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संसार का स्वरुप

संसार महासागर के समान है। महर्षि जन ही इसको पार लगा सकते है। कायर संसार में ही उलझे रहते है। शूरवीर इन बंधनो को एक झटके में तोड़ देते है। संसार का बीभत्स रूप पुनः पुनः देखकर भी कायर उसी में उलझे रहते है। वीरो के सामने जैसे ही संसार की कुरूपता जागती है, वे इसका परित्याग कर देते है। गुजरात में एक प्रसिद्ध भक्त हुए है। उनका नाम था आक्खा भक्त। उनकी एक ‘धर्म बहन’ थी।

 

आक्खा उसको बड़ा प्रेम करते थे, और समय समय पर उसकी सहायता करते रहते थे। आक्खा जवाहरात का काम करते थे। वे स्वर्णभूषण बेचते थे और बनाते थे। उनका काम खूब फल फूल रहा था। शहर में उनकी प्रतिष्ठा थी। उनके नाम का सिक्का चलता था। उस धर्म बहन ने एक दिन आक्खा को कुछ स्वर्ण दिए और कहा – इस स्वर्ण से मेरी कंठी बना देना। आक्खा ने  बहन के लिए बड़ी सुन्दर कंठी बनाई।

 

उन्होंने अपनी ओर से कुछ और स्वर्ण उसमे मिला दिया। उस धर्मं बहन ने कंठी प्राप्त की। उसे बड़ी सुन्दर लगी। लेकिन पहनने पर उसे कुछ भारी लगी। उसके मन में संदेह जाग गया। वह उस कंठी को लेकर एक अन्य व्यक्ति के पास गयी और उस कंठी की परीक्षा कराई। उस व्यक्ति ने कहा –  शुद्ध स्वर्ण – निर्मित है यह कंठी। इसमें कोई  खोट नहीं है। लेकिन यह बताओ तुमने बनवाई किससे है?

 

उस महिला ने कहा –  मैंने यह आक्खा से बनवाई है। महिला की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा –  तुम आक्खा जैसे व्यक्ति पर भी संदेह करती हो। आक्खा का तो सिक्का चलता है बाजार में। उसके शत्रु भी उस पर अविश्वास नहीं कर सकते है।

 

उस महिला को अपने ह्रदय में उठे भाई के लिए संदेह के कारण स्वयं पर बहुत ग्लानि हुई। उसे विश्वास हो गया था की आक्खा ने तो  उसके स्वर्ण में स्वयं की ओर से स्वर्ण मिलाया था। लेकिन उसने उस पर अविश्वास किया। वह रोती हुई आक्खा के पास पहुंची और संपूर्ण घटना कह सुनाई।

 

अपने उपकार पर उठे संदेह को देखकर आक्खा  को बड़ा दुःख हुआ। संसार के इस रूप का दर्शन करके वे विरक्त हो उठे। उन्होंने संसार का त्याग करके भक्ति का मार्ग पकड़ लिया। वे विरक्त होकर जंगलो में चले गए और साधना करने लगे। श्रेष्ठ पुरुष अवसर मिलते ही आत्म- पथ पर बढ़ जाते है।

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