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metabolic diseases
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स्कर्वी, रक्ताल्पता, मधुमेह, गठिया, मोटापा, गंजापन, कैंसर (चयापचय) का घरेलू उपचार

प्यारे रीडर्स आप सभी का लेटेस्ट जानकारी में स्वागत है आज आप हमारे हेल्थ पोस्ट के माध्यम से कुछ ऐसे बीमारियों के बारे में उनके कारण और उनका घरेलू उपचार जानेंगे जो चयापचय संबंधी रोग माना जाता है आप हमेशा से हमारे पोस्ट से हमेशा कुछ न कुछ नया सीखते आए हैं और आज भी आप सीखेंगे रक्ताल्पता मधुमेह गठिया जिसे आमबात भी कहते हैं मोटापा गंजापन और कैंसर यह सभी बीमारियां चयापचय बीमारी के नाम से भी जाना जाता है आप पोस्ट को पूरी तरह पढ़ें और फायदा प्राप्त करें तो आगे पढ़ें….

स्कर्वी – Scurvy

कारण

यह रोग विटामिन सी की कमी के कारण होता हैं। यह रोग किसी भी अवस्था में हो सकता हैं।

शरीर की कोशिकाओं को परस्पर जोड़ने वाले स्नायु तंतुओं के निर्माण की प्रक्रिया हेतु विटामिन सी की उपस्थिति आवश्यक हैं। हड्डियों व दांतों के निर्माण हेतु भी इस विटामिन की आवश्यकता होती हैं। यह हमारे शरीर में कुल मिलाकर 5 ग्राम में होती हैं तथा अधिक होने पर पेशाब के साथ निकलने लगता हैं। बच्चों को इसकी 25 मि.ली. मात्रा, वयस्क को 70 – 75 मि.ली. तथा गर्भिणी व प्रसूता को 100 – 150 मिली. की मात्रा प्रतिदिन आवश्यक होती हैं। बच्चों में माँ का दूध नहीं मिलने से तथा वयस्कों व तरूणों में विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में भोजन के द्वारा न मिलने से इस रोग की उत्पत्ति होती हैं।

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लक्षण

6 से 18 महीने के बीच के आयु के शिशुओं में विटामिन सी की कमी के कारण जांघ की हड्डियों के ऊपर व उनके आवरण के नीचे रक्तस्राव हो जाने के कारण शिशुओं को दर्द रहता हैं और टांगों को छूने से ही बच्चा चीखने लगता हैं। बालक दूध कम पीता हैं तथा बिना हिले – दुले पड़ा रहता है। बच्चे को हल्का सा बुखार भी रहता हैं। तरुण या वयस्क व्यक्ति में शरीर कमजोर, पीला, दुबला व शक्तिहीन हो जाता हैं और थोड़ी सी मेहनत करने पर सांस फूलोने लगती हैं। भूख खत्म हो जाती हैं, मन उदास रहता हैं तथा शरीर निष्क्रिय। टांगों की त्वचा पर बालों की जड़ों के आस – पास की खून की पतली शिराओं में से हल्का – हल्का रक्तस्राव होने से बालों के चारों ओर के नीचे छोटे – छोटे लाल रंग के चकते – चकते निकलने लगते हैं। त्वचा खुश्क खुरदरी तथा मोटी हो जाती हैं। मसूढ़ों में सूजन व उनसे रक्तस्राव हो सकता हैं। रोग के बढ़ने पर टांगों की मांसपेशियों में रक्तस्राव होने से टांगों में दर्द होता हैं व उसमें गांठें बन जाती हैं, जिन्हें छूने पर तेज दर्द होता हैं। ह्रदय की मांसपेशियों में रक्तस्राव होने के कारण हृदयशूल का रोग भी हो सकता हैं। नाक से भी खून आ सकता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • कच्चा आम इस रोग में बहुत लाभकारी हैं। रोगी को कच्चा आम खाने को दें या इसका पन्ना बनाकर दें। आम का मौसम न हो, तो अमचूर का सेवन कराएं।
  • संतरे के रस में विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में होता हैं, अतः रोगी को दिन में कई बार संतरा खिलायें या संतरे का रस पीने को दें।
  • चौलाई का साग खाने को दें।
  • इस रोग में आलू का प्रयोग काफी प्रभावी हैं। आलू की सब्जी, आलू का हलवा, आलू के पराठे और आलू का रायता और अन्य जिस रूप में संभव हो, आलू का प्रयोग कराएं।
  • नींबू, संतरा, टमाटर, स्ट्राबेरी, हरी सब्जियों, अंकुरित अनाजों, दालों, प्याज आदि में विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में होता हैं, अतः इनका प्रयोग भोजन में प्रचुर मात्रा में करें।

आयुर्वेदिक औषधियां

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    कुमारकल्याण रस, लाल तेल, रस पीपरी, आमलकी रसायन, आमलकी फल क्वाथ आदि।

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रक्ताल्पता – Anaemia

कारण

रक्त में हिमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य (13 से 16 ग्राम प्रति 100 क्यूबिक सेंटीमीटर ) से कम होना या रक्त में कणों की संख्या सामान्य ( 50 – 55 लाख प्रति क्यूबिक मिली मीटर ) से कम होना रक्ताल्पता कहलाता हैं। यह स्थिति निम्नलिखित कारणों से हो सकती हैं –

लोहे की कमी : हिमोग्लोबिन के निर्माण हेतु एक स्वस्थ पुरूष को 27 मिलीग्राम लोहे की प्रतिदिन आवश्यकता होती हैं। इसमें से 20 मिलीग्राम लगभग टूटे हुए रक्तकणों से आता हैं ( रक्तकण की आयु लगभग चार मास होती हैं और रक्तकणों का टूटना एक सामान्य प्रक्रिया हैं ) और लगभग 7 मिलीग्राम भोजन से प्राप्त होता हैं। आँतों में विदाह होने या जीवाणु संक्रमण के कारण भोजन में विद्यमान लोहा जब आँतों में भली – भांति विलीन नहीं हो पाता तो रक्ताल्पता उत्पन्न हो जाती है। 16 से 45 वर्ष की आयु की स्त्रियों में माहवारी, गर्भधारण, बच्चों को दूध पिलाने के कारण भोजन में लोहे की आवश्यकता विशेष रूप से होती हैं। इस आयु में स्त्रियों को यदि मलेरिया, श्वेत प्रदर या अन्य कोई जीवाणु संक्रमण हो तो उनमें रक्ताल्पता होने की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती हैं। दुबलेपन को सौन्दर्य की कसौटी मन बैठी किशोरियां और युवतियां, जो आधा – अधूरा भोजन करती है, रक्ताल्पता की शिकार आसानी से हो जाती है। रक्त परिक्षा करने पर रोगी के सीरम में लोहे की मात्रा काफी कम मिलती हैं। हिमोग्लोबिन भी कम हो जाता हैं। आमाशय में सूजन या संक्रमण होने की स्थिति में आमाशय में अमला का स्राव काफी कम हो जाता हैं। अमला की कमी के कारण लोहे का विलीनीकरण अंत के ड्येडीनम नामक भाग में सुचारू रूप से नहीं हो पाता, जिससे रक्ताल्पता की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं। इस स्थिति में न केवल व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता घाट जाती हैं, बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति में कमी आ जाती हैं।

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यदि गर्भावस्था के दौरान स्त्री को रक्ताल्पता रहे, तो गर्भस्थ शिशु को लोहा कम मिलता है। गर्भ के अंतिम तीन महीने में शिशु को लगभग 400 मिलीग्राम लोहा प्राप्त होता हैं। यदि गर्भवती स्त्री को रक्ताल्पता हो अथवा किसी कारंवाश शिशु समय से पहले सांतवे या आठवें महीने में उत्पन्न हो जाए (रक्ताल्पता के कारण भी शिशु समय से पूर्व उत्पन्न हो सकता हैं ), तो उसे लोहा आवश्यक मात्रा से कम मिल पाता हैं। गर्भ में एक से अधिक बच्चे होने की स्थिति में भी लोहा कम मिलेगा। ऐसे मामलों में जन्म के महीने भर में ही शिशु में रक्ताल्पता उत्पन्न हो जाती हैं। गाय – भैंस के दूध या डिब्बेबंद दूध में तो लौह की मात्रा कम होती ही हैं, लोहे के विलीनीकरण हेतु आवश्यक एसकोर्बिक एसिड भी ऐसे दूध में नहीं होता। यदि ऐसे बच्चे में बुखार जल्दी – जल्दी अआता हो या क्षय रोग आदि का संक्रमण हो, तो लोहे का शरीर में विलीनीकरण और भी कम हो जाता हैं।

कुपोषण : रक्तकणों के निर्माण हेतु फोलिक एसिड व विटामिन बी – 12 की उपस्थिति अत्यंत आवश्यक हैं। फोलिक एसिड एसकोर्बिक एसिड की उपस्थिति में आंत में विलीनीकरण के पशचात यकृत में फोलीनिक एसिड के रूप में संचित होता रहता हैं। यकृत से यह रक्त द्वारा मज्जा में पहुंचकर रक्तकणों के विकास में सहायता करता हैं। इसी प्रकार आमाशय रस में विद्यमान एक एन्जाइम भोजन से आये विटामिन बी – 12 को छोटी आंत में विलीन होने योग्य बनाता हैं, जहां से यकृत में जाकर संचित होती हैं। रक्त के द्वारा यकृत से अस्थिमज्जा में जाकर यह रक्तकणों के विकास में सहायता करता हैं। भोजन में यदि विटामिन बी 12 अथवा फोलिक एसिड की कमी हो, तो अस्थिमज्जा में रक्तकण मैगेलोब्लास्ट अवस्था से नोरेमो ब्लास्ट की अवस्था में विकसित नहीं हो पाता हैं। इस अवस्था में जांच करने पर रक्तकणों का आकार सामान्य अवस्था (7.2 माइक्रोन व्यास ) के बजाय बढ़ा हुआ (8.4 माइक्रोन मिलता हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इसे मैकरोसाइटिक एनीमिया के नाम से जाना जाता हैं।

यकृत रोग : यकृत वृद्धि, यकृत शोथ व यकृत के अन्य रोगों में जब रक्तकणों के निर्माण हेतु आवश्यक तत्त्वों का यकृत में नहीं हो पाता, तब भी रक्ताल्पता की स्थिति उत्पन्न हो सकती हैं।

औषधि जन्य रक्ताल्पता : कुछ एलोपैथिक दवाओं के प्रयोग से शरीर में विटामिन बी – 12 की कमी हो जाती है जिसके फलस्वरुप रक्तकणों का निर्माण प्रभावित होने से शरीर में रक्ताल्पता हो जाती है। इनमें डैराप्रिम, रिफामाइसीन, फिनायनटाइन व बारबिचूरेट औषधियां प्रमुख है। अतः रक्ताल्पता दृष्टिगोचर होने पर रोगी से पूर्व में ली गयी दवाओं के बारे में जानकारी लेना अत्यन्त आवश्यक हैं।

   रक्तस्राव जन्य रक्ताल्पता : चोट लगने या अन्य किसी कारण से तीव्र रक्तस्राव होने से भी रक्ताल्पता की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं। कैंसर, बवासीर, परिणाम शूल (पेप्टिक अल्सर ) आदि रोगों व पेट में कीड़े होने से चिरस्थायी रक्तस्राव होने की स्थिति में भी रक्ताल्पता उत्पन्न हो सकती हैं।

विष जन्य रक्ताल्पता : जीवाणु संक्रमण की विषाक्तता का प्रभाव अस्थिमज्जा पर होने से रक्तकणों के निर्माण में बाधा पड़ती हैं। इसी प्रकार हेपेटाइटिस, कैंसर, जीर्ण वृक्क रोग, मूत्र विष संचार आदि रोगों में विषैले द्रव्यों की उत्पत्ति से शरीर में रक्तकणों की मात्रा में कमी हो जाते हैं। सीसा, सोना, रेडियम, संखिया आदि द्रव्यों तथा फिनाइनटाइन, क्लोरमफैनिकोल, कलोरप्रोमाजीन, मैपाक्राईन आदि औषधियों के दुष्प्रभाव से भी रक्तकणों का विनाश हो जाता हैं और रक्तकणों के निर्माण में बाधा आती हैं।

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लक्षण

शरीर में पीलापन, भार में कमी, चक्कर आना, शरीर में अशक्ति अनुभव होना इस रोग के लक्षण हैं।

घरेलू चिकित्सा

कारण व लक्षणों के आधार रक्ताल्पता की चिकित्सा की जा सकती है। सामान्यतः हरी व पत्तेदार सब्जियों, गाजर, अनार, चीकू, सेब आदि फलों से रक्ताल्पता की चिकित्सा की जाती हैं। यदि आमाशय की गड़बड़ी हो, तो अजवायन, सौंफ, हरड़ व आंवले का प्रयोग उत्तम हैं। पेट में कीड़े हो, तो उनकी दवा लें। यदि यकृत का कोई रोग हो, तो उसकी चिकित्सा कराएं। किसी औषधि के प्रयोग से हुई विषाक्तता के कारण हुई रक्ताल्पता में औषधि का प्रयोग बंद करें। निम्नलिखित आधार द्रव्यों का भोजन में विशेष रूप से प्रयोग कर रक्ताल्पता की समस्या का निवारण किया जा सकता हैं – पालक, बथुआ, गाजर, शलगम, सेब, संतरा, चुकंदर, प्याज, जामुन, आंवला, अंगूर, पपीता, आम, चौलाई, मुनक्का, अंजीर, खूबानी, खजूर, अंकुरित चने, बादाम, केला, मसूर की दाल, टमाटर, किशमिश आदि।

आयुर्वेदिक औषधियां :

एमीरोन गोलियां व शरबत (एमिल), मैनोल सीरप व कैप्सूल (चरक), फेरोन कैप्सूल (माहेश्वरी), त्रिन्गासव(माहेश्वरी)

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मधुमेह – Diabetes Mellitus

कारण

रक्त और मूत्र में शर्करा बढ़ जाने के कारण इस रोग को मधुमेह कहा गया हैं। आयुर्वेद में इस प्रमेह का ही एक भेद माना गया है।

अनियमित आहार, शारीरिक श्रम का अभाव, चिंता, भय, तनाव, विषाद आदि मानसिक कष्टों की अधिकता, मोटापा, उच्च रक्तचाप आदि इस रोग के प्रमुख कारण है। आधुनिक मतानुसार इन्सुलिन उत्पादन करने वाले सेलों में विकृति के फलस्वरुप इन्सुलिन का निर्माण प्रभावित होता हैं, जिससे रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। दोनों मतों का समन्वय करते हुए कहा जा सकता है कि उपरोक्त वर्णित कारणों से इन्सुलिन निर्माण की प्रक्रोया में बाधा आती हैं, जिससे रक्त व बाद में मूत्र में शर्करा का स्तर बढ़ जाता हैं।

लक्षण

पेशाब बार – बार आना, मुंह सूखना, प्यास अधिक लगना, पिंडलियों में दर्द, थकान, कमजोरी, आलस्य, स्वभाव में चिडचिडापन, किसी भी कार्य में मन न लगना आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। रोग बढ़ने के साथ – साथ कब्ज, नींद न आना, अपच आदि लक्षण भी उत्पन हो जाते हैं।

घरेलू चिकित्सा

मधुमेह के रोगी को नियमित रूप से प्रातः भ्रमण करना चाहिए। व्यायाम भी अति आवश्यक हैं। गरिष्ठ पदार्थों के बजाय भोजन में सुपाच्च व हलके पदार्थ लेने चाहिए। निम्नलिखित औषधियों का प्रयोग किया जा सकता हैं –

  • जामुन की कोंपले 30 ग्राम व 5 काली मिर्चें पानी के साथ पीसकर दिन में दो बार प्रयोग करें।
  • जामुन की सूखी गुठलियों का चूर्ण 1 चमच्च दिन में तीन बार ताजे पानी के साथ लें।
  • पके हुए अमरूदों की उपलों (कंडे) की गर्म – गर्म राख में दबाकर भुर्त्ता बना लें। स्वाद के अनुसार जीरा, काला नमक व काली मिर्च मिलाकर सुबह – शाम लें।
  • 10 बिल्वपत्र सुबह – शाम पानी के साथ पीसकर लें।
  • एक चमच्च मेंथी के दानों को थोड़ा कूटकर शाम को पानी में भिंगो दें। सुबह इसे अच्छी तरह घोंटकर बिना मीठा मिलाएं पी जाएं। इसके प्रयोग से 2 महीने में यह रोग बिलकुल ठीक हो जाता है।
  • सूखा आंवला और सौंफ बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीस लें। एक – एक चमच्च सुबह – शाम पानी के साथ लें।
  • आधा चमच्च बारीक पीसी हुई हल्दी 2 चमच्च शहद में मिलाकर सुबह – शाम चटाएं।
  • नाश्ते के बाद ताजे करेलों का रस 20 – 30 ग्राम की मात्रा में लें।
  • बेल के 20 – 30 पत्तों का रस निकाल कर सुबह – शाम लें।
  • लहसुन की एक कली सुबह – शाम खाली पेट लें।
  • 2 चमच्च नींबू का रस और 4 चमच्च आंवले के रस में एक चमच्च शहद मिलाकर सुबह खाली पेट लें।
  • आधा चमच्च जीरा बारीक पीसकर सुबह – शाम लें।
  • अंजीर के बीज गूदे से अलग कर, सुखाकर पीस लें। एक चमच्च चूर्ण एक चमच्च चूर्ण एक चमच्च शहद के साथ खाली पेट लें।
  • करेले के पत्तों को 2 चमच्च की मात्रा के चूर्ण बनाकर उसमें चुटकी भर हींग मिलाकर सुबह के समय लें।
  • यदि मधुमेह वंशानुगत हो तथा मोटापा भी हो, तो मीठे नीम के दस पत्ते सुबह खाली पेट 3 – 4 महीने तक चबाकर खाएं ।
  • चन्दन को कूट – पीसकर चूर्ण बना लें। 1 चमच्च चूर्ण बराबर मात्रा में आंवले के आंवले के चूर्ण के साथ एक गिलास पानी में उबालें। छानकर सुबह – शाम पिएं।
  • दो चमच्च आंवले के रस में एक चमच्च शहद मिलाकर सुबह – शाम लें।
  • खीरे का रस 100 ग्राम की मात्रा में सुबह खाली पेट लें।
  • रोगी को शलगम की सब्जी खिलाएं।
  • रोगी को दिन में कई बार टमाटर खिलाएं या टमाटर का रस पीने को दें।
  • रोगी को दिन में तीन बार 4 – 5 चकोतरा के फल खिलाएं।
  • सोयाबीन में काफी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट हैं, लेकिन स्टार्च की मात्रा नगण्य हैं। सोयाबीन मधुमेह के रोगी हेतु सर्वोत्तम भोजन हैं, क्योंकि सोयाबीन में विद्यमान कार्बोहाइड्रेट से शर्करा के स्तर में वृद्धि नहीं होती हैं।
  • चने का प्रयोग मधुमेह में काफी लाभदायक हैं। अंकुरित चने, चने की रोटी, चने की सब्जी या भुने हुए चने खाने से इन्सुलिन ले रहे रोगियों को भी आशातीत लाभ होता हैं।
  • अंकुरित उड़द एक मुट्ठी एक चमच्च शहद और आधा कटोरी करेले के रस के साथ खाली पेट छः माह तक लें। इस दौरान भोजन में कार्बोहाइड्रेट न लें। इससे न केवल मधुमेह के उपद्रवों की शान्ति होती हैं, बल्कि मधुमेह जन्य नपुंसकता में भी चमत्कारिक लाभ होता हैं।
  • अरहर के पत्तियों का रस 30 मि.ली. सुबह – शाम नमक मिलाकर लें।
  • रोज 50 ग्राम भुनी हुई मूंगफली खाएं। इससे भोजन में पौष्टिकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही रक्त्वाहीनियों से सम्बंधित उपद्रव भी नहीं होंगे।

आयुर्वेदिक औषधियां

बसन्तकुसुमाकर रस, मधुमेहान्तकवटी, वृहत्तसोमनाथ रस। स्वर्णघटित चंद्रकांत रस, शिलाजीत आदि आयुर्वेदिक दवाएं भी इस रोग में ली जा सकती हैं।

पेटेंट औषधियां

डिवाइन डायब कैप्सूल ( बी. एम. सी. फार्मा), जम्बुलीन गोलियां(ऊंझा), डाइबिकोन गोलियां (हिमालय), एमरी प्लस (एमिल), हाइपोनिड गोलियां (चरक), मधुमेहारि योग (वैद्यनाथ), पैनक्रीओन कैप्सूल (माहेश्वरी)।

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गठिया ( आमवात ) – Arthritis

कारण

इस रोग में हाथ – पैर, कंधे, घुटने, एड़ी, कलाई आदि सहित शरीर के जोड़ों में सूजन और दर्द रहता हैं। प्रौढावस्था में इस रोग की उत्पत्ति अधिक होती हैं, किन्तु आहार – विहार की गड़बड़ी के कारण युवावस्था में भी यह रोग हो सकता हैं।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में रिह्यूमैटॉयड फैक्टर को इस रोग का कारण माना गया हैं। कथित फैक्टर की उत्पत्ति विरुद्ध आहार – विहार के सेवन से शरीर में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों के फलस्वरूप ही होती हैं।

लक्षण

यह एक व्यापक रोग हैं जो अस्थियों, पेशियों, फेफड़ों व ह्रदय आदि अंगों के आवरणों आदि के स्नायु तंतुओं में होता हैं, जो बहुत धीरे – धीरे बढ़ता है। पहले हाथ की अँगुलियों, विशेषतः बीच की दो अँगुलियों की संधियों में सूजन से शुरू होती हैं। इसके बाद कलाई, कुहनी, घुटने आदि के जोड़ों में यह रोग फैल जाता हैं। शरीर में थकावट व कमजोरी के साथ मांसपेशियों में दर्द की शिकायत बढ़ती चली जाती हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • हरड़ का ½ ग्राम चूर्ण 10 मि.ली. एरंड तेल के साथ सुबह – शाम लें।
  • सोंठ का ½ ग्राम चूर्ण 100 मि.ली. कांजी के साथ दिन में दो बार दें।
  • एरंड तेल 20 ग्राम की मात्रा में सुबह – शाम गर्म दूध के साथ दें।
  • सोंठ, अजवायन और बड़ी हरड़ सब को समान भाग लेकर चूर्ण बना लें एवं आधा चमच्च चूर्ण सुबह – शाम गर्म पानी के साथ दें।
  • बथुए के ताजा पत्तों का स्वरस डेढ़ से दो चमच्च सुबह – शाम लें। इसमें नमक, चीनी कुछ न मिलाएं।
  • बिनौले के तेल की मालिश करें।
  • मेथी के लड्डू बनाकर खाने से भी गठिया में आराम मिलता हैं, लेकिन ये सर्दी में खाने चाहिए।
  • तारपीन का तेल सरसों के तेल में मिलाकर मालिश करने से गठिया में लाभ पहुंचता हैं।
  • तुलसी की पत्तियां और एरंड की पत्तियों को सेंधानमक के साथ पीसकर गर्म कर लें और दर्द वाले जोड़ पर लेप करके ऊपर से बाँध दें।
  • लहसुन की एक कली दिन में 2 – 3 बार पानी के साथ निगलें या लहसुन को देसी घी में भूनकर अचार की तरह खाएं।
  • नीम के तेल से नियमित रूप से सम्बंधित जोड़ों की मालिश करें।
  • 2 चमच्च तिल के तेल में 2 – 3 काली मिर्च तब तक भुनें, जब तक जल कर कोयला न बन जाएं। जब इतना गर्म रहे कि लगाया जा सके, तो जोड़ों पर लगाएं।
  • एक भाग काली मिर्च व दो भाग सोंठ और इतना ही जीरा कूट पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण ½ चमच्च की मात्रा में दिन में तीन बार लें।
  • दिन में तीन बार रोगी को 100 – 100 ग्राम आलू – बुखारे खिलाएं।
  • तरबूज का रस 50 – 50 ग्राम दिन में दिन बार पिलाएं। यदि सूजन अधिक हो, तो तरबूज के बीज कूटकर उनका रस भी साथ में मिला लें।
  • पके हुए शहतूत दिन में कई बार खिलाएं।
  • गठिया में सेब का प्रयोग बहुत लाभदायक हैं। विशेषकर उस स्थिति में जब रक्त में यूरिक एसिड की मात्रा अधिक बढी हुई हो। सेब में विद्यमान मैलिक एसिड रक्त में बढे हुए यूरिक एसिड की मात्रा को घटाकर गठिया सहित अन्य वात रोगों में भी शीघ्र लाभ पहुंचाता हैं।
  • गठिया आदि वात रोगों में केला भी काफी लाभदायक सिद्ध हुआ हैं। पांच दिन तक रोगी को सिर्फ केले खिलाएं, कुछ और खाने को न दें।

आयुर्वेदिक औषधियां

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त्रैलौक्य चिंतामणि रस, वातचिन्तामणि रस, योगेन्द्र रस, महायोगराज गुग्गुल, रसराज रस, चिन्तामणि चतुर्मुख रस, चतुर्भुज रस, आमवातारि रस, एरंड पाक औषधियां इस रोग की चिकत्सा हेतु प्रयोग किया जा सकता हैं।

पेटेंट औषधियां

डिवाइन रिलीफ कैप्सूल (बी.एम.सी. फार्मा), मस्काल्ट गोलियां व मस्काल्ट फोर्ट कैप (एमिल), आर. कंपाउंड गोलियां (एलारसिन), रिमानिल तेल व कैप्सूल (चरक), रूमाविट गोलियां व तेल (संजीवन), मायोस्टोल तेल व गोलियां (सोल्यूमिक्स), रूहेम गोलियां व तेल (माहेश्वरी) आमवात में अत्यंत प्रभावकारी हैं।

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मोटापा – Obesity

कारण

खाने – पीने में वसायुक्त पदार्थों का अधिक प्रयोग, शारीरिक श्रम का पूर्णतः अभाव और दोषपूर्ण जीवन प्रणाली मोटापे का मुख्य कारण हैं। कभी – कभी मोटापा वंशानुगत भी चलता हैं। हारमोन असंतुलन के कारण भी मोटापा बढ़ सकता हैं।

लक्षण

शरीर के आकार व भार में लगातार वृद्धि होना, शरीर में चुस्ती, फुर्ती की कमी होना आदि।

घरेलू चिकित्सा

  • सर्वप्रथम व्यक्ति को अपनी जीवन प्रणाली में सुधार करना चाहिए। शारीरिक व्यायाम व योगाभ्यास के अतिरिक्त अधिक वसायुक्त भोजन का त्याग करना चाहिए। खाने में फलों, सब्जियों व सलाद की मात्रा बढ़ा देना चाहिए। मिठाई, आइस – क्रीम, तले हुए भोजन को त्याग देना चाहिए।
  • मूली के बीजों को अत्यंत बारीक पीसकर रख लें। 1 चमच्च चूर्ण को चार चमच्च शहद में मिलाकर चाटें। ऊपर से 1 गिलास पानी में चार चमच्च शहद व नींबू निचोड़ कर लें।
  • 10 ग्राम त्रिफला चार चमच्च शहद में मिलाकर चाटें, ऊपर से चार चमच्च शहद पानी में मिलाकर् पिएं।
  • भोजन से पहले टमाटर, गाजर, खीरा, पपीता, पत्ता गोभी का सलाद काफी मात्रा में खाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

मदोहर विडंगादि लौह, आरोग्यवर्धिनी वटी, नवाय लौह व नवक गुग्गुल का प्रयोग किया जा सकता हैं।

पेटेंट औषधियां

स्मार्ट कैप्सूल (माहेश्वरी), ओबेनिल गोलियां (चरक) भी अच्छा कार्य करती हैं।

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गंजापन – baldness (alopecia)

कारण

बाल झड़ने के मुख्य कारण हैं – रक्त विकार, कमजोरी व त्वचा का संक्रमण। मानसिक कारणों में चिंता, क्रोध, शोक आदि प्रमुख हैं।

लक्षण

कंघी करते वक़्त, नहाते समय या अपने आप ही सिर के बाल टूटने लगते हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • सफ़ेद या लाल चिरमठी (घुंघची) पानी में घिसकर लगायें।
  • पत्ता गोभी के रस की सिर पर मालिश करें।
  • कमला आठ गुना सरसों के तेल में इतना खरल करें कि तेल लाल हो जाए। सिर को नीम के पानी से धोकर यह तेल लगाएं।
  • दही को ताम्बे के बरतन में तांबे के चमच्च से इतना घोटें कि वह हरे रंग की हो जाए। इसके बाद इसे सिर पर लगाएं।
  • कनेर के पत्ते चार गुना सरसों के तेल के साथ कड़ाही में गर्म करें। जब पत्ते काले पड़ जाएं, तो तेल को उतारकर छान लें व सिर में लगायें।
  • लहसुन का रस निकालकर सिर में लगाएं।
  • नीम और बेर के पत्तों को पानी में पीसकर सिर पर लेप करें व दो घंटे बाद धोलें।

आयुर्वेदिक औषधियां

आयुर्वेद में बालों को झड़ने से रोकने हेतु आंवला तेल, भृंगराज तेल आदि का विधान बतलाया गया हैं।

पेटेंट औषधियां

केशम हेयर आयल व कैप्सूल (माहेश्वरी)।

 

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कैंसर – cancer

कारण

शरीर के किसी भी अंग में कोशिकाओं की संरचना में अज्ञात कारणों से परिवर्तन होकर उनमें कैंसर जन्य तत्वों की प्रवृत्ति बन जाती हैं। जब ऐसे काफी सारे सेल इकट्ठे हो जाते हैं, तो किसी भी अंग में कैंसर की उत्पत्ति होती हैं।

कैंसर की उत्पत्ति शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति में कमी आने के कारण होती हैं। तम्बाकू, शराब आदि पदार्थों करने वाले व्यक्तियों में यह रोग उत्पन्न होने की संभावना अधिक रहती हैं।

लक्षण

शरीर के किसी भी अंग में गाँठ बन जाना, कमजोरी, भार में कमी आदि लक्षण इस रोग में देखने को मिलते हैं। शरीर के जिस भाग में कैंसर हो, उसके अनुसार लक्षण अलग से मिलते हैं, जैसे आमाशय के कैंसर में भूख की कमी और कब्ज़। इसी प्रकार फेफड़ें के कैंसर में छाती में दर्द, खांसी या रक्तवमन आदि।

घरेलू चिकत्सा

  • तुलसी के 30 – 35 पत्तों को चटनी बनाकर छाछ के साथ सुबह – शाम दें। खाने के लिए दूध या दही ही दें।
  • रोगी को पूरे दिन केवल गाजर का रस पिलाएं। लगभग एक माह में पूर्णतः आराम हो जाएगा।
  • मेथी के दानों को रातभर पानी में भिंगोकर रखें। अगले दिन व रात उसे गीले कपड़े में टांगकर रखें, जिससे वे अंकुरित हो जाएं। मेथी के ये अंकुरित दाने सुबह – शाम आधा मुट्ठी लेकर अच्छी तरह चबाकर खाएं।
  • गेहूं के अंकुरित दानों को बहुत ही बारीक पीसकर एक चमच्च देसी घी में हल्का सा भूनें और ऊपर से दूध डाल दें। यह दूध सुबह – शाम लें।
  • आधा – आधा कप चुकंदर का रस रोगी को सुबह – शाम दें। चाहें तो इसमें तीन से चार गुना तक गाजर का रस भी मिला सकते हैं।
  • टमाटर व पालक का रस बराबर मात्रा में मिलाकर एक – एक गिलास सुबह – शाम दें। इसमें एक बड़े नींबू का रस भी मिला लें।
  • मूंग, चना, सोयाबीन, गेंहू व मेथी बराबर मात्रा में लें और अंकुरित होने पर अच्छी तरह पीसकर दही के साथ लें। दही खट्टी न हो।
  • लहसुन की 1 – 2 कलियाँ कूट – पीसकर पानी के साथ पिएं। यह पेट के कैंसर में विशेष रूप से लाभदायक हैं। प्रातः काल काली तुलसी के पत्ते चबाकर ऊपर से गोमूत्र पिएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

गुल्महर चूर्ण, वज्र भस्म, मल्लसिन्दूर, गंधक रसायन, कांचनार गुग्गुल, शिग्रुगुग्गुल, रस माणिक्य, केसरगजकेशरी रस, आरोग्यवर्धिनी वटी, संजीवनी वटी, रसांजन घन वटी आदि।

पेटेंट औषधियां

डिवाइन हेल्थ एड व डिवाइन लाइफ कैप्सूल (बी.एम.सी. डिवाइन फार्मा)

नोट: बताये हुए बिधि को यूज़ करते रहे आपको फायदा अवश्य मिलेगा, और फिर भी मन में कोई संकोच है, तो एक बार डॉक्टर की परामर्श अवश्य लें. हमारे लेटेस्ट जानकारी के पोस्ट को इसी तरह पढ़ते रहे और फायदा प्राप्त करते रहें।

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