

तैमूरलंग बहुत क्रूर शासक था। वह लोगों को पकड़ता था और उन्हें गुलामी का पट्टा पहना देता था। वह जरूरत से अधिक गुलामों को अन्य धनिक लोगों के हाथों में बेच देता था।

 

एक बार उसने तुर्किस्तान में बहुत से लोगों को गुलामी का पट्टा पहनाया था। उन गुलामों में तुर्किस्तान के विख्यात दार्शनिक अहमदी भी सम्मिलित थे। तैमूरलंग अपने गुलामों की स्वयं बोली लगाता था। उसने बाजार में दो गुलामों को बेचने के लिए खडा किया। पंक्ति में अहमदी भी खड़े हुए थे। तैमूर ने अहमदी की ओर देखा और बोला – कहो ! इन दो गुलामों की क्या कीमत हो सकती हैं ?

 

अहमदी निर्भीक सत्यवादी थे। वे बोले – बादशाह ! ये दोनों ही काफी मजबूत और समझदार लगते हैं। अतः इनकी कीमत चार – चार हजार अशर्फी तो होनी ही चाहिए। तैमूरलंग ने विनोद करते हुए कहा – अच्छा यदि मैं स्वयं को इन गुलामों के मध्य में खडा करके बेचना चाहूं तो मेरी क्या कीमत हो सकती हैं ?

कुछ सोचते हुए अहमदी बोले – दो अशर्फी !

 

तैमूरलंग क्रोध से तमतमा गया। उसने क्रोध से गरजते हुए कहा – क्या बकवास करते हो। मेरे गुलाम होते हुए मेरा ही अपमान करते हो। दो अशर्फी की कीमत की तो यह चद्दर है जो मैंने ओढ़ रखी हैं।

 

अहमदी ने चुभता हुआ सत्य बोलते हुए कहा – मैंने तुम्हारी चद्दर देखकर ही तुम्हारी कीमत दो अशर्फी बताई है। वरन तुम जैसे लंगड़े और और अत्याचारी व्यक्ति को कोई बिना मूल्य दिए भी नहीं खरीदना चाहेगा।

 

इस स्पष्ट निर्भीक शत – प्रतिशत सत्य ने तैमूरलंग की आत्मा को झकझोर डाला और उसने जीवन में प्रथम बार एक नेक काम करते हुए अहमद सहित सभी गुलामों को स्वतंत्र कर दिया।

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