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नववर्ष का आगमन – हिंदी कहानी

नववर्ष के आगमन पर राजा कृष्णदेव ने अपने दरबार में कहा, नववर्ष होने वाला हैं। मैं चाहता हूँ कि इस वर्ष जनता को कोई नई भेंट दी जाए। आप लोग बताइये, कि वह भेंट क्या हो सकती हैं।

राजा कृष्णदेव की यह बात सुनकर सभी उपस्थित जनों में खुसर – फुसर प्रारम्भ हो गयी।

तभी प्रधानमंत्री कुछ सोचकर बोले, महाराज ! नववर्ष के आगमन पर विजयनगर में एक यादगार उत्सव का आयोजन किया जाए। देशभर से संगीतकार, नाटक मंडलियां व दुसरे कलाकारों को आमंत्रित किया जाए ताकि वे रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकें। मेरे विचार से जनता – जनार्दन के लिए इससे बढ़कर नववर्ष का कोई अन्य उपहार नहीं हो सकता हैं।

राजा कृष्णदेव को भी मंत्रीजी का यह सुझाव बहुत पसंद आया।

उन्होंने मंत्री से पूछा, इस आयोजन पर कुल कितना खर्च आयेगा ?

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महाराज ! कोई ख़ास नहीं बस दस लाख स्वर्ण मुद्राओं के करीब खर्च होगी। मंत्री ने उत्तर दिया।

इतना अधिक खर्च वह भला कैसे ? राजा कृष्णदेव राय महामंत्री का उत्तर सुनकर चौंक पड़े।

फिर प्रधानमंत्री ने खर्च का ब्यौरा देते हुए कहा, महाराज ! हजारों कलाकारों के खाने – पीने और रहने की व्यवस्था करनी होगी। नई रंगशाला का निर्माण करवाया जाएगा। पुरानी रंगशालाओं की मरम्मत होगी। पूरे नगर में रौशनी और सजावट का इंतजाम करवाया जाएगा। जब प्रबंधों पर इतना खर्च तो आ ही जाएगा।

प्रधानमंत्री के इस ब्यौरे पर राजपुरोहित और अन्य सभासदों ने भी अपनी मुहर लगा दी। राजा कृष्णदेव राय इतने अधिक खर्च की बात सुनकर कुछ सोच में पड़ गए, पर उन्होंने इस बारे में तेनालीराम की राय ले लेना उचित समझा। तेनालीराम ने कहा, महाराज ! नववर्ष के उत्सव का विचार तो वाकई बहुत अच्छा हैं, मगर यह उत्सव विजयनगर में तो कदापि नहीं होना चाहिए।

आखिर क्यों ? राजा कृष्णदेव ने तेनाली से पूछा।

दुसरे दरबारियों की भी भौंहें तन – सी गयी थी।

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महाराज ! यदि ऐसे उत्सव का आयोजन केवल राजधानी में हो तो शेष राज्य की जनता तो उसमें सम्मिलित हो नहीं पाएगी ? हमारे किसान भाई तो अपना काम छोड़कर उत्सव देखने आयेंगे नहीं इसलिए कलाकारों को राज्य के प्रत्येक गाँव व कसबे में जाकर हमारे पूरे राज्य की जनता का मनोरंजन करना चाहिए। कलाकारों की कला के माध्यम से जनता अपनी संस्कृति, अपने इतिहास को जान पाएगी तथा कलाकारों के आव – भगत भी गांववाले अच्छी तरह कर सकेंगे।

तेनालीराम, तुम्हारी बात में तो वजन हैं। तुम ऐसा करो कि अपनी देख रेख में पूरे उत्सव की तैयारियां प्रारम्भ करवा दो और जरूरत के लिए आवश्यक धन राजकोष से ले लो। मैं अभी कोषागार मंत्री को आदेश दिए देता हूँ। राजा कृष्णदेव खुश होकर बोले। धन किसलिए महाराज ! कलाकारों के खर्च का वहां तो जनता सहन करेगी। आखिर उन्हीं के लिए तो हम इस उत्सव का आयोजन कर रहे हैं। इस उत्सव में कलाकार जहां कहीं भी जायेंगे, उनके खाने – पीने और रहने का प्रबंध वे लोग अपने आप कर देंगे। हाँ, कलाकारों के आने – जाने का प्रबंध हम कर देंगे। इस तरह धन भी अल्प मात्रा में खर्च होगा और इस उत्सव का आनंद भी सभी उठाएंगे।

राजा कृष्णदेव तेनाली की बात सुनकर अति प्रसन्न हुए।

वहीं आयोजन की आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाली मंत्री व अन्य भ्रष्ट राजदरबारियों के चेहरे देखने लायक थे।

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