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गले के रोग का घरेलू उपचार

गले की सूजन (खराश)

कारण

गर्म भोजन के साथ ठंडा लेने, खांसी हो जाने तथा जुकाम का संक्रमण गले की ओर बढ़ जाने से गले में सूजन या खराश उत्पन्न हो जाती हैं।

लक्षण

भोजन निगलने में कठिनाई, गले में दर्द, खांसी आदि।

घरेलू चिकित्सा

  • एक गिलास गुनगुने पानी में एक चमच्च नमक डालकर दिन में चार – पांच बार गरारे करें।
  • फूली हुई फिटकरी 1 चमच्च की मात्रा में एक गिलास गुनगुने पानी में डालकर उससे गरारे करें।
  • दो चमच्च अजवायन को दो गिलास पानी में डालकर उबालें और काढ़ा बना लें। थोड़ा सा नमक डालकर हर दो – तीन घंटे के बाद गरारे करें।
  • सूखा धनिया और मिसरी बराबर मात्रा में लेकर मिलाएं। एक चमच्च की मात्रा में दिन में तीन चार – बार चबाएं।
  • एक पाव दूध में आधा चमच्च हलदी का चूर्ण उबालें और एक चमच्च मिसरी मिलाकर सुबह – शाम लें।
  • नीम की पत्तियां पानी में उबालें और गुनगुना रहने पर उससे गरारे करें।
  • थोड़ी सी सोंठ मुंह में रखकर चूसें।
  • पके हुए शहतूत दिन में कई बार खाएं।

आयुर्वेदिक चिकित्सा

यष्टीमधु घनसत्व, शुंठी चूर्ण, मरिच चूर्ण का प्रयोग किया जा सकता हैं। इसके अतिरिक्त सैप्टीलिन गोलियां (हिमालय) भी            लाभदायक होती हैं।

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गलग्रंथि शोथ

कारण

पुराना जुकाम बिगड़ने, जीवाणु संक्रमण के कारण या बहुत ठंडा पेय आदि ले लेने पर गलग्रंथि में सूजन आ जाती हैं।

लक्षण

गले में दर्द रहता हैं व भोजन निगलने में कठिनाई रहती हैं। सिर व शरीर में भी दर्द हो सकता है तथा बुखार भी आ सकता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • बारीक पिसी हुई हलदी, काली मिर्च और मुश्क कपूर बराबर मात्रा में लेकर उन्हें तीनों के सम्मिलित वजन से दो गुने मिट्टी के तेल में डालकर 5 – 6 घंटे धूप में पड़ा रहने दें। अगले दिन छानकर रख लें और फुरेरी से गले में लगाएं।
  • 50 ग्राम अलसी के बीज कूटकर 1 चमच्च घी में भून लें। ऊपर से पानी डालकर पुल्टिस बना लें। जब अधिक गर्म न रहे, तो कपड़े पर रखकर गले पर बांधें।
  • हलदी और बायबिडंग को समभाग लेकर कूट लें। इसमें समभाग सेंधानमक लेकर तीनों को पानी में उबालें। पांच मिनट तक उबलने के बाद इसे कपड़े से छान लें और गुनगुना रहने पर गर्म पानी से सुबह – शाम गरारे करें।
  • एक गिलास गर्म पानी में एक चमच्च नमक डालकर दिन में 3 – 4 बार गरारे करें।
  • टमाटर के गर्म – गर्म सूप में काली मिर्च व काला नमक डालकर पिएं।
  • गाजर के रस में काला नमक व काली मिर्च डालकर लें।

आयुर्वेदिक औषधियां

जातीफलादि बटी, स्वल्पपीतक चूर्ण आदि, पञ्चकोलादि गुटी, द्राक्षादि चूर्ण, व्योषादि चूर्ण, व्याघ्री घृत, निम्ब क्वाथ।

पेटेंट औषधियां

सैप्टीलिन गोलियां (हिमालय), डीटोंसी गोलियां (चरक)।

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आँखों के रोग

नेत्रशोथ

कारण

आँखों की सबसे आगे की झिल्ली में जो पलकों सहित पूरी आँख पर छाई रहती हैं, सूजन आना नेत्रशोथ कहलाता हैं। यह रोग ग्रीष्म ऋतु में और बच्चों में अधिक होता हैं। जीवाणु संक्रमण, असात्म्यता (एलर्जी) या किसी बाहरी वस्तु के आँख में गिर जाने से यह रोग हो जाता हैं।

लक्षण

इस झिल्ली की रक्तवाहीनियों में रक्त अधिक मात्रा में भर जाता हैं, जिससे आँखों में लाली आ जाती हैं। लाली के साथ सूजन व खुजली भी हो सकती हैं। सुबह के समय पलकें चिपकी हुई होती हैं। आँखों से पानी निकलता हैं। प्रकाश में जाते ही आँखें चुंधियाने लगती हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • रसौत व फिटकरी 5 – 5 ग्राम की मात्रा में लेकर 100 मि.ली. गुलाब जल में अच्छी तरह मिलाकर, छान कर रख लें। यह दवा 2 – 2 बूँद दोनों आँखों में दिन में दिन में तीन बार डालें।
  • पांच ग्राम भुना हुआ सुहागा और इससे तीन गुनी पिसी हुई हलदी लेकर एक लीटर पानी में उबालें। निथारने के बाद रूई से या साफ़ कपडे से भिंगोकर आँखों की सिंकाई करें।
  • ताजे आंवले का रस निकालकर व छानकर 2 -2 बूँद आँखों में डालें।
  • शुद्ध शहद आँखों में सुबह व शाम को लगायें।
  • धनिये के एक चमच्च बीज 1 कटोरी पानी में उबालें और छानकर रख लें। इससे आँखों की सिकाई करें।

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मोतियाबिंद

कारण

दृष्टिपटल पर एक आवरण या झिल्ली बन जाने से यह रोग होता हैं। जीवाणु संक्रमण, मधुमेह, विकिरण, चोट आदि के कारण से यह रोग हो सकता हैं। वृद्धावस्था में यह स्वाभाविक रूप से होने वाली एक प्रक्रिया हैं।

लक्षण

दृष्टिपटल पर झिल्ली का आवरण चढ़ जाने से साफ़ दिखाई नहीं देता, क्योंकि आँख से दिखाई देने वाला दृश्य दृष्टिपटल द्वारा पूर्ण या आंशिक रूप से ग्रहण नहीं हो पाता।

घरेलू चिकित्सा

आरंभिक स्थिति में इन दवाओं के प्रयोग से मोतियाबिंद की चिकित्सा संभव हैं, रोग बढ़ने से शल्य क्रिया के अलावा कोई विकल्प नहीं हैं। फिर भी रोग की प्रारम्भिक अवस्था में निम्न उपाय किये जाने से लाभ होता हैं :

  • निर्मली के बीज बारीक पीसकर छान लें और सममात्रा में शहद मिला लें। इसे सुबह – शाम सुर्मे की भांति प्रयोग करें।
  • शहद व प्याज का रस सामान मात्रा में मिलाकर आँखों में लगाएं।
  • चौलाई के पत्तों का एक गिलास रस रोज पिएं।
  • शरपुंखा के बीजों को बारीक पीसकर सुबह – शाम आँखों में लगाएं।
  • ककरौंदा के ताजे पत्तों का रस निकालकर व छानकर दो – दो बूँद सुबह व शाम आँखों में डालें।
  • सौंफ व धनिये के बीज बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इनके बराबर देसी खांड मिलाकर रख लें। यह चूर्ण सुबह – शाम दो – दो चमच्च दूध के साथ लें।
  • 1 चमच्च सौंफ सुबह – शाम अच्छी तरह चबाकर ऊपर से एक – एक गिलास गर्म दूध पिएं।
  • स्वमूत्र दो – दो बूँद सुबह – शाम आंखों में डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

महा त्रिफला घृत, वासादिक्वाथ व अमृतादि गुग्गुल घृत का प्रयोग कर सकते हैं। स्थानीय प्रयोग हेतु चंद्रोदयवर्ति, शिरीषबीजा धन्जन या शंखाद्यंजन आँखों में लगाएं।

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दृष्टिमंदता

कारण

सामान्य से कम, धुंधला या अस्पष्ट दिखाई देना दृष्टिमंदता कहलाता हैं।

लक्षण

आँख की मध्यवाहिका में किसी विकृति आने या आँख की तिरछी सतह की वक्रता में किसी परिवर्तन के कारण यह रोग होता हैं। दृष्टिपटल की सूक्ष्म धमनियों में विकृति आने, वृक्क रोग में तथा मधुमेह में भी यह स्थिति आ सकती हैं। पुराने जुकाम या कब्ज से भी इसकी संभावना हो सकती हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • यदि रोगी पुराने जुकाम अथवा कब्ज से पीड़ित हो, तो पहले उसकी चिकित्सा करें। इसी प्रकार वृक्क रोग या मधुमेह की शिकायत होने पर उसकी चिकित्सा करें।
  • पांच बादाम रात को पानी में भिंगो कर रखें। सुबह इसमें बराबर मात्रा में काली मिर्च डालकर पीस लें तथा मिसरी व मिर्च को दूध के साथ सेवन करें।
  • सौंफ, बादाम की गिरी व कूजा मिसरी, तीनों को बराबर की मात्रा में लेकर कूटकर रख लें। दो चमच्च चूर्ण रात को सोते समय गर्म दूध से लें। बच्चों के लिए मात्रा एक चमच्च हो जाएगी।
  • मुलेठी का पांच ग्राम चूर्ण आधा चमच्च शुद्ध घी व एक चमच्च शहद मिलाकर सुबह – शाम लें।

आयुर्वेदिक औषधियां

महात्रिफला घृत, सप्तमृत लौह, त्रिफला पाक, वासादि क्वाथ, अमृतादि गुग्गुल घृत या दशमूल घृत का प्रयोग दृष्टिमंदता में किया जा सकता हैं।

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गुहेरी (पलकों में दाने निकलना )

कारण

आँखों की समुचित सफाई के अभाव में जीवाणु संक्रमण के कारण यह रोग हो सकता है।

लक्षण

पलकों के बीच में दाने निकलते हैं, जिनमें लालिमा व दर्द होता हैं। बाद में दाने पककर फूट जाते हैं। कभी – कभी एक दाना ठीक होने पर दूसरा और दूसरा ठीक होने पर तीसरा दाना निकलता हैं और इस प्रकार दाने निकलते ही रहते हैं। आँखों की समुचित सफाई न करने से संक्रमण होने के कारण यह रोग होता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • इमली के बीजों को पानी में भिंगोकर उसका छिलका उतार लें। बीज की गिरी को पत्थर पर घिसकर आँख में लगाएं।
  • हलके गर्म पानी की सेंक करें।
  • त्रिफला का एक – एक चमच्च सुबह – शाम दूध के साथ लें। त्रिफला रात को पानी में भिंगोकर रखें व सुबह इस पानी को छानकर आँखों को धोएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

चंद्रोदय वर्ति, लोध्रादिसेक, धात्रीफलादि सेचन, निम्बपत्रादि योग का प्रयोग इस चिकित्सा हेतु बताया गया हैं।

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रात्रि अन्धता (रतौंधी)

कारण

विटामिन ए की कमी से होनेवाले इस रोग में रोगी को रात में कम दिखाई देता हैं या बिलकुल भी दिखाई नहीं देता हैं।

एक वयस्क व्यक्ति को 2000 से 4000 कैलोरी की दैनिक आवश्यकता होती हैं। यह दूध व अंडे की जर्दी में, गाजर, पालक, टमाटर आदि सब्जियों में पाए जाने वाले बीटा कैरोटिन से आँतों द्वारा तथा यकृत में विद्यमान कैरोटीनेस द्वारा तैयार होता हैं। भोजन में उपरोक्त चिकनाईयुक्त पदार्थों व सब्जियों के चिकनाई से यह रोग उत्पन्न होता हैं। पुराने दस्तों, ग्रहणी व यकृत संबंधी रोगों में भी विटामिन ए की उत्पत्ति तथा संचय का कार्य बंद हो जाता है, जिससे रात्रि अन्धता उत्पन्न हो सकती हैं।

लक्षण

रात में कम या बिलकुल दिखाई न देने के अतिरिक्त त्वचा में रूखापन रहता हैं। हड्डियों, आँतों व श्वासनली संबंधी रोग भी हो सकते हैं, क्योंकि विटामिन ए का इनकी कार्यप्रणाली के सुचारू रूप से संचालन हेतु महत्वपूर्ण योगदान हैं। गुर्दे में पथरी बनने की संभावना भी हो सकती हैं, क्योंकि इसके अभाव में गुर्दों के अन्दर के इपीथीलियम सेल झड़ने शुरू हो जाते हैं।

घरेलू चिकित्सा

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तीव्र रोग में विटामिन ए की 25000 से 50000 यूनिट प्रतिदिन की आवश्यकता पड़ती हैं। दूध, गाजर, पत्ता गोभी, टमाटर आदि का प्रयोग पूरे दिन में उनमें पाई जाने वाली विटामिन ए की मात्रा के अनुसार किया जा सकता हैं।

विटामिन ए की 2000 यूनिट लगभग आधा लीटर दूध में या 30 ग्राम मक्खन से या आधा किलो बंदगोभी से या 3 – 4 अण्डों से मिल जाती हैं। अतः विटामिन ए की कमी को पूरा करने के लिए टमाटर, पालक, गाजर व बंदगोभी की सब्जी रोगी को दिन में नाश्ते – भोजन आदि में खिलाएं, भोजन के साथ इनका सलाद भी लें। दिन में दो – तीन बार इनका रस पिएं। भोजन में मक्खन व दूध पर्याप्त मात्रा में लें।

  • टमाटर का सूप अथवा पालक, बंद गोभी व गाजर का सूप लें।
  • रोगी को चौलाई का साग नियमित रूप से खिलाएं।
  • हरी सब्जियों में से पालक में सर्वाधिक विटामिन ए हैं। रात्रि अन्धता से बचाव और इसके इलाज हेतु पालक की सब्जी व सूप का अधिक से अधिक प्रयोग करें।
  • दूध, मक्खन, अंडे की जर्दी में विटामिन ए अर्याप्त मात्रा में होती हैं, अतः इनका अधिकाधिक प्रयोग कराएं।

यदि दस्त, ग्रहणी अथवा किसी यकृत संबंधी रोग के कारण विटामिन ए के संचय और कार्य – प्रणाली में आई गड़बड़ी इस रोग के लिए जिम्मेवार हो, तो निम्न’लिखित चिकित्सा करवाएं –

  • पांचो नमक (सेंधा, काला, विड, समुद्र व सांभर ) बराबर मात्रा में पीस लें और साधारण नमक के स्थान पर इसका उपयोग करें।
  • गन्ने व मूली का रस (पत्ते सहित ) 4 : 1 के अनुपात में रोगी को दें।
  • 10 ग्राम तुलसी के पत्ते 250 ग्राम पानी में उबालें, एक चौथाई रह जाने पर उतार लें और ठंडा करके छानकर पिलाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

कुमार कल्याण रस, आमलकी रसायन, नवायस लौह, मंडूर भस्म, पुनर्नवा मंडूर।

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