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नहीं रांच्यो रहमान – ज्ञानवर्धक कहानी

आयुर्वेद का एक सूत्र हैं –  तन्मय होकर भोजन करो।

इस सूत्र में एक उत्तम दृष्टि प्रगट हुई हैं। भोजन करो तो केवल भोजन ही करो। मनुष्य भोजन करते हुए भी अन्य कुछ करता रहता हैं। उसका शरीर भोजन कर रहा होता है , लेकिन उसका मन कहीं और दौड़ रहा होता है। आयुर्वेद कहता हैं – इससे भोजन अपनी पूर्ण गुणवत्ता में रूपायित नहीं हो पाता हैं।

 

यही सत्य भजन के विषय में भी हैं। मनुष्य भगवान् का भजन करने के लिए बैठता हैं , लेकिन उसका मन चहुँ ओर दौड़ता रहता हैं। इसी सत्य को कबीरदास जी ने यों प्रगट किया हैं –

माला तो कर में फिरे , जीभ फिरे मुख माहीं।

 

मनवा तो चहुँ दिशि फिरे , यह तो सुमिरण नाहीं।।

भजन के लिए , सामायिक के लिए , ध्यान के लिए एकाग्रता और तन्मयता परम आवश्यक हैं। तन्मयता से ही वस्तुतः सामायिक या ध्यान का वास्तविक रस प्राप्त हो पायेगा।

 

एक युवती अपने प्रेमी से मिलने जा रही थी। जंगल का मार्ग था। उसके क़दमों में उत्साह था और ह्रदय में अपने प्रिय से मिलने की ललक।

 

मार्ग पर ही एक बादशाह आसन बिछाकर नमाज अदा कर रहा था। वह युवती उसके आसन पर पैर रखते हुए आगे बढ़ गयी। बादशाह को उस युवती पर बड़ा क्रोध आया। लेकिन नमाज अदा करते हुए वह कुछ बोल नहीं सकता था।

 

कुछ समय के पश्चात वह युवती अपने प्रेमी से मिलकर लौटी। तब तक बादशाह की नमाज भी पूरी हो चुकी थी बादशाह ने क्रोध से कड़कते हुए उस युवती से कहा – मूर्ख बाला ! मैं नमाज पढ़ रहा था और तुम नमाज के आसन पर पैर रखती हुई आगे बढ़ गयी। क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता था ?

 

बादशाह की बात सुनकर अल्हड़ता में मस्त उस युवती ने गा दिया –

नर रांची सूझी नहीं , तुम कस लख्यो सुजान।

कुरआन पढ़ात बोर भए , नहीं रान्च्यो रहमान।।

 

जहाँपनाह ! मैं एक साधारण व्यक्ति के प्रेम में इतनी भावविभोर और अंधी हो गयी थी कि मुझे उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं सूझ रहा था। लेकिन तुम परम पुरुष अल्लाह के ध्यान में होते हुए भी मुझे देख गए। लगता हैं आपकी कुरान – नमाज अंधेरों तक ही सीमित हैं। खुदा के लिए तुम्हारे ह्रदय में सच्चा प्रेम पैदा ही नहीं हुआ हैं।

 

युवती की सटीक बात सुनकर बादशाह की आँख खुल गयी। वह बोला – धन्य हैं देवी ! तुमने मेरी आँख खोल दी हैं।

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