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देहातीत होता हैं साधक – प्रभुवीर

श्रमण के जीवन्मुक्त स्वरुप का वर्णन करते हुए औपपातिक सूत्र में प्रभुवीर का एक वचन हैं –

श्रमण जीने की आशा और मरण के भय से विप्रमुक्त होते हैं।

 

साधक देहातीत होता हैं। जीवन और मृत्यु की घटनाएं देह के धरातल पर ही घटित होती हैं। साधक देह के मोह से ऊपर चला जाता हैं। जैसे सागर की सतह की लहरें उसकी गहराई को आलोड़ित नहीं कर पाते हैं , वैसे ही दैहिक घटनाएं साधक के अंतरतम को विचलित नहीं कर पाती हैं।

 

सिकंदर जब भारत से लौटने लगा तो उसे विचार आया की भारत की आध्यात्मिक संपदा भी अपने साथ ले चलूँ। उसने एक सन्यासी को अपने साथ ले जाने का निर्णय किया।

 

उसके आदेश पर उसके सैनिकों ने एक सन्यासी को खोज निकाला। सैनिकों ने उससे कहा – सन्यासी ! चलो तुम्हें सिकंदर ने बुलाया हैं। सन्यासी बोला – कौन सिकंदर ? न मैं उसे जानता हूँ। और न ही मैं उसके पास जाउंगा।

 

सैनिक बोले – सन्यासी !  तुम सिकंदर के आदेश की अवहेलना करके अपना अहित कर रहे हो। तुम उनके क्रोध को नहीं जानते हो। वह विश्वविजेता सिकंदर जो चाहता हैं , वह प्राप्त करना उसके लिए दुष्कर नहीं हैं।

 

सन्यासी बोला – सैनिकों ! जाओ कह देना सिकंदर से कि मैं उसका आदेश मानने के लिए बाध्य नहीं हूँ।

सैनिक लौट गए। उन्होंने सिकंदर से सन्यासी की बातें बतायी। विश्वविजय की दर्प से दर्पित सिकंदर आग – बबूला हो गया। उसने तलवार निकाली और पहुँच गया उस सन्यासी के पास। सिकंदर बोला – सन्यासी ! चूंकि तुम सन्यासी हो , इसीलिए मैं तुम्हारा प्रथम अपराध क्षमा करता हूँ। उठो ! चलो मेरे साथ मेरे देश।

 

सन्यासी ने सहज संयत स्वर से कहा – सिकंदर ! मैं किसी के आदेश का पालन नहीं करता हूँ। जब से मैंने स्वयं का आदेश मानना शुरू किया हैं , शेष आदेश मेरे लिए व्यर्थ हो गए हैं। सिकंदर सन्यासी की सपाट भाषा सुनकर क्रोध से थर – थर कांपने लगा। उसने तलवार निकालते हुए कहा – देखते हो यह तलवार ! यह तुम्हारी देह के टुकड़े – टुकड़े कर डालेगी।

 

सन्यासी मुस्कुराए। और बोले – किसने रोका हैं तुम्हें। मिटा दो इस देह को। यह देह ही तो मेरे देहि को परमात्मा से विलग किये हुए हैं। सिकंदर ! मिटा दो इस बाधा को भी। इस देह को कटते हुए जैसे तुम देखोगे वैसे ही मैं भी देखूंगा।

 

सिकंदर चौंक गया। उसने जीवन में पहली बार ऐसी बातें सुनी थी। उसकी तलवार गिर गयी और वह विश्वविजय के अभिमान में अकड़ा रहने वाला मस्तक उस अकिंचन सन्यासी के चरणों  में झुक गया।

 

भारत की आध्यात्मिक परम्पराओं को अपनी शक्ति के बल पर अपने देश ले जाने के उसके सपने चूर – चूर हो गए थे।

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