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यकृत ( जिगर में वृद्धि )

कारण

यकृत की कोशिकाओं को मुख्यतः शिराओं का रक्त ( अशुद्ध ) ही मिलता हैं , जिससे उनकी प्रतिरोधक शक्ति स्वाभाविक रूप से ही कम होती हैं। जब कोई विक्षोभकारी बाहरी द्रव्य यकृत में प्रवेश करता हैं , तो उसका मुकाबला करते हुए यकृत की कुछ कोशिकाओं की मृत्यु हो जाती हैं , जिनके स्थान पर नयी कोशिकाएं आ जाती हैं। यदि बाहरी द्रव्य अधिक हानिकारक प्रकृति का हो या यकृत में अधिक समय तक रहे और अधिक कोशिकाएं मृत हो जाएं , तो उनके स्थान पर स्नायु तंतु आ जाते हैं , जिससे यकृत कठोर तथा आकार में छोटा हो जाता हैं। यह स्थिति कभी – कभी गर्भावस्था में शरीर में अधिक मात्रा में विष द्रव्य बनने या संखिया , पारा आदि तीक्ष्ण दवाओं के अधिक मात्रा में ले लेने से भी उत्पन्न हो जाती हैं।

लक्षण

भूख में कमी , बुखार , शरीर में पीलापन , उलटी , कमजोरी , दाईं ओर की पसलियों के नीचे की ओर दर्द , पेट में अफारा , पेट और पैरों में भारीपन। रोग बढ़ने पर जलोदर , रक्त्वमन और मूर्च्छा जैसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • बड़ी हरड़ का चूर्ण दोगुने गुड़ में मिलाकर रोगी को सुबह – शाम गर्म पानी से दें।
  • दिन में दो बार प्याज भूनकर दें।
  • दो नींबू लेकर बीच से काटकर उनके बीज निकाल दें। चारों फांकों में से एक में पीसी हुई काली मिर्च , दुसरे में पीसी हुई सोंठ तीसरे में मिसरी और चौंथे में सेंधानमक या काला नमक भर दें। रात भर रखने के बाद सुबह खाली पेट नींबू के इन फांकों को मंदी आंच या तवे पर गर्म करके चूसें।
  • उबला हुआ पानी सुबह – शाम भोजन के बाद घूँट – घूँट कर पिएं।
  • 2 चमच्च अजवायन और दो बड़ी पिप्पल मिट्टी के बर्तन में रात भर भिंगोकर रखें। सुबह पीसकर व उसी पानी में घोलकर रोज खाली पेट दो सप्ताह तक दें।
  • गन्ने का एक – एक गिलास रस दिन में तीन – चार बार रोगी को दें।
  • गाजर के रस में चुकंदर का रस तथा काला नमक व काली मिर्च डालकर सुबह – शाम खाली पेट दें।
  • एक चमच्च मेंथी के दाने कूटकर 1 कटोरी पानी में उबालें। पानी तीन चौथाई रह जाने पर छानकर घूँट – घूँट करके गर्म को ही पिएं।
  • पके हुए पपीते के काले बीज यकृत वृद्धि की चिकित्सा में लाभदायक हैं , विशेष रूप से शराब के अधिक सेवन या पौष्टिक भोजन के अभाव के कारण हुई यकृत वृद्धि में। बीजों का चार चमच्च रस निकालकर आधा चमच्च नींबू के रस में मिलाएं और सुबह – शाम दें। लगभग एक माह में यकृत बिलकुल सामान्य हो जाएगा।

भोजन एवं परहेज

शराब , लाल मिर्च , अचार , सिरका , तेज मसाले व तले हुए भोजन का पूर्णतः परहेज करना चाहिए। प्रोटीन युक्त भोजन का प्रयोग विशेष रूप से करना चाहिए। गाय का क्रीम निकाला हुआ दूध या छाछ रोगी को दें। फलों का रस व उबली हुई सब्जियां दें।

पेटेंट औषधियां

फाईलासिल कैप्सूल (माहेश्वरी) , एमलीक्योर डी.एस. सीरप (एमिल) , लिवोमिन सीरप (चरक) , साइटोजन गोलियां (चरक) , एम्लीक्योर सीरप व गोलियां (एमिल) , डिवाइन लिव-सी कैप्सूल (बी.एम.सी.) इस रोग की चिकित्सा में लाभदायक हैं।

नोट: बताये हुए बिधि को यूज़ करते रहे आपको फायदा अवश्य मिलेगा, और फिर भी मन में कोई संकोच है, तो एक बार डॉक्टर की परामर्श अवश्य लें. हमारे लेटेस्ट जानकारी के पोस्ट को इसी तरह पढ़ते रहे और फायदा प्राप्त करते रहें।

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