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राज्य के सच्चे हितैषी

एक दिन राजदरबार में इस बात पर बहस हो रही थी कि राज्य की समृद्धि के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति कौन होता हैं ?

एक दरबारी ने कहा, राज्य की समृद्धि वहाँ के राजा पर निर्भर करती हैं, दुष्टों को दंड देकर, प्रजा के अधिकारों की रक्षा कर, अंदरूनी अशान्ति और बाहरी आक्रमण से राज्य की रक्षा कर एक राजा ही अपने राज्य में खुशहाली ला सकता हैं।

तब राजा कृष्णदेव ने कहा, मेरे विचार से राज्य की समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण व्यक्ति तो हैं, पर वह अकेला ही समृद्धि नहीं ला सकता हैं जब तक कि उसे सभी का सहयोग न मिले।

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तभी राजकुमारी ने कहा, राज्य की असली रीढ़ तो किसान, मजदूर और दुसरे मेहनतकश लोग हैं।

तब राजा कृष्णदेव ने कहा, लेकिन यह कैसे संभव हैं ? पढ़े – लिखे न होने के कारण मेहनतकश लोगों को दूसरों पर निर्भर करना पड़ता हैं।

महाराज ! मेरे विचार से तो राज्य की समृद्धि के लिए मंत्री सबसे अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति होता हैं। प्रधानमंत्री ने फ़ौरन ही कह डाला।

यह कैसे संभव हो सकता हैं ? मंत्रियों को भी राजा पर निर्भर रहना पड़ता हैं, और फिर योग्य मंत्री भी कई बार ऐसे काम कर बैठते हैं जिनसे राज्य को भारी नुकसान उठाना पड़ता हैं। राजा कृष्णदेव ने कहा।

तभी सेनापति बोले, मेरे विचार में तो महाराज, राज्य का सेनापति ही राज्य की खुशहाली के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति होता हैं। अगर राजा सेनापति पर नियंत्रण न रखे तो सेनापति कभी भी राज्य की बागडोर पलट सकता हैं। राजा कृष्णदेव ने कहा।

तभी एक दरबारी बोला, महाराज ! तब तो सबसे महत्वपूर्ण वस्तु राज्य के किले ही हैं। जो राज्य की रक्षा करते हैं।

नहीं, नहीं, राजा कृष्णदेव बोले, राज्य की बहादुर जनता किलों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं।

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तब तो महाराज ब्राह्मण ही राज्य के सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं। राजगुरू ने अपनी हांकी।

राजा कृष्णदेव सबकी बातें सुनकर निराश से हो गए तो तेनाली से बोले, इस बारे में तुम्हारा क्या विचार हैं ?

जी, मेरे विचार में अच्छा और बुरा होने का ब्राह्मण से कोई सम्बन्ध नहीं हैं। अच्छा व्यक्ति चाहे ब्राह्मण हो या न हो, राज्य को लाभ पहुंचाएगा ही और फिर ब्राह्मण होकर भी कोई व्यक्ति राज्य को भारी नुक्सान पहुंचा सकता हैं। तेनालीराम ने अपना विचार बताते हुए कहा।

यह सुनकर राजगुरू ने गुस्से से बिफरकर कहा, तुम ब्राह्मणों पर मिथ्या आरोप लगा रहे हो। राज्य का कोई ब्राह्मण अपने राजा को हानि नहीं पहुंचा सकता, यह मेरा दावा हैं।

मैं आपके इस दावे को झूठा साबित कर दूंगा, राजगुरूजी पहले मेरी बातें सुनें जो व्यक्ति मूल रूप में अच्छा नहीं हैं वह ब्राह्मण होकर भी धन के लोभ में भारी अनर्थ कर सकता हैं। तेनालीराम ने राजगुरू को समझाते हुए कहा।

राजा ने बहस में जरूरत से अधिक गर्मी आते देख सभा को विसर्जित कर देना ही उचित समझा।

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धीरे – धीरे एक मास बीत गया। इस बात को अब सभी भूल चुके थे। तब तेनालीराम ने अपनी योजना राजा को बताई और नगरों के आठ प्रमुख ब्राह्मणों के पास पहुँच गए। उसें उन्हें बताया कि राजा कृष्णदेव इसी समय आठ चुने हुए ब्राह्मणों को चांदी की थालियों में स्वर्ण मुद्राएं रखकर देना चाहते हैं।

यह सुनकर ब्राह्मण बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने इसके प्रति आभार प्रदर्शित किया कि तेनालीराम ने उन्हें इस अवसर के लिए विशेष रूप से चुना हैं।

वे ब्राह्मण बोले, हम सभी स्नान कर दरबार में पहुँचते हैं।

स्नान के लिए समय नहीं हैं। महाराज तैयार बैठे हैं। ऐसा न हो कि दान का शुभ मुहूर्त निकल जाए और आप लोग स्नान ही करते रह जाए। तेनालीराम ने उन्हें समझाया, नहीं तो जाकर दुसरे ब्राह्मणों को बुला ले जाता हूँ।

ठहरिये, ठहरिये, तेनालीराम जी, हम अपने ऊपर थोड़ा सा जल छिड़क लेते हैं। इसे भी स्नान के बराबर ही माना जाएगा। उन ब्राह्मणों में से एक ने जल्दी से कहा।

तेनालीराम प्रत्युत्तर में कुछ न बोला। वह उनकी प्रतीक्षा करता रहा। ब्राह्मणों ने अपने – अपने ऊपर जल छिडका, नया तिलक लगाया और तेनालीराम के पीछे – पीछे दरबार में जा पहुंचे। दरबार में रखी हुई चांदी की आठ बड़ी – बड़ी थालियाँ और उनमें स्वर्णमुद्राएं देखकर तो ब्राह्मणों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा था।

राजा जब उन थालियों का दान करने लगे, तो तेनालीराम बोला, महाराज, आपको इस बात से कोई आपत्ति नहीं होगी कि इन ब्राह्मणों ने स्नान नहीं किया हैं। बेचारे जल्दी से जल्दी यहाँ उपस्थित होकर दान लेना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने ऊपर मात्र जल का छिडकाव ही कर लिया हैं।

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तब राजा कृष्णदेव ने क्रोध में भरकर पूछा, क्या तेनालीराम सच कह रहा हैं ?

ब्राह्मणों को जैसे सांप सूंघ गया। उन्होंने धीरे से स्वीकार कर लिया कि उन्होंने स्नान नहीं किया हैं और चुपके से वहाँ से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी।

तब तेनालीराम ने राजगुरू से कहा, कहिये राजगुरू, उस दिन जो बहस छिड़ी थी, उसके बारे में अब आपको क्या कहना हैं ? देखा धन के लालच में ये लोग अपना धर्म निभाना ही भूल गए, केवल ब्राह्मण होने से ही किसी का दर्जा नहीं ऊंचा हो जाता।

अब यह बात तो सिद्ध हो गयी थी कि ब्राह्मण राज्य का सबसे महत्वपूर्ण अंग नहीं होते हैं, बल्कि किसान और मजदूर हैं जिन्हें यदि अच्छा राजा और समझदार मंत्री मिल जाएं तो राज्य को समृद्ध होने से कोई नहीं रोक सकता।

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