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धैर्य है सिद्धिदाता

जीवन के साथ हानि – लाभ और सुख – दुःख का अनादिकालीन सम्बन्ध है। सुख और दुःख – इन दोनों अवस्थाओं में ही मनुष्य को धैर्य का अवलंबन ग्रहण करना चाहिए। एक प्राचीन सूक्त में कहां गया है –

 

विपत्ति काल में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। धैर्य ही वह परम मंगल अनुष्ठान हैं जो प्राणी को उसके अभीष्ट की सिद्धि प्रदान करता है। मन में यदि धैर्य है तो बड़े –  बड़े कार्य सरल हो जाते हैं, और यदि धैर्य का अभाव है तो सरल कार्य भी अतिकठिन हो जाते है।

 

एक नगर में बंदरों का बहुत आतंक था। सहस्त्रों बंदर गली – मोहल्लों, खेत – खलिहानों और बागों में निर्द्वन्द्व विचरण करते थे नगर के बाह्य भाग में एक आमों का बाग़ था। बंदर वहाँ आम खाने के लिए प्रतिदिन जाते थे। वे कुछ आम खाते, कुछ व्यर्थ करते और मस्ती में उछल – कूद मचाते थे।

 

बाग़ का माली बहुत दुखी हो गया था। वह पूरा दिन हाथ में डंडा लिए हुए बंदरों के पीछे दौड़ा करता था, लेकिन बहुत कम अवसरों पर बन्दर उसकी मार खाते थे।

 

समय व्यतीत होता गया। माली बहुत परेशान था। उसने बाग़ की सुरक्षा के लिए कुछ और व्यक्तियों को रख लिया। बाग़ के अनेक रक्षक हो जाने से अब बंदरों को राज मार खानी पड़ती थी। बन्दर परेशान हो उठे।

 

एक दिन बंदरों ने एक मीटिंग का आयोजन किया। परेशान बंदरों  ने आपसी विचार – विमर्श किया – भाइयों! अब हमें कुछ सोचना ही होगा। अब प्रतिदिन की मार और भागम – भाग से हम परेशान  हो चुके है। तभी एक चपल और युवा बन्दर ने भाषण दिया – भाइयों ! आखिर हम भी किसी से कम नहीं है। मनुष्य के सामान योग्यता हमारे पास भी है। अतः अब हम भी एक बाग़ लगायेंगे और आराम से रहेंगे।

 

सभी बंदरों ने उस बन्दर के प्रस्ताव का अनुमोदन किया। अंततः बंदरों ने बाग़ लगाने का निश्चय कर लिया। गुठलियाँ इकट्ठी कर ली गयी और उन्हें जमीन में बो दिया गया।

 

कुछ समय बीता, लेकिन बन्दर तो स्वभावतः चंचल और अधीर होते है। उन्हें आम खाने की उत्कट उत्कंठा थी। वे अब गुठलियों को उखाड़ – उखाड़कर देखने लगे कि अभी तक आम्र वृक्ष उगा क्यों नहीं, और लगाईं हुई समस्त गुठलियाँ कुरेद दी गयी। इस प्रकार बंदरों का बाग़ उनके धैर्य के अभाव में  उगने से पहले ही नष्ट हो गया।

 

निर्माण या सृजन इसीलिए कठिन है कि उसमें श्रम के साथ – साथ धैर्य भी अपेक्षित है। अधैर्य का परिणाम विध्वंस है। धैर्य मनुष्य – जीवन का सूत्र होना चाहिए।

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