लालची सेठ

विजयनगर गाँव में एक सुन्दरम ना का ब्राह्मण रहता था। उसने कठोर परिश्रम से एक हजार स्वर्ण मुद्राएं इकट्ठा कर ली थी। जब वह बुढापे की और अग्रसर हुआ तो उसके मन में तीर्थयात्रा करने की इच्छा हुई। उसने सोचा कि ये एक हजार स्वर्ण मुद्राएं धरोहर के रूप में अपने पड़ोसी सेठ के यहाँ रख आउं जिससे कि मेरा ये धन सुरक्षित रहे| वापस लौटकर जीवन के शेष दिन आराम से बीत सकेंगे। रास्ते में कहीं चोर – डाकू पीछे लग गए तो पूरे जीवन भर की कमाई एक पल में ही लुट जाएगी।

     यह सोचकर वह सेठजी के पास गया और बोला, सेठजी मैं चार धाम की यात्रा पर जा रहा हूँ। मेरे जीवन भर की कमाई हुई पूंजी इस थैली में हैं। आप यह धरोहर अपने पास रख लीजिये। इस तीर्थयात्रा से लौटकर मैं इसे वापस ले लूंगा।

       तुम बिलकुल निश्चिन्त होकर चार धाम की यात्रा पर जाओ, सुन्दरम ! तुम्हारा धन मेरे पास पूर्ण रूप से सुरक्षित रहेगा। वापस आने पर तुम्हारी अमानत ज्यों की त्यों मिल जाएगी। सेठजी ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा।

         सुन्दरम ने सेठ जी को धन्यवाद दिया और थैली उन्हें सौंपकर अपनी यात्रा को चल दिया।

        वह सेठ इतना भला आदमी नहीं था, जितना वह बाहर से दिखाई देता था। सुन्दरम के जाने के बाद उसने उसकी सिली हुई थैली को खोलकर देखा, उसमें एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ थी। उसका घर में आया माल वापस चला जाए यह उस सेठ ने नहीं सीखा था।

           उसने सुन्दरम की स्वर्ण मुद्राएँ हजम कर जाने का निश्चय कर लिया। उस थैली को खोलने से जो छेड़ उसमें हो गया था, उसका भी उसने हल ढूंढ लिया।

          एक वर्ष के पश्चात सुन्दरम जब तीर्थ करके वापस लौटा तो सीधा वह सेठजी के पास पहुंचा। सेठजी ने उसकी बड़ी आव – भगत की और उनकी थैली ज्यों की त्यों वापस लौटा दी। सुन्दरम खुशी – खुशी अपने घर आया। जब उसने थैली खोली तो हैरान रह गया। उस थैली में स्वर्ण मुद्राओं के स्थान पर उसमें लोहे के कुछ सिक्के भरे हुए थे।

     वह उलटे पैर सेठजी के पास पहुंचा और बोला, सेठजी ! इस थैली में तो एक हजार स्वर्ण मुद्राएं थी, लेकिन अब इसमें लोहे के सिक्के भरे हैं। मैंने तो आप पर विश्वास कर आपको यह धरोहर सौंपी थी। मुझ गरीब के साथ आपको ऐसा अन्याय नहीं करना चाहिए था।

        क्या बकते हो सुन्दरम ? तुम मुझ पर सरासर चोरी का इल्जाम लगा रहे हो। मैंने तो तुम्हारी थैली ज्यों की त्यों वापस कर दी थी। मैं क्या जानूं उसमें स्वर्ण मुद्राएं थी या कुछ और ? मैंने तो उस समय तुम्हारी थैली को खोलकर भी नहीं देखा था।

       लेकिन सेठजी ………..|

    लेकिन – वेकिन कुछ नहीं सुन्दरम, खुशी – खुशी वापस चले जाओ यहाँ से वरना धक्के मारकर बाहर निकलवा दूंगा। मुझे चोर बताता हैं। एक तो तुम्हारी धरोहर को इतने दिन सुरक्षित रखा। अब झूठ बोलकर स्वर्ण मुद्राएं ठगने चला आया हैं।

     सुन्दरम क्या करता अपना सा मुंह लेकर वापस लौट आया। वह सोचने लगा, कि अपनी जीवन भर की कमाई अब सेठ के मुंह से निकालने के लिए उसे क्या करना चाहिए।

      काफी सोच – विचार करने के बाद उसने राजा कृष्णदेव के दरबार में जाकर फ़रियाद करने का निर्णय ले लिया।

    राजा कृष्णदेव ने जब उसकी दुःख भरी कहानी सुनी तो समझ गए कि इस काम के लिए तेनालीराम ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं वही इस समस्या का कोई समाधान सुझा सकेगा।

     उन्होंने तेनालीराम को बुलवाया और कहा, मुझे लगता हैं, सुन्दरम सच कह रहा हैं और उस लालची सेठ ने अवश्य ही इसके साथ घोर अन्याय किया हैं। उसे दोषी साबित करने के लिए सबूत की जरुरत पड़ेगी।

      आप चिंता मत कीजिये, महाराज ! यह समस्या तो चुटकी में हल हो जाएगी। तेनाली ने राजा कृष्णदेव को आश्वस्त करते हुए कहा।

     फिर तेनालीराम ने सुन्दरम की उस थैली को बड़े गौर से निरीक्षण किया और उसकी समझ में सारी बात आ गयी।

          फिर तेनाली ने नगर के सभी दर्जियों को अपने पास बुलवाया और कहा, हम इससे मिलती – जुलती एक थैली सिलवाना चाहते हैं। जिसकी थैली इस थैली से बिलकुल मेल खा जाएगी, उसे सौ स्वर्ण मुद्राएं इनाम में दी जाएगी।

     कुछ हे देर में सारे दर्जियों ने अपनी सिली हुई थैलियाँ तेनालीराम के सामने पहुंचवा दी।

        तेनालीराम ने उन्हें बड़े ध्यान से देखा। ऊपर से देखने पर सभी थैलियाँ उस थैली जैसी ही लगती थी, पर बारीकी से देखने पर महसूस होता था कि लगभग सभी थैलियों में कुछ न कुछ दोष रह गयी हैं। लेकिन उसमें एक थैली ऐसी भी थी जो बिलकुल दिखाई गयी थैली के अनुरूप ही थी। कहीं भी कोई अंतर नहीं था। यहाँ तक कि जब तेनालीराम ने सुन्दरम के समक्ष दोनों थैलियाँ रखी तो वह यह न पहचान कर सका कि उसमें से उसकी थैली कौन सी हैं।

          वास्तविकता यह हैं सुन्दरम। तेनालीराम ने मुस्कुराकर कहा, इनमें से कोई भी थैली तुम्हारी नहीं हैं।

       जी……. ? सुन्दरम उसकी बात पर हैरान रह गया था।

    तुम्हें अभी पता चल जाएगा। तेनालीराम ने उसकी जिज्ञासा मिटाते हुए कहा। उसने उस थैली को सिलने वाले दरजी से पूछा, यह जो दूसरी थैली मेरे हाथ में हैं, यह भी क्या तुमने सिली हैं ?

     वह दरजी देखते ही झट से बोला, जी हाँ, यह थैली भी मेरे हाथों की सिली हैं।

      तुमसे कब और किसने सिलवाई थी यह थैली ? तेनालीराम ने उससे जानना चाहा।

    कुछ देर सोचने के उपरान्त उस दर्जी ने बोला, कोई तीन महीने पहले एक सेठजी ने यह थैली मुझे दी थी और कहा कि बिलकुल ऐसी एक थैली बना दो। तभी यह थैली मैंने उन्हें सिलकर दी थी।

     तेनालीराम ने उसी समय सेठजी को बुलवा लिया और उससे सुन्दरम की एक हजार स्वर्ण मुद्राओं के बारे में पूछा।

      पहले तो वह सेठ साफ़ इंकार करता रहा, पर जब उस दर्जी को उसके सामने लाया गया तो उसकी बोलती बंद हो गयी। फिर उस सेठ ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

    तब तेनालीराम ने कहा, इस गरीब की जो एक हजार स्वर्ण मुद्राएं हड़प कर गए थे, वे तुम्हें लौटानी होगी और साथ ही उसे धोखा देने और झूठ बोलने की सजा के रूप में सुन्दरम को चार सौ स्वर्ण मुद्राएं और इस दर्जी को इनाम के रूप  में सौ स्वर्ण मुद्राएं भी तुम्हें देनी होगी।

        इस तरह उस फरेबी सेठ को एक हजार स्वर्ण मुद्राओं के लालच में एक हजार पांच सौ स्वर्ण मुद्राओं से हाथ धोना पड़ गया और बेइज्जती अलग से सहन करनी पड़ी।

      तेनालीराम की बुद्धिमानी से राजा कृष्णदेव एक बार फिर प्रसन्न हो गए।

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