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जो दे दिया जाता हैं, वही शेष रहता हैं – ज्ञान से भरपूर

आदित्त जातक में नश्वर और अनश्वर का विवेचन करते हुए कहा गया हैं –

जलते हुए घर में से व्यक्ति जिस वस्तु को निकाल लेता हैं , वही उसकी होती हैं। न कि वह जो वहाँ जल जाती हैं। इसी प्रकार यह संसार ज़रा और मरण से जल रहा हैं। जो ( धनादि ) किसी को दे दिया जाता हैं वही अपना बचता हैं। शेष सब जो बचा हुआ माना जाता हैं , वह नष्ट हो जाता हैं।

 

संसार की दृष्टि में जो बाँट दिया जाता हैं उससे मनुष्य रिक्त हो जाता और बांटने के बाद जो बचता हैं , वही बचता हैं। शेष सब जो बचता हैं वही बचता हैं। धर्म की दृष्टि में जो बाँट दिया जाता हैं वही बचता हैं वही अपना होता हैं , शेष अपना नहीं होता हैं। जो इस सत्य को जानते हैं , वे दोनों हाथों से बांटते रहते हैं

 

एक लोभी श्रेष्ठी के घर में एक सुसंस्कारित बहू आ गयी। वह दान – पुण्यादि में विश्वास रखती थी , लेकिन सेठ के हाथ से एक पैसा नहीं छूटता था। एक दिन बहू भोजन बना रही थी। सेठ रोटी खा रहा था। बहू ने एक रोटी चूल्हे में डाली हुई थी , और एक तवे पे तपा रही थी।

 

उसी समय एक श्रमण आ गए। बहू ने बड़ी श्रद्धा से संत का स्वागत किया। संत ने भोजन के लिए पात्र रख दिए। बहू ने बड़ी श्रद्धा से दो रोटियाँ संत के पात्र में रखनी चाही। लेकिन भिक्षाचारी के नियम के अनुसार संत ने कहा – बहना ! एक रोटी दे दो।

 

बहू ने पुनः आग्रह किया दो रोटी देने के लिए। संत ने पुनः एक लेनी चाही। ससुर बहू की इस जिद्द को देखकर भीतर ही भीतर कुढ़ रहा था। उसकी दृष्टि उन दो रोटियों पर थी , जो संभाल के बिना तवे और चूल्हे में जल रही थी।

 

अंततः बहू की श्रद्धा – भक्ति को श्रमण ने मान लिया। वे भोजन लेकर लौट गए। अब श्वसुर को अवसर मिला। उसने अपने ह्रदय का गुब्बार निकालते हुए कहा – बहू ! कैसी मूर्ख हो तुम। तुमने एक रोटी चूल्हे में जला दी , एक तवे पर जला दी और दो संत को दे दी। तुमने दान दो रोटियों का किया और दो यूँही जला डाली।

 

बहू बोली – पिताजी ! एक रोटी चूल्हे में जली , एक तवे पर जली , ये न भी जलती तो भी इन्हें जल ही जाना था। ये रोटी आप खा रहे हैं , ये भी जल रही हैं , मैं जो पका रही हूँ ये भी जल जाने वाली हूँ , लेकिन इन जलती हुई रोटियों में से मैंने दो रोटियों को बचा लिया हैं।  संत के पात्र में गयी हुई रोटियाँ ही बचेंगी , शेष की नीयति तो जलना ही थी।

 

बहू बोलती चली गयी – पिताजी ! यह पूरा संसार जल रहा हैं , ये घर , ये द्वार , और यहाँ तक कि यह देह भी जल रही हैं। मृत्यु और नश्वरता की इस आग में कुछ भी शेष रहने वाला नहीं हैं। जो दे दिया जाता हैं , वही शेष रहता हैं। मैंने इस घर की दो रोटियों को बचा लिया हैं।

 

बहू की इस तात्विक बात को सुनकर सेठ की आँखें खुल गयी। उन्हें भी नश्वरता और अनश्वरता का सम्यक ज्ञान उपलब्ध हो गया।

 

जो दे दिया जाता हैं , वहीँ शेष रह जाता हैं। शेष या तो आँखों के सामने ही नष्ट हो जाती हैं , या आँख बंद होने के पश्चात नष्ट हो जाता हैं।    वस्तुतः जो हम दे सकते हैं उसे यदि देते हैं तो हम उसी के स्वामी होते हैं , वही हमारा होता हैं। शेष के हम स्वामी नहीं हो सकते – रक्षक हो सकते हैं , पहरेदार हो सकते हैं।

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