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मधुर व्यवहारः प्रथम मनुष्य – धर्म

गुरुदेव योगिराज अक्सर फरमाया करते थे –

मिलकर बैठो और बांटकर खाओ , यही मानव धर्म हैं।

 

धर्म मनुष्यता से प्रारम्भ होता हैं। परस्पर स्नेह – सौजन्य और प्राप्त को बांटकर खाना यह मनुष्य के प्रथम धर्म का प्रतीक हैं। उपनिषदों में लिखा हैं – जो अकेला खाता हैं वह पापी हैं। जो बाँट कर खाता है वह धर्मात्मा हैं।

 

शिष्य ने गुरु से पूछा – गुरुदेव ! मनुष्य का धर्म कहाँ से प्रारम्भ होता हैं। गुरुदेव ने कहा – वत्स ! तुम्हारे प्रश्न का उत्तर एक – दो दिन बाद दूंगा।

दुसरे दिन एक व्यक्ति उस महात्मा के पास आया। उसने महात्मा को कुछ फल भेंट किये। महात्मा ने वे सभी फल खा लिए लेकिन उस व्यक्ति से कोइ बात नहीं की। उसकी ओर पीठ फेर कर बैठ गए। महात्मा का यह व्यवहार उसे बहुत बुरा लगा। वह बडबडाता हुआ चला गया।

 

गुरुदेव ने शिष्य से पूछा – वह व्यक्ति क्या कह रहा था ? शिष्य बोला – गुरुदेव ! वह व्यक्ति बहुत नाराज था और कह रहा था की कैसा है यह महात्मा , मुझसे बात तक नहीं की।

 

दुसरे दिन प्रातः एक व्यक्ति आया। उसने भी कुछ फल महात्मा को दिए। महात्मा ने उस व्यक्ति से वे फल लिए और बाहर गली में फ़ेंक दिए और उस व्यक्ति से मधुर वार्तालाप किया। लेकिन महात्मा के इस व्यवहार पर भी वह व्यक्ति नाराज होकर चला गया।

गुरु ने शिष्य से उस व्यक्ति की प्रतिक्रया के बारे में पूछा। शिष्य ने बताया की वह व्यक्ति भी आपके व्यवहार से अप्रसन्न था।

 

तीसरे दिन पुनः एक व्यक्ति ने महात्मा को फल भेंट किए। महात्मा ने उसके फल बड़े अहोभाव से स्वीकार किये। उसने उन फलों को आपस में बांटा और खाया। फिर उस व्यक्ति से बैठकर मधुर वार्तालाप किया। उसे धर्म और अधर्म का मार्ग बताया। वह व्यक्ति प्रसन्न होकर लौटा।

 

शिष्य ने गुरु से बताया – गुरुदेव ! यह व्यक्ति अतिप्रसन्न था। आपकी प्रशंसा करते हुए वह प्रसन्नमन लौटा हैं।

गुरु ने कहा – वत्स ! मनुष्य का सुव्यवहार उसका प्रथम धर्म है। मधुर व्यवहार से ही उसके धर्म का प्रारम्भ होता हैं। खाओ , खिलाओ और मधुर वाणी बोलो – यही मधुर व्यवहार हैं और यहीं से धर्म का प्रारम्भ होता हैं।

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