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सौन्दर्यः असौंदर्य

कुरूपों का रूप हैं विद्या। विद्या अर्थात सद्गुणों से कुरूप मनुष्य भी सुरूप हो जाता है। वस्तुतः दैहिक सौंदर्य वास्तविक सौंदर्य नहीं होता हैं। सद्गुणों से ही मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य प्रगट होता है।

 

यूनान के महान दार्शनिक सुकरात कुरूप थे। वे अपने पास एक दर्पण रखते थे और अक्सर अपना मुख उसमे निहारा करते थे। सुकरात जैसे महान व्यक्ति को पुनः – पुनः दर्पण देखते हुए पाकर लोगों को बड़ा आश्चर्य होता था।

 

एक दिन कुछ शिष्यों ने सुकरात से पूछा था – पूज्यवर ! आप दर्पण क्यों देखा करते हैं?

 

सुकरात का उत्तर था – मैं जानता हूँ कि मैं बहुत कुरूप हूँ। लेकिन मैं दर्पण इसलिए देखता हूँ कि मुझे मेरी कुरूपता सदैव स्मरण रहे और उस कुरूपता को मिटाने के लिए मैं सदैव नेक कार्य करता रहूँ। शिष्यों ! सुकर्म मनुष्य के भीतरी सौंदर्य को अनावृत कर देते हैं और भीतरी सौंदर्य उघड जाए तो बाह्य असौंदर्य टीस नहीं देता हैं।

 

शिष्य सुकरात की बात सुनकर नतमस्तक हो गए।

 

लेकिन सुकरात की बात अभी अधूरी थी। वे बोले – और उन लोगों को भी दर्पण देखना चाहिए जो सुरूप हैं दर्पण उन्हें यह शिक्षा देगा कि तुम सुन्दर हो, इसलिए सुन्दर कार्य करके अपने सौंदर्य को स्थायित्व प्रदान करो।

 

महापुरुष की छोटी से छोटी दैनिक क्रियाओं में भी महान दर्शन छिपा होता है। वे जो भी करते हैं उस को करने के पीछे रहस्य को जानकर मनुष्य महान शिक्षाएं ग्रहण कर सकते हैं।

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