लालची मंत्री

राजा कृष्णदेव की यह हार्दिक इच्छा थी कि वह अपने जीवनकाल में एक मंदिर का निर्माण कराएं। इसलिए उन्होंने अपने मंत्री को बुलवाया और उसमें उपयुक्त स्थान खोजने के लिए कहा।

उस मंत्री ने अपने नगर के समीप ही जंगल में मंदिर निर्माण के लिए एक स्थान खोज लिया और फिर राजा कृष्णदेव की सहमति लेकर उस स्थान को साफ़ करने का काम शुरू किया।

उस जगह की सफाई करते समय उनके बीचोबीच किसी पुराने मंदिर के खंडहर मिले। उन खंडहरों में विष्णु भगवान् की स्वर्णजड़ित आपमूक मूर्ति भी थी। भगवान् की इतनी विशाल सोने की प्रतिमा देखकर और कर्मचारियों को लालच देकर उस मूर्ती को अपने घर ले गया।

उन मजदूरों में तेनालीराम के भी कुछ आदमी शामिल थे उन्होंने तेनालीराम को इस बात से अवगत करा दिया।

इस घटना की जानकारी पाकर तेनालीराम सोच में निमग्न हो गया।

खैर ! भूमि पूजन होने के पश्चात वहाँ मंदिर निर्माण का कार्य आरम्भ हो गया।

एक दिन राजा कृष्णदेव दरबारीगणों से पूछा कि भगवान् की कैसी मूर्ति बनवाई जाए ?

किसी ने कुछ राय दी तो किसी ने कुछ।

लिहाजा राजा कृष्णदेव कोई निर्णय नहीं ले पा रहे थे। तभी दरबार में एक जटा – जूटधारी सन्यासी उपस्थित हुआ।

राजा का अभिवादन स्वीकार करने के उपरान्त वह बोला, महाराज मैं आपकी चिंता से अवगत हूँ। रात को विष्णु भगवान् ने मुझे स्वप्न में दर्शन दिए और आपके लिए जो सन्देश दिया वही आपको बताने यहाँ उपस्थित हुआ हूँ।

राजा ने उत्सुकता से पूछा, भगवान् का मेरे नाम सन्देश। तो शीघ्र ही बताइये सन्यासीजी !

उस सन्यासी ने बताया, महाराज ! भगवान् ने स्वयं अपनी आदमकद स्वर्ण प्रतिमा मंदिर के लिए भेज दी हैं। इस समय वह आपके एक मंत्री के घर में विद्यमान हैं। उसे वहाँ से मंगवाकर मंदिर में प्रतिष्ठित करवा दो।

इतना कहकर वह सन्यासी राजदरबार से चला गया।

राजा ने उस मंत्री की ओर देखा जो मंदिर का निर्माण कार्य कर रहा था। इस सच के सामने वह सकपका गया और भगवान् की स्वर्णजड़ित प्रतिमा की ओर अपनी दृष्टि घुमाई। लेकिन तेनालीराम उन्हें कहीं दिखाई नहीं दिया।

तभी तेनालीराम राजदरबार में प्रवेश किया।

उसे देख सभी हंस पड़े। बोले, महाराज शायद यही थे साधु बाबा। गेरुआ कपड़े और जटाएं तो ये उतार आए, पर अपनी कंठी तिलक मिटाना इन्हें याद नहीं रहा।

राजा कृष्णदेव तेनाली की चतुरता पर मुग्ध हो गए और तेनाली को ही मंदिर के निर्माण का कार्यभार सौंप दिया और यह भी कहा कि मंत्री के घर से मूर्ती मंगवाकर अपनी देख – रेख में ही रखे।

बेचारे उस मंत्री को भरे दरबार में अपने लालच के कारण नीचा देखना पड़ गया था।

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