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यह संसार एक सराय (धर्मशाला) है ज्ञानपूर्ण जानकारी

इस घोर संसार को तैरने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को ज्ञान रुपी नौका का सहारा लेना चाहिए। इस नौका से वह सुख -पूर्वक इस संसार – सागर को तैर सकता है। अज्ञान मनुष्य को संसार से बाँध कर रखता है। ज्ञान उसे संसार का स्वरुप दर्शन कराता और वह इससे मुक्त हो जाता है । अज्ञान -निद्रा में सुप्त मनुष्य को स्व और पर का भेद नहीं होता है। ज्ञान उसमे  स्व  और  पर का विवेक जगा देता है।

 

बल्ख – बुखारा में इब्राहिम बादशाह का शासन चलता था। एक दिन उनके महल के द्वार पर एक फकीर आया और वह महल में प्रवेश करने लगा । पहरेदार ने उस फकीर को द्वार पर ही रोक लिया और कहा – आप अंदर नहीं जा सकते । यह राजमहल है । फ़कीर बोला –  कैसा राजमहल? यह तो एक सराय है और मै इस सराय में रात्रि – विश्राम करना चाहता हूँ।

 

पहरेदार हंसने लगा।  वह पुनः पुनः फ़कीर को रोक रहा था। परन्तु फ़कीर भीतर जाने को कटिबद्ध था।

 

इब्राहिम फ़कीर और पहरेदार की बात सुन रहा था। उसने नौकर को आदेश देकर फ़कीर को भीतर बुला लिया । उन्होंने कहा – हे फ़कीर! आपकी जिद उचित नहीं है। वस्तुतः यह सराय नहीं है, मेरा महल है। फ़कीर हंसने लगा।  वह  बोला –  लेकिन मैंने आपको प्रथम बार यहां देखा है। पांच वर्ष पहले भी मै यहाँ आया था रात बिताने को, लेकिन तब कोई और व्यक्ति बैठा था इस सिंहासन पर, और वह कह रहा था कि यह महल उसका है।

 

इब्राहिम बोला – वे मेरे पिता थे अब उनका देहांत हो चुका है।

 

फ़कीर बोला – बादशाह ! कोई बीस बरस पहले भी मै यहाँ आया था। तब एक वृद्धा व्यक्ति ने इस महल को अपना बताया था.

इब्राहिम बोला – वे मेरे दादा थे।

 

फ़कीर की वाणी गंभीर हो गयी। वह बोला – क्या दूसरी बार जब मै आऊंगा तो तुम मिलोगे मुझे? फ़कीर के प्रश्न ने इब्राहिम की आत्मा में ज्ञान का एक द्वार खोल दिया था। वह बोला – कह नहीं सकता की मिलूं या न मिलूं।

 

फ़कीर बोला – जहां रहने वाले बदलते रहे, वह महल कैसे हो सकता है? कल कोई यहां था, आज कोई है और कल कोई और होगा। बादशाह! इसे सराय कहकर मैंने क्या गलत किया है?

 

इब्राहिम फ़कीर के क़दमों में झुक गया। वह बोला –  आप मेरे गुरु है। आपने मेरे भीतर ज्ञान की ज्योति प्रकट की है। अब आप यहाँ ठहरिये, मै जाता हूँ।  और इब्राहिम फ़कीर बनकर खुदा की भक्ति में तल्लीन हो गए।

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