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सच्चा कलाकार हिंदी कहानी

विजयनगर में राजा कृष्णदेव का दरबार लगा हुआ था। मौसम काफी खुशगवार था। वर्षा रानी की रिमझिम फुहारें पड़ रही थी।

यह वातावरण महाराज को बड़ा ही प्रिय लग रहा था। तभी राजा कृष्णदेव ने अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहा, मेरी हार्दिक इच्छा हैं कि इस बार भी हम वर्षा उत्सव हमेशा की तरह धूमधाम से मनाएं।

उनकी बात सुनकर सभी दरबारीजन भी प्रसन्न हो गए।

एक मंत्री ने अपनी राय प्रकट करते हुए कहा कि इस अवसर पर होने वाले आयोजन में राज्य के सभी कलाकार अपनी – अपनी कला का प्रदर्शन करें और सर्वश्रेष्ठ कलाकार को महाराज की ओर से पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।

इस तरह अनोखी वर्षा – उत्सव की योजना को अंतिम रूप दिया गया।

लेकिन सम्मान कैसे कलाकार का किया जाए ? महाराज ने पूछा।

तब मंत्रीजी ने सुझाव देते हुए कहा, महाराज ! हमारे राजदरबार में बहुत से प्रसिद्ध कलाकार हैं। इन्हीं में से जो श्रेष्ठ हैं उस कलाकार को आप उचित पारितोषिक प्रदान करें।

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तेनालीराम को मंत्रीजी का यह सुझाव कुछ पसंद न आया। उसने अपनी राय देते हुए कहा, महाराज इस बार वास्तव में कोई सच्चा कलाकार आप द्वारा सम्मानित होना चाहिए।

सच्चा कलाकार, आखिर तुम कहना क्या चाहते हो तेनालीराम ?

राजा कृष्णदेव राय ने आँखें तरेरते हुए तेनालीराम से पूछा।

महाराज, सच्चा शिल्पी कभी किसी को प्रसन्न करने के लिए मूर्तियाँ नहीं गढ़ता। मैंने एक ऐसे शिल्पी को भी देखा हैं, जो मूर्तियाँ गढ़ते – गढ़ते जड़ हो गया हैं, उसे अपने आस – पास के वातावरण की भी कोई सुधि नहीं हैं।

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तब तो हम अवश्य ही उस शिल्पी और उसकी कला को देखना चाहेंगे। राजा कृष्णदेव ने जिज्ञासा प्रकट की।

ठीक हैं महाराज ! मैं आपको उस शिल्पी से मिलाने कल ले चलूँगा। तेनालीराम ने कहा।

अगले दिन राजा कृष्णदेव घोड़े पर बैठकर तेनालीराम, कुछ मंत्रियों और सभासदों को साथ लेकर उस शिल्पी से मिलने चल पड़े।

चलते – चलते वे एक जंगल में काले पहाड़ के निकट पहुंचे। उस पहाड़ की गुफा से ठक – ठक की आवाज निरंतर आ रही थी।

जब राजा कृष्णदेव गुफा के अन्दर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनके चारों ओर काले पत्थर की मूर्तियाँ ही मूर्तियाँ विद्यमान हैं।

उन्हीं मूर्तियों के मध्य वह शिल्पकार ऐसे बैठा था – जैसे वह स्वयं भी कोई मूर्ति हो।

राजा उसके पास पहुंचे और पूछा, आप किसकी मूर्ति बना रहे हैं ?

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उस कलाकार ने जवाब दिया, वर्षा रानी की। जमीन पर लहलहाती फसलें, ऊपर आकाश में उमड़ते – घुमड़ते बादल और बीच में नृत्य करती वर्षा रानी ….|

लेकिन आप इन मूर्तियों को बाजार में क्यों नहीं बेचते ? इन मूर्तियों को आपने गुफा में ही क्यों रखा हैं। जब ये मूर्तियाँ बाजार में बिकेगी, तो आपके नाम की कीर्ति भी फैलेगी।

यह काम मेरा नहीं, सौदागरों का होता हैं महाराज ! मैं तो मूर्तियां बनाता हूँ और मुझे इसी में आनंद मिलता हैं। कुछ व्यापारी हैं, जो ये मूर्तियाँ ले जाते हैं और मुझे जीवनयापन के लिए कुछ पैसा मिल जाता हैं।

उस कलाकार की बात सुनकर राजा कृष्णदेव ने पूरे राज्य में घोषणा करवा दी, इस बार वर्षा ऋतू पर वनवासी मूर्तिकार की कला को सम्मानित किया जाएगा और इस मूर्तिकार द्वारा बनाई गए वर्षा रानी की मूर्ति को शाही उद्यान के बीचोबीच प्रतिष्ठित किया जाएगा।

फिर महाराज ने तेनालीराम की बुद्धिमत्ता की मुक्त कंठ से प्रशंसा की, क्योंकि उसने महाराज को सच्चे कलाकार से मिलवाया था।

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