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माइकल डेल जीवन की कहानी (डेल के संस्थापक)

सामान्य व्यावसायिक बुद्धि का हर व्यक्ति यह जानता हैं कि ग्राहक जिस कीमत पर सामान खरीदता हैं और जो कीमत उस सामान के निर्माता को मिलती हैं, उनके बीच काफी अंतर होता हैं। सामान की अंतिम कीमत में बहुत से बिचौलियों का कमीशन और मुनाफा जुड़ जाता हैं, जैसे थोक व्यापारी का कमीशन, रिटेल स्टोर का किराया, रिटेल स्टोर में काम करने वाले सेल्समेनों का वेतन आदि।

 

डायरेक्ट मार्केटिंग में उत्पादक द्वारा ग्राहक को सीधे सामान बेचा जाता हैं, इसीलिए बिचौलियों का मार्जिन न होने के कारण ग्राहक को सामान सस्ता मिल जाता हैं। यही वजह हैं कि बीसवीं सदी में डायरेक्ट मार्केटिंग काफी लोकप्रिय हुई।

 

23 फ़रवरी 1965 को हाउसटन, टेक्सास में जन्मे माइकल डेल ने 1984 में यानी सिर्फ 19 वर्ष की उम्र में डेल कंप्यूटर कारपोरेशन की स्थापना की। वे ग्राहकों को सीधे कंप्यूटर बेचने लगे, यानी वे दुकानों के बजाय विज्ञापनों और मेल आर्डर के माध्यम से कंप्यूटर बेचने लगे।

 

उनके विचार और व्यवसाय की सफलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता हैं कि आज संसार के सबसे अमीर लोगों की सूची में माइकल डेल का नाम 41 वे स्थान पर हैं और उनके पास 15.9 अरब डॉलर की संपत्ति हैं।

 

कम उम्र में ही माइकल डेल पुस्तकों के बजाय कंप्यूटरों में ज्यादा रुचि लेने लगे थे। जब उन्होंने अपने माता – पिता से काफी आग्रह किया, तो उन्होंने माइकल के पन्द्रहवें जन्मदिन पर उन्हें एप्पल टू कंप्यूटर खरीदकर दे दिया।

 

कंप्यूटर जैसे काम करता हैं यह देखने के लिए माइकल ने तत्काल उसके पुर्जे – पुर्जे खोल डाले। नए कंप्यूटर का यह हाल देखकर माता – पिता आग – बबूला हो गए, लेकिन माइकल ने कंप्यूटर को दुबारा जोड़ दिया। उन्होंने कंप्यूटर को सिर्फ इसलिए खोला था ताकि वे इसके सर्किट को समझ सके।

 

1983 में माइकल डेल टेक्सास यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे, लेकिन उनका दिमाग पढ़ाई के बजाय पैसे कमाने की योजनाएं बनाने में लगा था। उनके मन में एक विचार आया : अगर स्थानीय दुकानदारों से आई. बी. एम. कंप्यूटरों में लगने वाले रैम चिप और डिस्क ड्राइव थोक में लेकर उपभोक्ताओं को सस्ते दाम में बेचा जाय, तो काफी कमाई हो सकती हैं।

 

फिर क्या था, उन्होंने बहुत सारा माल खरीद लिया और अखबारों में विज्ञापन देकर बाजार मूल्य या खुदरा कीमत से काफी कम पर अपना पूरा माल बेच दिया। यह सिलसिला इतना सफल हुआ कि 1984 तक हर महीने 80000 डॉलर की बिक्री होने लगी। जाहिर हैं, व्यावसायिक सफलता का स्वाद चखने के बाद उन्होंने पढ़ाई अधूरी छोड़ दी और अप्रैल 1984 में अपनी कंपनी स्थापित कर दी।

 

माइकल डेल कंप्यूटर असेम्बल करने लगे। माइकल ने बाजार से कंप्यूटर पार्ट्स खरीदकर 700 डॉलर में पर्सनल कंप्यूटर बना लिया, जबकि उन दिनों आई. बी. एम. का पर्सनल कंप्यूटर 3000 डॉलर में आता था। डेल जानते थे कि बहुत से ग्राहक ज्याद मेमोरी और ज्यादा प्रोसेसिंग पॉवर वाले कंप्यूटर चाहते हैं, इसलिए उन्होंने ग्राहकों की पसंद के हिसाब से कंप्यूटर असेम्बल किये।

 

आई. बी. एम. जैसी कंपनी के कंप्यूटर जिन स्टोर्स में बिकती थी, उन्हें कंप्यूटर की ज़रा भी समझ नहीं थी और वे उनकी सर्विसिंग भी नहीं कर पाते थे। माइकल डेल ने इस स्थिति का भरपूर लाभ उठाया।

 

उनकी कंपनी में कंप्यूटर बनाने का काम तीन लोगों के जिम्मे था। माइकल डेल ने आई. बी. एम. से ज्यादा शक्तिशाली कंप्यूटर बनाए और उन्हें आई. बी. एम. से आधी कीमत पर बेचा। जाहिर हैं, इस रणनीति से उनके कंप्यूटर चल निकले। माइकल डेल का सूत्रवाक्य था – यथास्थिति बनाए रखने में कोई जोखिम नहीं हैं – लेकिन उसमें कोई मुनाफा भी नहीं हैं।

 

रोचक बात यह थी कि माइकल डेल के पास औपचारिक शिक्षा नहीं थी, कंप्यूटर का विधिवत प्रशिक्षण नहीं था, ख़ास पूंजी नहीं थी, फाइनैंसर नहीं थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने डायरेक्ट मार्केटिंग की नीति पर चलकर एप्पल, आईबीएम जैसी कंपनी को हरा दिया!

 

चूंकि डेल अपने कंप्यूटर सीधे ग्राहकों को बेचते थे और कैटेलाग व पत्रिकाओं में विज्ञापन देकर व्यापार करते थे, इसलिए उनके कंप्यूटरों की कीमत दूकान पर मिलने वाले कंप्यूटरों से काफी कम होती थी। कम कीमत और उच्च गुणवत्ता वाले डेल कंप्यूटरों ने बाजार में धूम मचा दी।

 

कंपनी ने पहले ही साल में 6 मिलियन डॉलर की बिक्री की, जो अगले साल बढ़कर 34 मिलियन डॉलर हो गयी। 1987 तक डेल अमेरिका की सबसे अग्रणी मेल – आर्डर कंपनी बन गयी। इसी साल कंपनी ने विदेशी बाजारों में भी प्रवेश किया।

 

उल्लेखनीय बात यह थी कि डेल कंप्यूटर कारपोरेशन की स्थापना करते वक़्त माइकल डेल के पास सिर्फ 1000 डॉलर की पूंजी थी। इतनी कम पूंजी में कंप्यूटर व्यवसाय शुरू करना कोई हंसी खेल नहीं था। बहरहाल, डेल ने सोचा कि अगर वे आर्डर पे कंप्यूटर बनाएंगे, तो उन्हें इन्वेंटरी यानी स्टॉक की कोई समस्या से नहीं जूझना पडेगा।

 

आर्डर पर कंप्यूटर बनाने से एक लाभ यह भी हुआ कि इससे बिचौलिए की भूमिका कम हो गयी। परिणामस्वरूप ग्राहक को कंप्यूटर सस्ते में मिला, डेल की लागत कम हुई और उनका लाभ बढ़ता चला गया।

 

कम लागत और ज्यादा लाभ सफल व्यवसाय की नींव हैं। शुरुआती आठ वर्षों में डेल कंप्यूटर ने 80 प्रतिशत की वार्षिक दर से प्रगति की। 2000 तक इसकी वार्षिक आमदनी 27 अरब डॉलर हो गयी। जब इन्टरनेट का दौर शुरू हुआ, तो डेल ने उसका तत्काल लाभ उठाते हुए ऑनलाइन सेलिंग शुरू कर दी। डेल ने कहा – हमारे लिए इन्टरनेट किसी साकार स्वप्ना जैसा हैं।

 

इसमें सौदे की लागत शून्य हो जाती हैं। 1996 में डेल ने ई – कॉमर्स शुरू कर दिया। 2000 तक आते – आते हर दिन 5 करोड़ डॉलर की बिक्री होने लगी। आज कंपनी की आधी से ज्यादा बिक्री इन्टरनेट के माध्यम से होती हैं।

 

माइकल डेल किसी फॉरचून 500 कंपनी को चलाने वाले सबसे युवा सी. ई. ओ. हैं। विशेषज्ञों की राय में डेल की सफलता किसी ख़ास प्रोडक्ट पर नहीं, बल्कि बेचने की अनूठी रणनीति पर आधारित हैं। उन्होंने कंप्यूटर की डायरेक्ट सेल्लिंग का नया काम करके इतिहास रच दिया। साथ ही, उन्होंने डायरेक्ट सेल्स मॉडल का इस्तेमाल करके अपनी कंपनी को संसार की सबसे बड़ी कम्पनिओं में से एक बना दिया।

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