Home / स्वास्थ / दिल का दौरा, बचाव एवं कुछ जरूरी घरेलू टिप्स
heart atteck
heart atteck

दिल का दौरा, बचाव एवं कुछ जरूरी घरेलू टिप्स

दिल का दौरा

कारण

ह्रदय की मांसपेशियों को रक्त आपूर्ति में बाधा से दिल का दौरा पड़ता हैं। मांसपेशियों तक रक्त ले जाने वाली धमनियों में अवरोध के कारण ऐसा होता हैं। यह अवरोध एकाएक पैदा नहीं होता , बल्कि धमनियों की दीवारों में कई सालों तक कोलेस्ट्रोल के लगातार जमाव होते रहने के कारण ऐसा होता हैं।

जब ह्रदय को रक्त की आपूर्ति कम होनी शुरू होती हैं तो व्यक्ति चलने – फिरने में बेचैनी व कभी – कभी छाती में दर्द महसूस करने लगता हैं। यह स्थिति हृत्शूल (एंजाइना) कहलाती हैं। धमनियों में कोलेस्ट्रोल का जमाव बढ़ते जाने से ह्रदय की मांसपेशी को रक्त पूर्ति जब अधिक बाधित होने लगती हैं , तो आराम के दौरान भी बेचैनी महसूस होने लगती हैं। इस स्थिति को असंतुलित हृत्शूल कहते हैं। धमनी में जब तीन चौथाई से अधिक अवरोध हो जाए तो व्यक्ति को कभी भी दिल का दौरा पड़ सकता हैं। कुछ मामलों में धमनी में पूर्ण अवरोध होने पर ही दौरा पड़ता हैं। दिल का दौरा रात्रि के अंतिम पहर या भोर के समय वह भी ठंड के मौसम में विशेष रूप से पड़ता हैं। इसीलिए रात्रि के अंतिम प्रहर या भोर के समय छाती में होने वाले दर्द की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए , क्योंकि दौरा पड़ने के तुरंत बाद चिकत्सा सहायता मिल जाए , तो जीवन रक्षा हो सकती हैं। दौरा पड़ने के बाद इलाज में जितनी देरी होगी , जीवन की संभावना उतनी ही क्षीण होती चली जाएगी।

ये भी पढ़ें: सच्चा ज्ञानी

लक्षण

दिल के दौरे में बेचैनी , दम घुटना व छाती में विशेष रूप से छाती के बीचोबीच दर्द होता हैं , जो बाएँ कंधे या बाईं बांह की तरफ बढ़ता हैं। यह दर्द कभी – कभी गरदन , दांत , जबड़े या दाईं बांह में भी हो सकता हैं। घबराहट , सांस लेने में परेशानी व दिल में झटके भी महसूस हो सकते हैं। कुछ व्यक्तियों (विशेष कर मधुमेह के रोगियों ) में दर्द की शिकायत बिलकुल भी नहीं होती। दिल के दर्द व अन्य दर्दों में एक ख़ास अंतर यह हैं कि दिल का दर्द कभी भी एक ख़ास स्थान पर सीमित नहीं रहता हैं। यदि कोई व्यक्ति उंगली के दर्द को एक निश्चित स्थान पर दर्शाए तो यह दर्द प्रायः दिल का दर्द नहीं होता हैं। दूसरा अंतर यह हैं कि अन्य दर्द बीच बीच में कम ज्यादा हो सकते हैं या थोड़ी देर के लिए बिलकुल ख़त्म हो सकते हैं। लेकिन दिल का दर्द लगभग आधा घंटे तक लगातार बना रहता हैं। ह्रदय रोगियों को थकावट लाने वाले मेहनत के कार्य तथा तनाव से ख़ास तौर पर बचना चाहिए। थकावट वाले कार्य जैसे अधिक खाना , खाने के बाद नाचना , पहाडी पर चढ़ाई करना , बस या कार को धक्का लगाना , अच्छे सेक्स प्रदर्शन (ख़ास कर अनजाने स्थान पर अनजाने साथी के साथ ) के प्रयास में आयु व शारीरिक क्षमता से अधिक मेहनत करना दिल के दौरे में अहम् भूमिका निभाते हैं। तम्बाकू , मदिरा व अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्तियों में दौरा पड़ने के बाद मृत्यु की संभावना अधिक रहती हैं।

ये भी पढ़ें: धर्म हैं परम धन

सावधानी व बचाव

उच्च रक्तचाप , मधुमेह , तनावयुक्त जीवन , शारीरिक श्रम का अभाव , तम्बाकू व मदिरा का सेवन , रक्त में कोलेस्ट्रोल का बढ़ा हुआ स्तर , अधिक वसायुक्त भोजन का प्रयोग दिल के दौरे का मुख्य कारण हैं। 35 – 40 वर्ष के पश्चात ह्रदय की नियमित जांच आवश्यक हैं , विशेष कर उपरोक्त में से किसी भी एक कारण की विद्यमानता के मामले में तो लापरवाही करना ही नहीं चाहिए। खाना खाने के तुरंत बाद शारीरिक श्रम नहीं करना चाहिए। ह्रदय रोगियों को सात्विक भोजन के साथ – साथ सात्विक आचार – विचार में प्रवृत्त होना चाहिए। उपरोक्त में से किसी भी एक कारण की उपस्थिति मौत को निमंत्रण दे सकती हैं , अतः इसके निवारण हेतु योग व ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।

ये भी पढ़ें: कुशिक्षकः सबसे बड़ा शत्रु

घरेलू चिकित्सा

 

दौरे के समय

  • अर्जुन की छाल का चूर्ण आधा चमच्च की मात्रा में जीभ के नीचे रखकर चूसें व रोगी को अपानवायु मुद्रा में लिटाएं या बैठाएं। अपानवायु की मुद्रा में तर्जनी को अंगूठे के मूल में लगाते हैं तथा कनिष्ठ को सीधी रखते हैं। मध्यमिका व अनामिका के अगले सिरे अंगूठे के अगले सिरे से मिलाकर दबाव लगाते हैं।
  • रोगी को तुरंत अस्पताल पहुंचाएं।

  दौरे के बाद

  • अर्जुन की छाल को चूर्ण या काढ़े के रूप में नियमित रूप से प्रयोग करें। छाल का चूर्ण 10 ग्राम सुबह – शाम दूध के साथ प्रयोग कर सकते हैं। काढ़ा बनाने के लिए दो चमच्च चूर्ण को पाँव भर पानी में उबालें व आधा रह जाने पर उतार लें। यह काढा सुबह – शाम लें। काढ़े में इलायची व थोड़ा सा दूध भी डाल सकते है।
  • लहसुन की दो कलियाँ सुबह खाली पेट लें।

ये भी पढ़ें: सत्य परम बल हैं – Truth is the ultimate force

मूर्च्छा

सदमा , दम घुटना , विषपान , विषाक्तता अथवा सिर व मस्तिष्क पर चोट आदि कारणों से व्यक्ति मूर्च्छित हो सकता हैं। अन्य कारणों में मिर्गी , हिस्टीरिया , मधुमेह , दिल का दौरा आदि शामिल हैं। अत्यंत गर्मी के प्रभाव से भी मूर्च्छा हो सकती हैं।

लक्षण

अपूर्ण व पूर्ण मूर्च्छा में अलग – अलग लक्षण मिलते हैं। अपूर्ण मूर्च्छा में रोगी किसी की बात का जवाब नहीं देता , रोगी की आँख छूने पर अवरोध करता हैं , रोगी की पुतलियाँ प्रकाश डालने पर सिकुड़ जाती हैं तथा रोगी की आँखें छूने पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता हैं। इसके विपरीत पूर्ण मूर्च्छा में रोगी किसी भी बात का जवाब नहीं देता , उसे जगाया नहीं जा सकता , आँखें छूने पर रोगी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता तथा प्रकाश डालने पर आँखों की पुतलियाँ स्थिर रहती हैं।

ये भी पढ़ें: योग्यता – ज्ञान से भरपूर हिंदी कहानी

  • रोगी को खुली हवा में सांस लेने दें। यदि भीड़ जमा हो , तो हटा दें , छाती व कमर के वस्त्रों को ढीला कर दें। सांस रूकने या मंद पद जाने की स्थिति में कृत्रिम सांस दें।
  • रोगी को मुंह से कुछ न दें।
  • जिस कारण से मूर्च्छा हुई हैं , उसका उपचार करें।

नोट: बताये हुए बिधि को यूज़ करते रहे आपको फायदा अवश्य मिलेगा, और फिर भी मन में कोई संकोच है, तो एक बार डॉक्टर की परामर्श अवश्य लें. हमारे लेटेस्ट जानकारी के पोस्ट को इसी तरह पढ़ते रहे और फायदा प्राप्त करते रहें।

ये भी पढ़ें:

सत्संग बड़ा या तप – Satsang is big or tenacity?

सबकी आत्मा समान है – Everyone has the same spirit

भगवान महावीर के अनमोल बातें

मूर्खों के अलग ही संसार – Different worlds of fools

झूठा वैराग्य – ज्ञान से भरपूर हिंदी कहानी

मन को वश में करो – भगवान् महावीर

About admin

आपने कीमती समय देकर ब्लॉग पढ़ा धन्यबाद, ये पोस्ट आपको पसंद आया हो तो शेयर करना न भूले, ताकि इसे ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें, अपना विचार जरूर लिखे, इससे हमें और ज्यादा अच्छी और लेटेस्ट जानकारियाँ लिखने के लिए प्रेरित करेगा.

One comment

  1. http://www.freeprachar.com के द्वारा पूरी दुनिया में अपने बिज़नेस का प्रचार करें TOTALLY FREE

Leave a Reply