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पक्षियों की गिनती – हिंदी कहानी

कभी – कभी राजा कृष्णदेव तेनालीराम को भ्रमित करने के लिए बड़े अजीबो – गरीब प्रश्न पूछ लिया करते थे।

एक दिन उन्होंने तेनालीराम से पूछा, विदूषकजी, आप बता सकते हैं कि हमारे राज्य में कुल मिलाकर कितने पक्षी होंगे ?

बता तो सकता हूँ, महाराज,लेकिन आपके दरबार में मुझसे भी अधिक विद्वान बैठे हुए हैं। उनकी उपस्थिति में मैं इस प्रश्न का उत्तर देने की धृष्टता भला कैसे कर सकता हूँ। तेनालीराम ने सादर मुद्रा में कहा।

राजा कृष्णदेव ने दरबारियों पर निगाह डाली, लेकिन इस विचित्र प्रश्न को सुनकर सभी बगलें झाँकने लगे थे।

भला उड़ने वाले पक्षियों का क्या ठिकाना, आज यहाँ, तो कल वहाँ, उनकी गिनती भला कैसे की जा सकती हैं ?

तब राजा ने कहा, तेनालीराम अब तो इस प्रश्न का उत्तर तुम्हीं को देना पड़ेगा। हमने देख लिया, हमारे इस प्रश्न का उत्तर दे पाना किसी के बूते की बात नहीं लग रही हैं।

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तब चतुर तेनालीराम ने सादर कहा, ठीक हैं  महाराज ! मैं ही आपके प्रश्न का उत्तर देता हूँ । सुनिए, हमारे राज्य में उतने पक्षी हैं, जितने आपके सर में बाल हैं।

राजा कृष्णदेव तो तेनालीराम का यह उत्तर सुनकर चौंक गए और बोले, यह कैसी संख्या बताई तुमने ? हम स्वयं ही नहीं जानते कि हमारे सिर में कुल कितने बाल हैं। तुम हमारे राज्य के पक्षियों की ठीक – ठीक संख्या बताओ और पहेलियाँ बुझाने की कोशिश मत करो।

महाराज,राज्य के कुल पक्षियों की संख्या एक लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह हैं। अगर आपको ऐसी बात का यकीन नहीं हो, तो आप स्वयं गिनवा कर देख लीजिये। तेनालीराम ने कहा।

और अगर पक्षियों को गिनवाने पर उनकी संख्या कम निकली तो ….। राजा कृष्णदेव ने कहा।

इसका एक मात्र कारण यह हो सकता हैं कि शेष पक्षी अपने सम्बंधियों से मिलने कहीं अन्यत्र चले गए हो। तेनालीराम ने गंभीरता धारण करते हुए उत्तर दिया।

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यदि पक्षियों की संख्या तुम्हारी गिनती की हुई संख्या से अधिक हुई तो ….. ? राजा कृष्णदेव ने फिर से तेनाली को छेड़ने का प्रयास किया।

यह तो बिलकुल सीधी – सी बात हैं महाराज, बाहर से कुछ पक्षी अपने यहाँ संबंधी से से मिलने के लिए आये होंगे। तेनालीराम ने कहा।

तेनालीराम के इस जवाब से तो राजा कृष्णदेव निरुत्तर हो गए।

उन्होंने अब दरबार में उपस्थित लोगों पर नजर दौड़ाई। चतुर तेनाली था कि उस पर कोई रंग चढ़ता ही नहीं था।

जो लोग तेनालीराम को राजा की दृष्टि में गिराने का कोई अवसर हाथ से जाने न देते थे, मन ही मन कह रहे थे देखो,तेनालीराम के ऊंचे रूतबे, पद और सम्मान का यह राज हैं ! कोई हैं तुम लोगों में ऐसा, जो इतना हाजिर – जवाब हो, तेनालीराम अपनी सूझ – बूझ और वाक्पटुता से सबको निरुत्तर कर देता हैं।

बहुरूपिया राजगुरू

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