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राजदरबार में प्रवेश – हिंदी कहानी

तेनालीराम ने बहुतों के मुख से सुना था कि राजा कृष्णदेव बुद्धिमानों व गुणवानों का बड़ा आदर सम्मान करते हैं। उसने सोचा, क्यों न उनके यहाँ जाकर अपने भाग्य को आजमाया जाए। लेकिन बिना किसी सिफारिश के वह राजा कृष्णदेव के पास भला कैसे पहुँच सकता था। इसलिए वह किसी ऐसे सुनहरे अवसर की ताक में रहने लगा जब उसकी भेंट किसी ऐसे व्यक्ति से हो सके।

इसी समय तेनालीराम का विवाह मगम्मा से हो गया। एक वर्ष बीतते – बीतते वह एक लड़के का पिता भी बन गया।

इन्हीं दिनों राजा कृष्णदेव के राजगुरू तेनालीराम के पास आये। तेनाली ने उनकी खूब आव – भगत की और अपनी समस्या कह सुनाई।

राजगुरू ऊपर से तो चिकनी – चुपड़ी बातें करते रहे लेकिन मन ही मन तेनालीराम से वे द्वेष भाव रखते थे।

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उन्होंने अपने मन में ही विचार किया कि इतना बुद्धिमान औ चतुर व्यक्ति राजदरबार में आ गया तो कोई पूछ ही नहीं रहेगी लेकिन जाते समय उन्होंने वादा किया, जब भी मुझे लगेगा कि अवसर उचित हैं, मैं तुम्हें बुलवाकर तुम्हारा परिचय राजा से करवा दूंगा।

अब तो तेनाली उत्सुकता से राजगुरू के बुलावे की प्रतीक्षा करने लगा, लेकिन राजगुरू का बुलावा न तो आना था, न ही आया। लोग उसका मजाक उड़ाते हुए उससे पूछते, क्यों भाई, विजयनगर जाने के लिए सामान बाँध लिया न ?

अपना कोई कहता, मैंने सुना हैं तुम्हें बुलाने के लिए राजा ने अपना विशेष दूत भेजा हैं।

तेनालीराम उनसे कहता, समय आने पर तुम्हें सब पता चल जाएगा।

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मन ही मन तेनालीराम का विश्वास भी राजगुरू से उठ गया था। आखिर जब बहुत समय बीत गया तो निराश होकर उसने फैसला कर लिया कि स्वयं ही विजयनगर जाएगा और राजा से मिलेगा।

उसने अपने घर का सारा सामान बेचकर यात्रा का खर्च जुटाया और माँ, पाटने और बच्चे को लेकर विजयनगर के लिए रवाना हो गया। यात्रा में कोई व्यवधान उपस्थित होता, तेनालीराम राजगुरू का नाम ले लेता और उसकी समस्या हल हो जाती।

उस्मने अपनी माँ से कहा, देखा माँ ? जहां राजगुरू का नाम लिया, कि मुश्किल हल हो गयी। व्यक्ति स्वयं चाहे जैसा भी हो, अगर उसका नाम ऊंचा हो, तो समस्त बाधाएं अपने आप दूर होने लगती हैं। मुझे भी अपना नाम बदलना ही पड़ेगा। राजा कृष्णदेव पर असर डालने के लिए मुझे भी अपने नाम के आगे कृष्ण शब्द जोड़ लेना चाहिए। आज से मेरा नाम रामलिंग की जगह रामकृष्ण होगा।

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बेटा, मेरे लिए तो दोनों नाम ही बराबर हैं। मैं तो अब भी तुझे राम ही कहकर बुलाती हूँ, आगे भी यही यही कहकर बुलाया करूंगी। उसकी माँ ने कहा।

कोडवीड़ नामक स्थान पर पहुँचने पर तेनालीराम की भेंट वहाँ के राज्यप्रमुख से हुई, जो विजयनगर के प्रधानमंत्री का संबंधी लगता था।

उसने महाराज कृष्णदेव के बारे में जानकारी देते हुए कहा, वैसे तो उदार है, लेकिन उन्हें जब क्रोध आता हैं तो वे आनन् – फानन में  ही सिर को धड़ से अलग करने का भी हुक्म दे देते हैं।

जब तक मनुष्य ख़तरा मोल न ले, वह किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता। मैं अपना सिर की रक्षा स्वयं कर लूंगा। तेनालीराम के स्वर में आत्मविश्वास का पुट था।

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राज्यप्रमुख से उसे यह भी विदित हो गया कि प्रधानमंत्री भी गुनी व्यक्ति का आदर करने वाले है, पर ऐसे लोगों के लिए राजदरबार में कोई स्थान नहीं हैं, जो अपनी सहायता स्वयं नहीं कर सकते हैं।

आखिरकार चार महीने की लम्बी यात्रा के बाद तेनालीराम अपने परिवार सहित विजयनगर पहुँच गया।

उस नगर की चमक – दमक देखकर तो वह अचंभित रह गया। चौड़ी – चौड़ी सडकें, भीड़ – भाड़, हाथी, घोड़े, सजी हुई फूल की दुकानें और भव्य इमारतें ये उसके उसके लिए एक नया अनुभव था।

उसने कुछ दिन शरण के लिए वहाँ रहने वाले एक परिवार के मुखिया से प्रार्थना की जो उन्होंने स्वीकार कर ली। वहीं अपने माँ, पत्नी और बच्चे को छोड़कर वह राजगुरू के पास जा पहुंचा।

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उसके निवास पर तो भारी भीड़ लगी हुई थी। राजमहल के बड़े से बड़े कर्मचारियों से लेकर रसोइये तक वहाँ जमा थे। नौकरों – चाकरों की भी पूरी फ़ौज थी। तेनालीराम ने एक नौकर को सन्देश देकर कहा कि उनसे कहो, रामलिंगम (तेनाली का गाँव का नाम) आपसे मिलने आया हैं। जब वह नौकर उसका सन्देश देकर वापस आया तो उसने कहा, राजगुरू ने कहा हैं कि वह इस नाम के किसी व्यक्ति को नहीं जानते हैं।

तेनालीराम यह सुनकर बहुत हैरान हुआ। वह भीड़ को पीछे हुआ सीधे राजगुरू के पास पहुंचा, राजगुरू ! क्या आपने मुझे पहचाना नहीं ? मैं रामलिंगम हूँ, जिसने अपने गाँव में आपकी बहुत सेवा की थी।

लेकिन राजगुरू उसे पहचानना नहीं चाहता था। उसने अपने सेवकों को आज्ञा दी, मैं नहीं जानता, यह कौन आदमी हैं, इसे धक्के देकर यहाँ से बाहर निकाल दो।

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फिर राजगुरू के सेवकों ने तेनालीराम को धक्के देकर बाहर निकाल दिया। वहाँ खड़ी भीड़ यह दृश्य देखकर ठहाके लगा रही थी। तेनालीराम का ऐसा अपमान कभी नहीं हुआ था। उसने मन ही मन फैसला कर लिया कि राजगुरू से वह अपने इस अपमान का बदला अवश्य लेगा। लेकिन अपनी इस योजना की सफलता के लिए उसे राजा का दिल जीतना जरूरी था।

अगले दिन वह राजदरबार में आखिर जा ही पहुंचा। वहाँ उसने देखा कि किसी विषय पर बड़े जोरों का विवाद हो रहा हैं।

संसारी रीति – रिवाजों और मानव – जीवन पर बड़ी – बड़ी बातें हो रही थी। एक विद्वान पंडित के इस विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा, यह संसार एक धोखा हैं। हम जो देखते है, हम जो सुनते हैं, महसूस करते हैं, केवल वह हमारे विचार में हैं। वास्तविक में ऐसा कुछ नहीं होता, जबकि हम सोचते है कि होता हैं।

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क्या सचमुच ही ऐसा हैं ? आखिर तेनालीराम भी उस विवाद में कूद ही पड़ा।

हमारे शास्त्र हमें यही बताता हैं। पंडितजी ने आत्मविश्वास से अकड़ते हुए कहा। सभी उसकी राय से सहमत होते हुए चुप बैठे थे।

जबकि तेनालीराम को शास्त्रों से अधिक अपनी बुद्धि पर विश्वास था। उसने वहाँ उपस्थित जनों से कहा, यदि ऐसी बात हैं तो हम क्यों न पंडितजी के विचारों की सत्यता की अच्छी तरह परख लें। हमारे महाराज की ओर से आज जो सामूहिक भोज का आयोजन हो रहा हैं, उसमें हम जी भरकर भोजन करेंगे। जबकि पंडित से मेरी प्रार्थना हैं कि वह चुपचाप बैठे रहे और सोचें कि वह भी हमारे साथ भोजन कर रहे हैं।

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तेनालीराम की इस सूझ पर दरबार में जोर का ठहाका गूँज गया। अब पंडितजी की सूरत तो देखने लायक थी। राजा कृष्णदेव तेनालीराम की इस सूझ पर इतने प्रसन्न हुए कि उसे स्वर्ण मुद्राओं से भरी एक थाली भेंट की और उसी समय से तेनालीराम को अपने राज्य का विदूषक नियुक्त किया। वहाँ उपस्थित लोगों ने तालियाँ बजाकर राजा की इस घोषणा का स्वागत किया।, जिनमें राजगुरू भी शामिल थे। इस तरह तेनालीराम ने अपनी सूझ के बल पर उस राज्य के विदूषक के पद पर अपनी नियुक्ति करवा ली और महाराज का खासमखास बन बैठा। राजगुरू हाथ मलकर ही रह गए थे।

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