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सेवा ही मेरा संन्यास हैं – भगवान् महावीर

भगवान् महावीर स्वामी ने सेवा को बहुत ऊंचा स्थान दिया हैं। स्थानांग सूत्र में प्रभु का वचन हैं –

अम्लान भाव से सदैव रोगी की सेवा के लिए तत्पर रहना चाहिए।

 

सेवा सबसे महान धर्म हैं। सेवा भाव करुणा – पूर्ण ह्रदय का अमृत हैं। सेवा में बाधक किसी भी बाधा को मिटा देना चाहिए। वह बाधा बेशक हमारे पवित्र संन्यास के स्वरुप वस्त्र ही क्यों न हो। स्वामी विवेकानंद विश्वधर्म सम्मलेन में भाग लेने अमेरिका जाने वाले थे। उनके भक्तों ने उनके किराए के लिए कुछ धन एकत्रित किया था।

 

लेकिन उन्ही दिनों बंगाल में महामारी फैल गयी। स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका – यात्रा के लिए संचित सारा धन महामारी से पीड़ित लोगों की सेवा में अर्पित कर दिया और इतना ही नहीं वे स्वयं उन बीमार लोगों की सेवा में जुट गए। वे अपने हाथों से रोगियों की सेवा करते थे।

 

एक सन्यासी को साधारण रोगियों की सेवा में जुटे देखकर कुछ कट्टरपंथी भक्त बेचैन हो गए। उन्होंने विवेकानंद से कहा – स्वामी जी ! आप सन्यासी हैं। आपको इन साधारण रोगियों की सेवा करते हुए देखकर हमें अच्छा नहीं लगता हैं। आपके गेरुए परिधान की प्रतिष्ठा के प्रतिकूल हैं आपका यह कार्य।

 

उन लोगों की बात सुनकर स्वामी विवेकानंद को बड़ा कष्ट हुआ। उन्होंने संन्यास के प्रतीक स्वरुप अपने परिधान को उतार दिया , और बोले – मेरा संन्यास भी यदि मुझे रोगियों की सेवा की अनुमति नहीं देगा या उसमे बाधा बनेगा तो मैं उसे भी त्याग दूंगा। और वे पुनः रोगियों की सेवा में तल्लीन हो गए।

 

सेवा धर्म सर्वोच्च हैं। संन्यास सेवा में बाधक नहीं , साधक होता हैं , लेकिन धर्मान्धता की विपरीत सोच हैं। वह सन्यासी को केवल पूज्य मानता हैं। उसे साधारण लोगों की सेवा करते नहीं देख सकता , लेकिन सेवा से ही सन्यासी , सन्यासी और पूज्य भाव को प्राप्त करता हैं।

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