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hisab chukta kiya
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हिसाब चुकता किया – ज्ञानवर्धक हिंदी कहानी

तेनालीराम के मन में राजगुरू के व्यवहार को लेकर कटुता व्याप्त थी। वह मन ही मन निश्चय कर चुका था कि वह एक दिन राजगुरू से अपना हिसाब जरूर चुकता करेगा। इसलिए वह उचित मौके की ताक में रहने लगा। एक दिन नदी में उसे पता चला कि राजगुरू नित्यप्रति सवेरे चार बजे नगर से तीन मील दूर तुंगभद्रा नदी में स्नान करने के लिए जाते हैं। अतः तेनालीराम भी एक दिन सवेरे – सवेरे जा पहुंचा।

वहाँ पहुंचकर उसने देखा कि राजगुरू नदी में स्नान कर रहे थे। उसने नदी के किनारे पर रखे उनके कपड़े वहाँ से उठाकर कहीं छिपा दिए।

नदी में स्नान करने के बाद राजगुरू जब बाहर निकले तो देखा कि उनके कपडे वहाँ नहीं हैं और वहाँ पर तेनालीराम खड़ा हुआ हैं। राजकुमार ने उससे पूछा, रामलिंगम मेरे वस्त्र कहाँ हैं ?

ओह, तो आपको मेरा नाम याद आ गया ? तेनालीराम ने व्यांग्यतापूर्ण शब्दों में कहा।

मेरे कपड़े कहाँ ….. ?

कपड़े ? कैसे कपड़े ? मैं आपके कपड़ों के विषय में कुछ नहीं जानता।

नहीं – नहीं ऐसा न करो। तुम जो भी कहोगे मैं करने को तैयार हूँ। पर मेरे वस्त्र मुझे वापस कर दो।

जो कहूंगा, वह आप करोगे ? तेनालीराम ने पूछा।

हाँ – हाँ बाबा करूंगा लेकिन मेरे वस्त्र मुझे वापस लौटा दो।

तो आपको मुझे कन्धों पर बैठाकर राजमहल के प्रांगण तक ले चलना होगा। क्या आपको मेरी शर्त मंजूर हैं ?

हाँ मंजूर हैं। हारकर भरी सी आवाज में राजगुरू ने कहा।

फिर तेनालीराम ने उसके वस्त्र वापस लौटा दिए।

वस्त्र पहनकर राजगुरू ने अपने वादे के मुताबिक़ तेनालीराम को अपने कन्धों पर बिठाया और राजमहल की ओर ले चले। जब राजगुरू ने नगर में प्रवेश किया तो यह विचित्र दृश्य देखकर सभी लोग हँसते – मुस्कुराते, तालियाँ पीटते उनके पीछे हो गए।

जब यह विचित्र जुलूस राजमहल के नजदीक पहुंचा तो शोर सुनकर राजा कृष्णदेव शयन कक्ष से बाहर आकर उसके छज्जे पर खड़े होकर दृश्य देखने लगे।

उन्होंने देखा कि राजगुरू तेनालीराम को कंधे पर उठाये हुए आ रहे हैं। लज्जा से उनका सिर झुका हुआ है और वे पसीने से लथपथ हैं।

जबकि उनके कंधे पर बैठा तेनालीराम खिलखिला कर हंस रहा था। अपने राजगुरू का यह अपमान उनसे देखा न गया और वह क्रोधित होकर अपने दो अंगरक्षकों को कहा, तुम नीचे प्रांगण में जाओ। वहाँ एक आदमी दुसरे के कन्धों पर चढ़ा हुआ हैं। ऊपर चढ़े आदमी को नीचे गिरा दो और लात घूसों से उसकी मरम्मत करो। जो व्यक्ति उसे उठाये हुए हैं उन्हें आदर से मेरे पास ले आओ।

इधर चतुर तेनालीराम ने देख लिया था कि राजा ने अपने दो अंगरक्षकों को बुलाकर उन्हें कुछ आदेश दिया हैं। वह समझ गया कि राजा ने क्या कहा होगा ? वह शीघ्रता से राजगुरू को अपने कन्धों से उतारकर उनके पैरों में गिर गया और बोला, राजगुरू ! यह मैंने आपके साथ क्या किया ? न जाने मेरी मति को क्या हो गया था जो मैं आप जैस विद्वान महापुरूष के साथ ऐसा बुरा बर्ताव कर बैठा मुझे क्षमा कर दीजिये गुरूजी। आप तो बहुत उदारमना हैं। मैं अपनी इस गलती का प्रायश्चित करना चाहता हूँ, अतः आप मेरे कन्धों पर बैठें अब मैं आपको राजमहल में ले चलूँगा।

इतना कहकर तेनालीराम ने राजगुरू को अपने कन्धों पर बिठा लिया और राजमहल की ओर ले चला।

तेनालीराम अभी कुछ ही कदम चला था कि राजा के अंगरक्षक वहाँ आ पहुंचे। उन्होंने बिना कुछ कहे – सुने ही राजगुरू को नीचे गिराकर घूसों व लात से उनकी खूब मरम्मत कर डाली और तेनालीराम को पकड़कर राजा कृष्णदेव के पास ले गए।

राजगुरू अपने ऊपर टूटी इस अनायास मुसीबत के बारे में कुछ समझ न सके कि यह सब क्या हुआ, क्यों हुआ ?

जब राजा के अंगरक्षक तेनालीराम को लेकर उनके पास पहुंचे तो वह बहुत हैरान हुआ।

उसने पूछा, इसे यहाँ क्यों ले आये हो ? मैंने तो तुम्हें इसकी पिटाई करने का आदेश दिया था। दूसरा आदमी कहाँ हैं, जो इसको अपने कन्धों पर बिठाए हुए थे। महाराज आपने हमें ये आदेश दिया था कि कन्धों पर चढ़े हुए व्यक्ति की लात घूसों से पिटाई की जाए और उसे उठाने वाले व्यक्ति को आपके सामने उपस्थित किया जाए। हमने आपके आदेश का अक्षरशः पालन किया हैं। एक अंगरक्षक ने अपना सिर झुकाते हुए कहा।

क्या मतलब ? यह आदमी उस दुसरे व्यक्ति को अपने कन्धों पर उठाये हुए था ? तुमने उस व्यक्ति की पिटाई की और इसे यहाँ ले आये ? राजा ने आश्चर्य से पूछा।

जी महाराज ! अंगरक्षक ने सादर मुद्रा में उत्तर दिया।

ओह ! यह व्यक्ति तो बेहद चतुर हैं। इसने मेरे आदेश का पहले से ही कैसे अंदाजा लगा लिया ? यह कहते हुए राजा विस्मय से भर उठे। और क्रोध से लाल – पीले होते हुए आदेश दिया, इसे ले जाओ और मौत के घात उतार दो। इसने हमारे राजगुरू के कन्धों पर बैठकर उनका अपमान ही नहीं किया बल्कि इसके कारण उन्हें लात और घुसें भी खानी पड़ी। वे ऊपर से तो गंभीर मुद्रा धारण किये रहे पर चुगलखोर राजगुरू से असल में किसी को हमदर्दी न थी।

जब दोनों अंगरक्षक राम को लेकर चल दिए तो दोनों दरबारी भी उनके पीछे – पीछे हो लिए।

रास्ते में उन्होंने राजगुरू की दुर्गति की कहानी तेनालीराम की ज़ुबानी सुनी। तेनालीराम ने उनसे मित्रता की गुहार लगाते हुए कहा कि वे किसी तरह उसकी जान बचा ले।

राजदरबारियों ने तेनालीराम की मदद की और अंगरक्षकों को तेनालीराम से कुछ स्वर्ण मुद्राएं दिलवा दी।

उनसे आजाद होने पर तेनाली ने दरबारियों और अंगरक्षकों से प्रतिज्ञा की कि वह इस राज्य को छोड़कर अन्यत्र चला जाएगा। वहाँ से चलकर वह अपने घर में जाकर छिप गया।

इधर दोनों अंगरक्षकों ने तलवार से एक बकरे का सिर धड़ से अलग कर दिया उसके खून से सनी हुई तलवार ले जाकर प्रमाणस्वरूप अपने सरदार को दिखा दी, जिसने राजा को समाचार दे दिया कि उनके आदेश का पालन कर दिया गया हैं।

अगले दिन, तेनालीराम ने अपनी माँ और पत्नी को राजा कृष्णदेव के पास भेज दिया। दोनों रोती, चिल्लाती राजा के पास जा पहुँची।

क्या बात हैं ? तुम दोनों क्यों रो रही हो ? राजा कृष्णदेव ने उनसे पूछा।

महाराज ! एक छोटे से अपराध के लिए आपने मेरे बेटे तेनालीराम को मृत्युदंड दे दिया। उसके इस दुनिया से चले जाने से मेरा तो बुढापे का सहारा ही छिन गया। रोते – रोते तेनालीराम की माँ ने फ़रियाद सुनाई।

मेरा व मेरे बच्चे का एकमात्र सहारा आपने हमसे छीन लिया। अब इस परदेस में मुझे और मेरे बच्चे को सहारा कौन देगा ? तेनालीराम की पत्नी ने भी फूट – फूट कर रोते हुए अपनी बात कही।

राजा कृष्णदेव को उन पर दया आ गयी और उन्होंने आज्ञा दी, इन्हें हर महीने गुजारा के लिए राजकोष से दस स्वर्ण मुद्राएं दी जाएं, जिससे ये दोनों अपना और इस बच्चे का भरण – पोषण कर सके।

राजदरबार से वापस आकर तेनाली की माँ और उसकी पत्नी ने तेनालीराम को यह बात सुनाई। तब हंसता हुआ तेनालीराम बोला, मैंने अपने प्राण बचाने के लिए जो बीस स्वर्ण मुद्राएं अंगरक्षकों को दी थी, वे तो अब दो महीनों में वसूल हो जाएंगी और तुम्हारे भरण – पोषण की भी अब चिंता नहीं रहेगी।

इस तरह तेनालीराम ने राजगुरू से बदला ले लिया और अपने परिवार के भरण – पोषण का भी प्रबंध कर लिया।

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