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कौन समझदार होता हैं

एक दिन राजा कृष्णदेव ने तेनालीराम से पूछा, तेनालीराम यह बताओ कि किस प्रकार के लोग सबसे अधिक मूर्ख होते हैं और किस प्रकार के लोग अधिक मूर्ख होते हैं और किस प्रकार के सबसे चतुर ?

          तेनालीराम ने तपाक से उत्तर दिया, महाराज ! सबसे अधिक मूर्ख ब्राह्मण और व्यापारी सबसे अधिक चतुर होते हैं।

       ऐसा कैसे संभव हैं, तेनालीराम ? ब्राह्मण तो विद्वान होते हैं जबकि व्यापारी निरे अनपढ़। राजा कृष्णदेव ने कहा।

         मैं यह बात साबित करके दिखा सकता हूँ महाराज ! तेनालीराम ने कहा।

     भला वह कैसे ? राजा कृष्णदेव ने विस्मय से पूछा।

     आपको अभी पता चल जाएगा, ज़रा राजगुरू को बुलवाइए।

     तब तेनालीराम ने कहा, महाराज ! मेरी आपसे प्रार्थना हैं कि मेरे काम में आप हस्तक्षेप नहीं करेंगे। आप यह वचन दें, तभी मैं अपने कहे को सत्य करके दिखा पाउँगा।

         राजा कृष्णदेव ने वचन देकर तेनालीराम की बात मान ली। अब तक राजगुरू भी वहाँ पहुँच चुके थे।

        तब तेनालीराम ने आदरपूर्वक राजगुरू से कहा, राजगुरूजी, महाराज को आपकी चोटी की जरूरत पड़ गयी हैं। आपकी इस चोटी के बदले में मुंहमांगा इनाम दिया जाएगा।

        राजगुरू को तो जैसे सांप सूंघ गया। वह ब्राह्मण होने की अपनी निशानी को कैसे कटवा दें ? लेकिन राजा की ऐसी इच्छा थी कि वह टाली भी कैसे जा सकती थी।

       तब राजगुरू ने असमंजस में कहा, तेनालीरामजी, मैंने बड़े जतन से अपनी यह चोटी बढाई हैं। मैं भला इसे कैसे कटवा सकता हूँ।

        सोच लीजिये राजगुरू ! आपने जीवन भर महाराज का नमक खाया हैं। चोटी कोई ऐसी चीज तो हैं नहीं जो फिर न बढ़ सके। फिर महाराज आपको इसके बदले में मुंहमाँगा इनाम भी दे रहे हैं और आपको तो ज्ञात ही हैं कि हमारे महाराज न्यायप्रिय हैं, वह ऐसा कुछ नहीं करना चाहेंगे जिससे आपकी हानि हो।

       राजगुरू मन ही मन यह ताड़ गए कि हो न हो, यह तेनालीराम की कोई नयी चाल हैं।

          तेनालीराम ने फिर से पूछा, राजगुरूजी, आपको अपनी चोटी के बदले क्या चाहिए। तब राजगुरू ने धीरे से कहा, इसके लिए पांच स्वर्ण मुद्राएं ही काफी होंगी।

        फिर क्या था। राजगुरू को तुरंत ही पांच स्वर्ण मुद्राएं दे दी गयी और एक नाई को बुलवाकर उनकी चोटी कटवा दी गयी।

        राजगुरू पांच स्वर्ण मुद्राएं लेकर लुकते – छिपते अपने घर चले गए।

    अब तेनालीराम ने नगर के सबसे प्रसिद्द व्यापारी को बुलवाया। उसकी भी चोटी काफी बढी हुई थी जब वह व्यापारी आ गया तो तेनालीराम ने उससे कहा, श्रीमानजी ! महाराज को तुम्हारी चोटी की आवश्यकता पड़ गयी हैं।

          वह व्यापारी पहले तो तेनालीराम का यह अटपटा प्रश्न सुनकर कुछ सकुचाया फिर बोला, सब कुछ महाराज का ही तो हैं, जब वह चाहे ले लें, लेकिन इतना ध्यान जरूर रखें कि मैं एक गरीब व्यापारी हूँ।

      तुम्हें इस चोटी के बदले मुंहमांगा इनाम दिया जाएगा। तेनालीराम ने कहा।

        वह तो आपकी कृपा हैं लेकिन ….. ? व्यापारी ने इतना कहकर अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

     लेकिन – वेकिन क्या ? आप कहना क्या चाहते हैं ? तेनालीराम ने पूछा।

       जी, दरअसल बात यह हैं कि जब मैंने अपनी पुत्री का विवाह किया था, तो अपनी इस चोटी की लाज रखने के लिए मैंने पूरी दस हजार स्वर्ण मुद्राएं खर्च की थी। फिर पिछले साल मेरे पिता स्वर्गवासी हो गए, तब भी इस चोटी के कारण तीन हजार स्वर्ण मुद्राएं खर्च करनी पड़ी और अपनी चोटी के कारण मैं जब तब बाजार से भी कम से कम पांच हजार स्वर्ण मुद्राएं उधार भी ले लेता हूँ। इसलिए मैं तो अपनी इस चोटी के बल पर ही कमा – खा रहा हूँ। जब यही नहीं रहेगी तो मेरा तो धंधा ही चौपट हो जाएगा।

         तो इतना धन तुम्हारी चोटी का मूल्य कुल मिलाकर अठारह हजार स्वर्ण मुद्राएं हुआ। ठीक हैं तुम्हें दे दिया जाएगा।

       फिर जैसी आपकी इच्छा। इतना कहकर वह व्यापारी चोटी मुड़वाने बैठ गया। जैसे ही नाई ने उसकी चोटी पर अपना उस्तरा रखा, वह व्यापारी कड़कर बोला, ज़रा संभलकर उस्तरा चला नाइ के बच्चे ! जानता नहीं, अब यह राजा कृष्णदेव की अमानत हैं।

       राजा कृष्णदेव राय तो आगबबूला हो गए। इस व्यापारी की यह मजाल की हमारा अपमान करे ? उन्होंने क्रोध में भरकर कहा, धक्के मारकर निकाल बाहर करो इस सिरफिरे को।

       वह व्यापारी  अठारह हजार स्वर्ण मुद्राओं की थैली लेकर वहाँ से भाग निकला।

       तब तेनालीराम ने राजा से कहा, देखा महाराज ! राजगुरू ने तो स्वर्ण मुद्राओं के लालच में अपनी चोटी कटवा ली और व्यापारी अठारह हजार स्वर्ण मुद्राएं भी ले गया और अपनी चोटी भी काटने से बचा ली। अब आप ही बताइये, ब्राह्मण समझदार हुआ कि वह व्यापारी ?

       तब राजा ने कहा, सचमुच तुम्हारी बात ही ठीक निकली तेनालीराम फिर महाराज ने तेनाली को प्रसन्न होकर बहुत सा धन इनाम के रूप में दिया।

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