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सच्चा ज्ञानी

संस्कृत साहित्य का एक अमूल्य श्लोक हैं –

जब उत्पन्न होते ही शिशु को पहले अनित्यता अपनी गोद में ले लेती हैं , माता भी धाय की तरह उसके बाद ही अपनी गोद में धारण करती हैं। तब फिर शोक करने की क्या बात हैं ? जीवन अनित्य हैं। पुत्र , परिवार और धन अनित्य हैं। इस अटल सत्य से प्रत्येक प्राणी परिचित हैं। फिर पुत्र – परिवार , धन आदि के विरह पर शोक कैसा ?

 

लेकिन मोह्भिभूत प्राणी सत्य को जानकर भीं पुत्रादि के विरह पर शोकाकुल हो उठता हैं। अनित्य से हटकर नित्य से और नश्वर से हटकर अनश्वर से जब मनुष्य के ह्रदय का तार जुड़ जाता हैं तो प्रेम का संयोग – वियोग उसे हर्ष और शोक से अतीत कर देता हैं। उस अवस्था को गीता की भाषा में स्थिरप्रज्ञ कहा जाता हैं।

 

बंगाल में एक व्यक्ति हुआ हैं , जिसका नाम था भूपेश सेन। उसने प्रभु – भक्ति के मार्ग से स्थिरप्रज्ञता की अवस्था को जीया था। एक दिन उसके इकलौते पुत्र को एक जहरीले सांप ने डस लिया। पुत्र कुछ ही समय में मर गया। परिवार – परिजनों में हाहाकार मच गया। भूपेश उस समय अपनी समाधि में तल्लीन थे।

 

एक शोकाकुल परिजन दौड़कर भूपेश के पास गया और बोला – भूपेश ! तुम समाधि में बैठे हो और तुम्हारा इकलौता पुत्र सर्प – दंश से मर गया हैं। उठो ! दौड़ो ! उसे देखो। इस वज्रघात सी घटना को सुनकर भी भूपेश के मुख पर शोक की छाया न उभरी। उसने कहा – पुत्र का देहांत हो गया हैं। बहुत अल्प संयोग दिया प्रभु ने। खैर…… उसकी इच्छा।

 

कहते हुए भूपेश उठ खडा हुआ। भूपेश को सहज देखकर उसका वह परिजन जो पहले से असहज था और भी असहज हो उठा और बोला – कैसे पिता हो तुम भूपेश ! पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर भी तुम्हारी आँख से एक आंसू भी नहीं निकला। भूपेश ने कहा – मैं व्याकुल क्यों बनूँ ! एक दिन वह नहीं था , तब भी मैं प्रसन्न रहता था। वह मेरे पास रहा , तब भी मैं प्रसन्न था। अब वह नहीं हैं तो मैं अप्रसन्न क्यों बनूँ।

 

भूपेशसेन को जिसने भी उस समय देखा और सुना , वह चौंक गया। इकलौते पुत्र को कंधा देते हुए भी वह शांत भाव में लीन था। और फिर उसने मृत पुत्र की देह को चिता पर रखा और बोला – पुत्र ! तुम जिस घर से आये से उसी घर लौट गए हो। आज से हमारा सम्बन्ध विच्छिन्न होता हैं। स्थिरप्रज्ञता व्यक्ति को हर्ष – शोक से अतीत कर देती हैं। एतद विषयक प्रसिद्ध हैं यह दोहा –

     ‘ हर्ष शोक जाके नहीं , बैरी मित्र समान ‘

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