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क्षणमिह सज्जन – संगतिः

बारह सौ वर्ष पूर्वा आचार्य शंकर ने सत्संगति की महत्ता का उद्घोष करते हुए कहा था –

रे मन ! तू सदा तत्त्वों का चिंतन कर। नश्वर धन की चिंता का परित्याग कर। इस असार संसार रूप महासागर से सज्जनों की संगती का एक पल ही पार उतारने वाली नौका के सदृश हैं।

 

महापुरुषों का जीवन सुर्य के सामान होता है। जो उन्हें देखता है, सुनता और अनुभव करता है वह स्वयं प्रकाश से भर जाता है। अतः सदैव महापुरुषों – सज्जन पुरुषों के सत्संग के लिए लालायित रहना चाहिए।

 

भगवान् महावीर स्वामी एक राजगृह नगरी के बाहर गुणशील उद्यान में पधारे। महामंत्री अभय कुमार को जैसे ही भगवान् के पधारने की सुचना मिली, वे हर्ष – विभोर होकर उनके दर्शन के लिए चल पड़े। वे इतने भाव – विभोर थे किपैरों में जूता तक पहनना भूल गए थे। नंगे पैर पैदल ही वो गुणशील की ओर बढे जा रहे थे।

 

मार्ग में उनके पैर में शूल चुभ गयी। वे लंगडाते हुए चलने लगे। उस युग के कुख्यात कसाई काल किशोर का पुत्र सुलाश भी वहीँ शिकार के लिए भटक रहा था। महामंत्री अभय को नंगे पैर, लंगडाते हुए और बिना किसी सुविधा या सुरक्षा के यूँ घूमते देखकर सुलस को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह अभय के निकट आया और बोला – महामंत्री ! बिना सवारी और नंगे पैर आज अकेले ही कहाँ जा रहे हैं?

 

अभय कुमार बोले – सुलस  ! पहले मेरे पैर का काँटा निकालो। तब मैं अपने बारे में बताउंगा।

सुलस ने तीखे तीर की नोंक से अभय के पैर से काँटा निकाल दिया। फिर उसने अपना प्रश्न दोहरा दिया। अभय कुमार बोले – सुलस! भगवान् महावीर हमारे उद्यान में पधारे हैं। मैं उन्हीं के दर्शन के लिए जा रहा हूँ।

 

सुलस ने पुनः प्रश्न किया – महावीर कौन हैं? वे क्या करते हैं? अभय कुमार बोले – सुलस! जैसे तुमने मेरे पैर से काँटा निकालकर मुझे पीड़ा से मुक्त कर दिया है। भगवान महावीर भी कांटे निकालने का काम करते हैं। हमारे जीवन में जो काम – क्रोध आदि के अनंत कांटे चुभे हुए हैं, महावीर उन काँटों को निकालते हैं।

 

सुलस की जिज्ञासा प्रबल हो उठी। वह बोला – क्या मैं भी उनके पास चल सकता हूँ?

अभय कुमार बोले – क्यों नहीं ! चलो, हम दोनों उनके दर्शन, प्रवचन का आनंद लेते है। इस प्रकार अभय कुमार और सुलस दोनों भगवान् महावीर के समवशरण में पहुंचे।

 

भगवान् महावीर ने धर्म की गंगा बहांयी। सुलस उस प्रवचन – गंगा में गोता लगाकर धन्य हो उठा। उसे अपने पैतृक व्यवसाय से घृणा हो गयी। उसने भगवान् महावीर से श्रावक – जीवन के बारह व्रत अंगीकार किये।

 

घर लौटकर उसने अपने पिता को भी कसाई – कर्म के निवृत्त होने की प्रेरणा दी। लेकिन पिता क्रूरकर्मा व्यक्ति था, उसने सुलस की बातों को अनसुना कर दिया।

 

सुलस की आत्मा पर धर्म का रंग गहरा हो चुका था। उसने अपनी पत्नी सहित अपना अलग घर बसा लिया। वह पितृमहल छोड़कर एक झोपडी में रहने लगा और उसने व्यवसाय के रूप में रूई की पुठियाँ बनाकर बेचना शुरू कर दिया।

कहा जाता है – वह कसाई का बेटा पूणिया श्रावक के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

 

यह हैं सत्संगति का अपूर्व चित्र। महावीर के पास कुछ ही देर के सत्संग ने एक शिकारी और कसाई – कुल में उत्पन्न युवक की जीवन धारा को मोड़ दिया था।

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