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जेम्स एच क्लार्क के जीवन की कहानी

जेम्स एच क्लार्क 1978 में स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। वहाँ नौकरी करते समय उन्होंने अमेरिकी रक्षा शोध संस्था से अनुदान लेकर अपने विद्यार्थियों के साथ कंप्यूटर ग्राफ़िक्स टेक्नोलॉजी में शोध किया। तीन साल के शोध के बाद उन्होंने एक ज्योमेट्री इंजन बनाया जो थ्री – डी ग्राफिक्स को सॉफ्टवेयर से प्रोसेस करके हार्डवेयर में पहुंचा देता था।

 

क्लार्क इस टेक्नोलॉजी से मंत्रमुग्ध थे। उन्होंने अपने इस इंजन को प्रतिष्ठित कंप्यूटर कंपनियों को बेचने की कोशिश की, लेकिन किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई।

 

क्लार्क इसकी भावी सफलता के बारे में इतने उत्साहित थे कि उन्होंने खुद मैदान में उतरने का फैसला किया। अपनी शोध टीम के छः सदस्यों के साथ उन्होंने 1982 में स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी छोड़ दी और सिलिकॉन ग्राफ़िक्स की स्थापना की, जहां उन्होंने थ्री – डी इंजन बनाया।

 

एस. जी. आई. की मशीनों से कंप्यूटर पर वस्तुओं की कल्पना की जा सकती थी, उन्हें घुमाया जा सकता था और उसी तरह काम करवाया जा सकता था, जिस तरह असली वस्तुएं असली दुनिया में करती हैं। एस. जी. आई. के ग्राहकों में नासा, ब्रिटिश एरोस्पेस और अमेरिकी सेना शामिल थे।

 

जब हॉलीवुड फिल्म उद्योग ने एस जी आई टेक्नोलॉजी की संभावनाओं को देखा, तो जुरैसिक पार्क और टर्मिनेटर टू जैसी  फिल्मों में विशेष प्रभाव डालने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया। परिणामस्वरूप कंपनी ने तेजी से तरक्की की और 1994 में इसकी वार्षिक आमदनी 2 अरब डॉलर हो गयी।

 

क्लार्क अमीर बन गए थे। बहरहाल, फरवरी 1994 में क्लार्क ने एस जी आई कंपनी छोड़ दी, क्योंकि वे एस. जी. आई. की महंगी टेक्नोलॉजी ओ सस्ता करके आम ग्राहक की पहुँच में लाना चाहते थे, जबकि कंपनी के बाकी लोग इसके लिए तैयार नहीं थे।

 

लेकिन क्लार्क हाथ पर हाथ रखकर बैठने वालों में से नहीं थे। जिस दिन उन्होंने कंपनी से इस्तीफ़ा दिया, उसी दिन उन्होंने एक प्रतिभावान युवा कंप्यूटर प्रोग्रामर मार्क एन्ड्रेसन को एक ई – मेल भेजा। क्लार्क की दिलचस्पी एन. सी. एस. ए. मोज़ेक ब्राउज़र के आविष्कार में थी, एन्ड्रेसन ने उसी समय किया था।

 

एंड्रेसन को लग रहा था कि यह ब्राउज़र इंटरैक्टिव टेलीविज़न के लिए आदर्श रहेगा। उस वक़्त इन्टरनेट शुरुआती दौर में ही था, लेकिन क्लार्क ने दूरंदेशी से भांप लिया कि ब्राउज़र के लिए इन्टरनेट से अच्छा बाजार दूसरा नहीं हैं।

 

1994 में दोनों ने मिलकर मोज़ेक कम्युनिकेशन्स कारपोरेशन की स्थापना की जिसमें, क्लार्क ने 60 लाख डॉलर का निवेश किया। यही वह कंपनी थी, जो बाद में नेटस्केप नाम से मशहूर हुई।

 

क्लार्क हर ग्राहक को नेटस्केप ब्राउज़र मुफ्त देते थे, लेकिन कंपनियों से उसकी अच्छी कीमत वसूलते थे। इस चतुर रणनीति के चलते 1996 तक नेटस्केप ने 80 प्रतिशत बाजार पर कब्ज़ा जमा लिया।

 

जब अगस्त 1995 में कंपनी का आई.पी.ओ. निकला, तो कंपनी का मूल्य लगभग 2 अरब डॉलर आंका गया, जबकि क्लार्क का निवेश केवल 60 लाख डॉलर था। क्लार्क इन्टरनेट के पहले अरबपती  बन गए। अगर माइक्रोसॉफ्ट इस क्षेत्र में नहीं उतरता, तो नेटस्केप आज भी इन्टरनेट का सबसे लोकप्रिय ब्राउज़र होता।

 

हालांकि शुरुआत में माइक्रोसॉफ्ट ने इन्टरनेट की संभावना को परखने में बहुत देर कर दी, लेकिन जब उसे स्थिति समझ में आ गयी, तो वह पूरी तेजी से इन्टरनेट एक्स्प्लोरर लेकर ब्राउज़र बाजार में उतरा।

 

नेटस्केप इतने बड़े प्रतिद्वंद्वी से मुकाबला नहीं कर पाया और अंत में इसे अमेरिका ऑनलाइन ने खरीद लिया। आज क्लार्क के पास एक अरब डॉलर की संपत्ति हैं। लेकिन क्लार्क की उद्यमिता की भूख अभी ख़त्म नहीं हुई थी। उन्होंने स्वास्थ्य – सेवा पर केन्द्रित हैल्दीयन नाम की कंपनी शुरू की।

 

उनका यह तीसरा बिजनेस भी मल्टीबिलियन डॉलर की बिजनेस साबित हुई इस तरह दो दशक के अंतराल में जिम क्लार्क ने तीन अविश्वसनीय रूप से सफल कंपनियां शुरू की और यह साबित किया कि नया काम करना अमीर बनने की दिशा में पहला और अचूक कदम हैं.

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