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संसार के स्वरुप – भगवान् महावीर

संसार के स्वरुप का चित्रण खींचते हुए भगवान् महावीर ने कहा था – संसार के समस्त गीत विलाप – स्वरुप हैं , सभी नाटक विडंबना स्वरुप हैं , समस्त आभूषण भार – स्वरुप हैं और समस्त कामवासनाएं दुःखरूप हैं।

 

ऐसे ही हैं संसार के सुख है। संसार की मुस्कान ऐसी हैं कि मनुष्य मुस्कुरा भी नहीं पाता हैं कि रोदन फूटने को तत्पर रहती हैं। इसी सत्य के दर्शन कीजिये थावर्च्चापुत्र के जीवन दृष्टांत में :- भगवान् नेमिनाथ का शासनकाल प्रगति पर था।

 

द्वारिका नगरी में एक धनाढ्य श्रेष्ठीपुत्र रहते थे , जिनका नाम था थावर्च्चापुत्र। नन्हा थावर्च्चापुत्र एक दिन अपने महल के छत पर खेल रहा था कि उसे मधुर संगीत की ध्वनि सुनाई दी। संगीत स्वर उसे बड़े कर्णप्रिय लगे। माँ ने उसे नीचे से आवाज दी – बेटे ! भोजन तैयार हैं। बालक ने माँ की आवाज अनसुनी कर दी।

 

अनेक पुकारों के बाद भी जब वह थावर्च्चपुत्र नीचे नहीं आया , तो माता छत पर गयी और पुत्र से बोली – चलो , पुत्र भोजन ठंडा हो रहा हैं। बेटे ने कहा – माँ ! ये गीत मुझे बहुत प्रिय लग रहे हैं। इन्हें गीत ही कहते हैं न , माँ ?

 

थावर्च्चापुत्र की बात सुनकर माता मुस्कुराई और बोली – हाँ बेटे ! ये गीत ही हैं। बालक ने पुनः प्रश्न किया – माँ ये गीत क्यों गाये जा रहे हैं। माँ ने उत्तर दिया – बेटे हमारे पडोसी के घर पुत्र पैदा हुआ हैं। उसी की ख़ुशी में यह गीत गाये जा रहे हैं।

बालक ने कहा – माँ ! ये गीत मुझे बहुत प्रिय लग रहे हैं। मैं इन्हें छोड़ना नहीं चाहता हूँ। चाहता हूँ , निरंतर सुनता रहूँ।

माँ ने कहा – वत्स ! पहले खाना खा लो। उसके बाद पुनः ऊपर आकर सुन लेना।

 

थावर्च्चापुत्र नीचे आ गया। उसने शीघ्रता से भोजन किया और पुनः अपने महल की छत पर चढ़ गया गीत सुनने के लिए। लेकिन यह क्या ! ये गीत अब तो अति कटु हो गए थे। उस बालक को छत पर ठहरना कठिन हो गया। वह दौड़ कर अपनी माँ के पास आ गया। और पूछा –

माँ ! इतनी ही देर में वे गीत अपनी मिठास खो बैठे हैं।

अब मुझे वे प्रिय नहीं लग रहे हैं। माँ अब ये गीत मधुर क्यों नहीं रहे हैं ?

 

थावर्च्चा सेठानी ने अपने नन्हे पुत्र को कंठ से लगाते हुए कहा – पुत्र ! अब इन्हें गीत नहीं कहते हैं। ये रोदन हैं और रोदन अप्रिय ही लगते हैं।

थावर्च्चापुत्र ने पुनः प्रश्न किया – मा ! अब गीत बंद क्यों कर दिए गए हैं ?

 

थावर्च्चापुत्र सेठानी ने अपने पुत्र को सारी बात कह सुनाई – बेटे कुछ देर पहले हमारे पड़ोस में जो बच्चा पैदा हुआ था। अब वह मर गया हैं। बेटे ! यह संसार की रीत हैं की यहाँ जन्म पर ख़ुशी मनाई जाती हैं और मृत्यु पर शोक व्यक्त किया जाता हैं। उस शोक को रोदन कहते हैं। गीत चूंकि भीतर की शोक को प्रगट करते हैं इसलिए मधुर लगते हैं , और रोदन भीतर के दुःख को व्यक्त करता हैं इसलिए वह अच्छा नहीं लगता हैं।

 

माता की पूरी बात सुनकर थावर्च्चापुत्र के ह्रदय में अनेक प्रश्न उठ खड़े हुए। उसने पूछा – माँ ! क्या सभी को एक दिन मरना होगा ?

सेठानी बोली – हाँ पुत्र ! यह तो सृष्टि का नियम हैं। जो जन्म लेता हैं , उसे एक दिन अवश्य मरना होता हैं।

 

बालक ने गंभीर होते हुए पुनः एक प्रश्न किया – माँ ! क्या मुझे भी एक दिन मरना होगा ? पुत्र की बात सुनकर थावर्च्चा सेठानी ने अपने पुत्र के मुंह पर हाथ रखते हुए कहा – पुत्र ! ऐसा मत कहो। तुम क्यों मरो। मरे तुम्हारे शत्रु।

पुत्र बोला – माँ ! क्या मैं अमर हूँ ? मैं कभी नहीं मरूंगा ?

 

तत्त्वज्ञा थावर्च्चा सेठानी पुत्र के सवालों में उलझ गयी थी। उसने अपने ह्रदय को कठोर करते हुए पुत्र से कहा – बेटे ! इस संसार में कोई अमर नहीं हैं। एक दिन तुझे भी मरना होगा।

 

थावर्च्चापुत्र पुनः गंभीर हो गया। उसने पूछा – माँ ! क्या मृत्यु से बचने का कोई मार्ग नहीं हैं ? सेठानी बोली – हैं बेटे ! एक मार्ग हैं , और इस मार्ग को अरिष्टनेमि भगवान् जानते हैं। जो उनका हो जाता हैं , उसे मृत्यु का भय समाप्त हो जाता हैं। वह अमर हो जाता हैं।

 

माँ ! मैं भी अमर बनूंगा। मुझे मृत्यु अप्रिय हैं। मैं अमर होना चाहूंगा। थावर्च्चापुत्र ने माँ से कहा। और फिर बाद में थावर्च्चा ने माता से प्राप्त अमरता का पता अपने ह्रदय में लिख लिया। वे भगवान् श्री अरिष्टनेमि के शिष्य बनकर अजर – अमर हो गये।

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