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धर्म हैं परम धन

ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में धर्म का स्वरुप अतिसुन्दर शब्दों में प्रगट किया गया हैं –

धर्म से श्रेष्ठ अन्य कोई बन्धु नहीं हैं।  धर्म से बढ़कर अन्य कोई धन नहीं है। धर्म से अधिक प्रिय और उत्तम कुछ नहीं हैं , अतः यत्नपूर्वक धर्म की रक्षा करनी चाहिए। धर्म सर्वोपरि हैं। परम बन्धु हैं धर्म। परम धन हैं धर्म। समस्त धन – धान्यादि तब तक हैं जब तक आँख खुली हैं। आँख बंद होने के पश्चात धर्म रुपी धन ही मनुष्य की वास्तविक पूंजी होती हैं। इसलिए कहा हैं धर्म ही परम धन हैं।

 

बौद्ध साहित्य की एक प्रसिद्ध कथा हैं।

बुद्ध के एक शिष्य थे कोटीकर्ण श्रोण। वे प्रव्रजित होने से पूर्व बहुत धनी थे। वे अपने कानों में जो कुंडल पहनते थे , उन कुण्डलों की कीमत ही करोड़ों रूपए की थी। वे बहुत पहुंचे हुए संत हुए हैं। एक बार वे प्रवचन कर रहे थे। नगर की प्रसिद्ध सेठानी कात्यायनी बुद्ध की शिष्या थी , वह भी कोटिकर्ण भिक्षु की प्रवचन सभा में बैठी थी।

 

कोटिकर्ण श्रोण वास्तविक धन धर्म पर गंभीर चिंतनपरक प्रवचन सुना रहे थे। जनता उनकी वाणी सुनकर मंत्रमुग्ध हुई जा रही थी। संध्या ढलने लगी थी। प्रवचन अभी शेष था

 

कात्यायनी ने अपनी दासी को कहा कि तुम घर जाकर दीपक जला कर आओ , मैं प्रवचन को अधूरा नहीं छोड़ सकती हूँ। दासी घर गयी। उसने देखा – चोरों ने घर को लूट लिया हैं। धन की गठरियाँ बाँध ली हैं और शेष  धन समेट रहे है।

 

दासी उल्टे पैरों कात्यायनी के पास पहुंची। चोरों का सरदार भी दासी के पीछे पीछे था। दासी ने सेठानी से कहा – मालकिन ! चोरों ने सारा धन लूट लिया हैं। कात्यायनी बोली – चिंता मत कर तू ! वह धन तो झूठा हैं। निःसार हैं। सच्चा धन तो यह हैं जो कोटिकर्ण बाँट रहे हैं।

 

कात्यायनी की बात चोरों के सरदार ने सुनी। और वह भी उस सच्चे धन को परखने के लिए कुछ समय वहाँ ठहर गया। और कुछ ही पलों के उसके श्रवण ने उसे परिचित करा दिया। वह भागा वापिस और अपने साथियों को बोला – मित्रों ! ठोकर मारो इस धन को।

 

यह धन तो झूठा हैं। आओ , मैं तुम्हें परम धनी बनने का का मार्ग दिखलाऊं। और सभी चोर कात्यायनी के धन को छोड़कर कोटिकर्ण की प्रवचन सभा में आ गए। और धर्मरूपी सच्चा धन पाकर वे धन्य हो गए। वे फिर लौटे नहीं। वे भिक्षु बनकर धर्म रुपी धन का संचय करने लगे।

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