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king and queen
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राजा रानी में सुलह

एक दिन तेनालीराम को गुप्तचर द्वारा सन्देश मिला कि महारानी बड़ी मुसीबत में हैं और उन्होंने आपको तुरंत ही राजमहल में बुलाया हैं।

जब तेनालीराम के सम्मुख उपस्थित हुआ तो उसे पता चला कि एक दिन राजा कृष्णदेव रानी को अपने हाथों से लिखा हुआ नाटक सुना रहे थे और नाटक की कहानी सुनते – सुनते उबासी आ गयी। राजा इस कारण महारानी से नाराज हो गए और वहाँ से चले गए और तब से कई दिन बीत गए, लेकिन महाराज इस ओर आये नहीं हैं। महारानी ने इस बारे में तेनालीराम से सफाई देते हुए कहा, इसमें मेरा कोई दोष नहीं था। मैंने महाराज से क्षमा माँगी पर उन पर कोई असर नहीं हुआ। तेनालीराम,अब तुम्हीं मेरी इस समस्या को सुलझा सकते हो। और हमारी आपस में सुलह करवा सकते हो।

आप बिलकुल चिंता न करें, महारानी मैं अपनी ओर से पूरा प्रयत्न करूंगा। तेनालीराम ने महारानी को दिलासा देते हुए कहा।

फिर वहाँ से तेनालीराम दरबार में पहुंचा। राजा कृष्णदेव इस समय अपने राज्य के किसी क्षेत्र में चावलों की फसल की पैदावार पर अपने मंत्रियों से सलाह कर रहे थे।

उस क्षेत्र में चावल की उपज बढ़ाना बहुत ही जरूरी हैं। राजा ने कहा, हमारे अब तक किये गए प्रयास फलीभूत हुए है लेकिन समस्या अभी पूरी तरह नहीं सुलझ पायी हैं।

महाराज ! तेनालीराम ने चावलों की एक किस्म का बीज राजा को दिखाते हुए कहा, अगर इस बीज की रोपाई की जाए तो उस क्षेत्र में चावलों की पैदावार इस साल की अपेक्षा तिगुनी हो जाएगी।

यह तो बहुत अच्छा होगा, लेकिन इसके लिए शायद विशेष तरह की खाद की आवश्यकता पड़ेगी। राजा ने कहा।

नहीं महाराज, इसके लिए केवल इतना जरूरी हैं कि इसे बोने, सींचने और काटने वाला व्यक्ति ऐसा हो, जिसे न कभी उबासी आयी हो और न आगे उसे उबासी आये। तेनालीराम ने कहा।

तुम जैसा मूर्ख व्यक्ति आज तक नहीं देखा। राजा ने कहा, क्या संसार में ऐसा कोई व्यक्ति हैं, जिसे कभी उबासी न आती हो ?

राजा कृष्णदेव ने उसे डपटते हुए कहा।

मैं तो भूल ही गया था महाराज कि मैं महामूर्ख हूँ। तेनालीराम बोला, अच्छा हुआ कि आपने मुझे यह बात याद दिला दी महल में अभी जाकर महारानी साहिबा को अपनी इस मूर्खता के बारे में बताता हूँ।

नहीं, नहीं, तुम्हें कष्ट करने की जरूरत नहीं हैं, मैं स्वयं जाकर उन्हें बता दूंगा। राजा ने कहा।

पूरे दरबार में तभी हंसी का सामूहिक ठहाका गूँज उठा।

दरबार के विसर्जन के बाद महाराज महारानी के महल में गए। इस तरह दोनों में सुलह हो गयी। फिर राजा कृष्णदेव ने तेनालीराम को अशर्फियों से भरी एक थैली भेंट की और महारानी ने भी तेनालीराम की सूझ पर प्रसन्न होकर बहुमूल्य उपहार दिए। और तेनालीराम का तो कहना ही क्या था। उसकी तो पौ बारह हो गयी थी।

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