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सत्संग बड़ा या तप – Satsang is big or tenacity?

चाणक्य नीति मजें सत्संग की महिमा का गान करते हुए कहा गया हैं –

सत्संग स्वर्ग में निवास करने के तुल्य होता हैं।

सत्संग जीवन में स्वर्ग का द्वार खोलता हैं। सत्संग से ही वह अलभ्य सुलभ होता हैं जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। अनंत अनादि से भटकी हुई आत्मा को सत्संग ही उसके स्वरुप से परिचित कराता हैं और उसके दुःख – क्लेशों को काट देता हैं। सत्संग इसीलिए महामहिमामय हैं। इसीलिए जप – तप आदि से भी सर्वोच्च स्थान सत्संग को प्राप्त हुआ हैं। सत्संग के महात्म्य को दर्शाता एक प्राचीन दृष्टांत चित्र देखिये –

 

एक बार महर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वमित्र के मध्य इस बात पर विवाद छिड़ गया कि सत्संग का अधिक माहात्म्य है कि तपस्या का। वशिष्ठ ने सत्संग को श्रेष्ठ बताया तो विश्वामित्र ने तपस्या को। अंततः किसी निर्णायक से निर्णय कराने का फैसला किया गया।

 

दोनों ऋषि शेषनाग के पास पहुंचे। और उनसे कहा – हे शेषनाग ! आप ही निर्णय दीजिये की सत्संग बड़ा है या तपस्या।

 

शेषनाग ने कहा – हे ऋषियों ! पृथ्वी का महाभार मेरे सिर पर हैं। यदि आप इसे कुछ समय के लिए ग्रहण कर सको तो मैं कुछ निर्णय दूं।

 

विश्वामित्र बोले – मैं दस हजार वर्षों का तप दाँव पर लगाता हूँ , पृथ्वी कुछ पल के लिए स्थिर रहे। जैसे ही शेषनाग ने अपना सिर भारमुक्त करना चाहा तो पूरी पृथ्वी कम्पयमान हो उठी।

 

तत्पश्चात महर्षि वशिष्ठ ने कहा – मैं आधे पल के सत्संग को दाँव पर लगाता हूँ , पृथ्वी स्थिर रहे। और शेषनाग ने अपने सिर को पृथ्वी के नीचे से हटा लिया।

 

पृथ्वी अडोल अकंप स्थिर रही।

शेषनाग मौन रहे। विश्वामित्र अधीर होते हुए बोले – नागराज ! आपने अपना निर्णय नहीं दिया। बताइये तपस्या बड़ी हैं या सत्संग ?

 

शेषनाग ने कहा – ऋषिदेव ! यह तो स्वयं सिद्ध हो चुका हैं। दस हजार वर्षों का तप पृथ्वी के भार को ग्रहण नहीं कर सका , जबकि आधे पल के सत्संग ने पृथ्वी के भार को उठा लिया हैं।

और विश्वामित्र को अपनी पराजय स्वीकार करनी पड़ी।

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