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लोभ पाप का बाप है – Greed is the father of sin

महाश्रमण महावीर ने लोभ को सबसे निकृष्ट बताते हुए उत्तराध्ययन सूत्र में फरमाया हैं :-

लोभ समस्त सद्गुणों को नष्ट करने वाला हैं। लोभ मनुष्य से उसका धर्म , कर्म और मर्यादा छीन लेता हैं। लोभ के जाल – जंजाल में उलझा व्यक्ति पतन की चरम सीमाओं तक पहुँच जाता हैं।

 

एक बड़ा विद्वान पंडित था। उसने अपने पाण्डित्य से बड़े – बड़े विद्वानों को पराजित कर दिया था। एक दिन राज्यसभा में उससे प्रश्न किया गया कि हे पण्डितराज ! पाप का बाप कौन हैं ? इस प्रश्न को सुनकर वह विद्वान ब्राह्मण विचार में पड़ गया। उसने सभासदों से कहा – इस प्रश्न का उत्तर मैं आज नहीं दे पाउँगा। मुझे सोचने के लिए समय दिया जाय। पंडित को कुछ दिन का समय मिल गया।

 

वह ब्राह्मण इस प्रश्न के समाधान के लिए इधर – उधर भटकने लगा। भूखा – प्यासा वह भटकता था , लेकिन उसे सूझ नहीं रहा था की पाप का बाप कौन हैं।

 

एक दिन वह घुमते हुए – भटकते हुए बहुत थक गया। वह एक घर के सामने खड़े वृक्ष के नीचे लेट गया। अब भी उसके दिमाग में वही प्रश्न कौंध रहा था।

 

वह घर एक वेश्या का था। वेश्या ने खिड़की से झांककर देखा तो उसे पंडित की दशा पर करुणा आ गयी। वह उसके पास गयी और बोली – पंडित जी ! आप बहुत थके हुए लग रहे हैं। आपकी इस दुर्दशा का क्या कारण हैं ?

 

उस पंडित ने अपनी दुर्दशा की कहानी बता दी। वेश्या को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस पंडित को पाप के बाप का भी ज्ञान नहीं हैं। वह बोली – यह तो मैं बता सकती हूँ , लेकिन मैं वेश्या हूँ और आपको मेरे घर के भीतर आना होगा।

 

वेश्या शब्द सुनते ही वह ब्राह्मण थू – थू करता हुआ भागने का प्रयास करने लगा। लेकिन वेश्या बड़ी होशियार थी। उसने दो स्वर्ण – मुद्राएं ब्राह्मण के चरणों में रखते हुए कहा – विप्रदेव ! घबराइये नहीं , आपके चरणों से मेरा घर भी पवित्र हो जाएगा।

 

स्वर्ण – मुद्राओं की चमक ने अपना प्रभाव दिखाया। ब्राह्मण ने विचार किया – घर में कदम रखने से तो मैं भ्रष्ट नहीं हो जाउंगा। फिर मुझे मेरे प्रश्न का समाधान भी मिल जाएगा। वह वेश्या के साथ उसके घर के अन्दर आ गया और बोला – वेश्या ! जल्दी बताओ मेरे सवाल का समाधान। मैं अधिक देर यहाँ नहीं ठहर सकता हूँ।

 

वेश्या बोली – ब्राह्मण देव ! आप बहुत थके हुए हैं। थोड़ा विश्राम कीजिये , जलपान कीजिये। वह ब्राह्मण बोला – छिः छिः , वेश्या के घर का जलपान। इससे अच्छा तो होगा मुझे अपने प्रश्न का हल ही न मिले। वह उठकर चलने को तैयार हुआ तो वेश्या ने कुछ और खनकती मोहरें उसके क़दमों में रखते हुए कहा – विप्रदेव ! नाराज मत होइए। आप मेरे हाथ का जल पी लेंगे तो मेरा जल और मेरे हाथ दोनों ही शुद्ध – पवित्र हो जाएंगे।

 

स्वर्ण – मुद्राएं पुनः अपना प्रभाव दिखा गयी। ब्राह्मण ने पानी भी पी लिया। इसी तरह कुछ और स्वर्ण – मुद्राओं के लालच में उसके हाथ का भोजन भी कर लिया।

 

भोजन करके वह बोला – वेश्या ! तुम बहुत अच्छी हो। मेरी सेवा भी कर रही हो , मुझे धन भी दे रही हो और मेरे प्रश्न का उत्तर भी देने वाली हो। अब मुझे शीघ्र जाना हैं। तुम मेरे प्रश्न का समाधान बता दो।

 

वेश्या ने स्वर्णमुद्राओं से भरी हुई एक थैली निकाली और ब्राह्मण की ओर बढ़ा दी। ब्राह्मण इतना धन देखकर चौंधिया गया। वेश्या ने उसकी इस स्थिति का फायदा उठाते हुए अपने मुंह से पान निकालकर उसके मुंह की ओर बढ़ा दिया। ब्राह्मण ने पान खाने के लिए मुंह खोला। वेश्या ने पान उसके मुंह में रखते हुए गाल पर एक तमाचा मारा और बोली – मिल गया तुम्हें तुम्हारा समाधान ?

 

ब्राह्मण वेश्या के इस बदले तेवर की कहानी समझ नहीं पाया। वह बोला – वेश्या ! तुमने मुझे क्यों मारा ? वेश्या बोली – मैंने तुम्हारे सवाल का उत्तर दिया हैं। जो ब्राह्मण वेश्या के घर के छाया से भी दूर भाग रहा था , लोभ ने उसे उसका जूठा पान खाने पर विवश कर दिया। ब्राह्मण ! लोभ ही पाप का बाप हैं।

 

ब्राह्मण की आँखें खुल गयी। उसे अपने पतन पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उसने घोर पश्चाताप पूर्वक वेश्या से क्षमा मांगी और दुसरे दिन सभा में घोषणा कर दी – लोभ पाप का बाप है।

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