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भगवान महावीर के अनमोल बातें

साधक को सम्बोधित करते हुए भगवान् महावीर ने कहा था –

हे आत्मविद साधक। जो बीत गया सो बीत गया। शेष रहे जीवन को ही लक्ष्य में रखते हुए प्राप्त अवसर को परख। समय का मूल्य समझ।

 

समय का मूल्य जानने वाला साधक ही पण्डित होता हैं। जीवन का समय भी अल्प ही हैं। इस अल्प जीवन से ही महाजीवन का संगीत बहता हैं। लेकिन यह संगीत उसी जीवन से बहेगा जिस जीवन में समय की परख जागेगी।

 

लेकिन मनुष्य की यह त्रासदी हैं की वह इस छोटे से जीवन को बिताने के लिए भी चिंतित रहता हैं , और जीवन बिताने के लिए आवश्यक साधनों को जुटाने में ही अमूल्य जीवन को गंवा देता हैं।

 

एक जगह एक उत्सव चल रहा था। स्टेज सजी थी। अनेक गायक अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले थे। एक नया गायक आया। उसने आयोजकों से कुछ समय की मांग की। लेकिन गायक अधिक थे और समय कम था इसलिए उसे समय देने से इंकार कर दिया गया। उस नए गायक ने बहुत अनुनय की और अंततः उसे पंद्रह मिनट का समय दे दिया गया।

 

उसका समय प्रारम्भ हुआ। उसने अपने सितार को सजाना – संवारना प्रारम्भ किया। वह कभी एक कीलों को ढीली करता , तो कभी दूसरी को कसता। इसी में उसने पांच मिनट बिता दिए। मंच के आयोजक ने उसे समय का ध्यान दिलाया। लेकिन वह अपने साज को ही संवार नहीं पाया। आखिर एक मिनट शेष बची थी।

 

आयोजक ने कहा – गायक ! कोई पंक्ति गाना चाहो तो गाओ , अभी एक मिनट शेष हैं। गायक बोला – अभी शुरू करने ही वाला हूँ। और बिना गाये ही उसके पंद्रह मिनट पूर्ण हो गए। उसे स्टेज से नीचे उतार दिया गया।

 

ठीक ऐसे ही मनुष्य को अति शुभ पुण्योदय से यह मानव – जन्म मिलता हैं , लेकिन वह शरीर रुपी साज को संवारने में ही अपने समय को गंवा देता हैं। धर्म – रुपी गीत वह गा ही नहीं पाता हैं की उसके मंच से ओझल होने का समय आ जाता हैं।

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