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उत्तम पुरुषों की संपत्ति – ज्ञानवर्धक कहानी

उत्तम पुरुषों की संपत्ति का वर्णन करने वाला एक सूक्त हैं –

कष्टपीड़ितों के कष्ट मिटाना ही उत्तम लोगों की संपत्ति का एकमात्र फल हैं।

श्रेष्ठ पुरुष वही है जो स्वयं कष्ट झेल कर भी अन्यों को कष्टमुक्त करते हैं। पर – कष्ट – मुक्ति ही उनकी वास्तविक संपदा होती हैं।

प्राचीन युग की एक अतिप्रसिद्ध कथा हैं।

 

रंतिदेव एक अतिप्रसिद्ध दानी सम्राट हुए है। वे द्वार पर आये हुए किसी भी दुखी को दुःखसहित मुड़ने नहीं देते थे। जो भी उनके पास पहुंचता था , वह सुखी और समृद्ध होकर लौटता था।

 

एक बार उनके राज्य में अकाल पडा। रंतिदेव ने अपने कोष के दरवाजे खोल दिए , लेकिन कुछ दिनों के बाद अन्न और धन्न चुक गया। रंतिदेव और उनका स्वयं का परिवार भी भोजन न पा सका। उन्होनें पत्नी और पुत्र के साथ नगर छोड़ दिया। वे एक जंगल में पहुंचे। वे चालीस दिनों से निराहार और निर्जल थे। उनके कदम लडखडा रहे थे और हाथ काँप रहे थे।

 

किसी दिव्यशक्ति ने उन्हें तीन थाली भोजन भेंट किया। चालीस दिनों के पश्चात राजा – रानी और नन्हे राजकुमार को अन्न के दर्शन हुए थे। राजा ज्योंही भोजन करने बैठे तभी उन्हें विचार आया – हे भगवान् ! क्या बिना अतिथि को दान दिए आज भोजन करूँ ! कोई अतिथि आए तो उसे भोजन कराके ही मैं भोजन करना चाहता हूँ।

 

और तभी उनकी भावना फलीभूत हो उठी। रन्तिदेव ने देखा कि दो ब्राह्मण उन्हीं की ओर आ रहे हैं। श्रद्धा में डूबकर रन्तिदेव दोनों ब्राह्मणों को दो थालियाँ भेंट कर दी। ब्राह्मण भोजन करके विदा हो गए। फिर रन्तिदेव ने शेष एक थाली के भोजन को तीन भागों में बांटा , और जैसे ही वे भोजन प्रारम्भ करने लगे तो सहसा दो भूखे यात्री आ गए। रन्ति देव ने वह भोजन उन यात्रियों को खिला दिया।

 

अब एक गिलास पानी शेष था । राजा , रानी और राजकुमार तीनों के चेहरे पर शिकन की एक रेखा भी नहीं उभरी थी। उन्होनें एक गिलास पानी के तीन हिंस्से किये और ज्यों ही पीने लगे , त्यों ही एक मरणासन्न चाण्डाल दिखाई दिया। उसने इंगित से पानी की याचना की। करुणह्रदय रन्तिदेव ने वह पानी भी उस चाण्डाल को पिला दिया।

तभी आकाशवाणी हुई – रंतिदेव ! तुम्हारी दानशीलता से हम संतुष्ट हुए। कहो क्या चाहिए। जो मांगोगे , वही मिलेगा।

रन्तिदेव ने उत्तर दिया –

 

मुझे राज्य नहीं चाहिए। न स्वर्ग चाहिए और न ही मुझे मोक्ष की इच्छा हैं। मेरी तो यह इच्छा हैं कि मैं दीन – दुखियों की सेवा करता रहूँ। उन्हें कष्ट – विमुक्त करने में मुझे परम आनंद मिलता हैं ।

और देवता रंतिदेव के समक्ष नतमस्तक हो गए

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