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सबकी आत्मा समान है – Everyone has the same spirit

प्राणीमात्र में एक ही आत्मा का निवास है। एक ही आत्मा से अर्थ हैं – समान ज्ञान रूप , दर्शन रूप व समान अनुभूति रूप हैं प्रत्येक आत्मा। सुख की चाह , दुःख की अचाह प्रत्येक आत्मा में निहित हैं। जो स्वयं की आत्मा के समान प्रत्येक की आत्मा को देखता हैं , उसका ह्रदय इतना विराट हो जाता हैं की उसमें स्व – पर का विभेद मिट जाता हैं और जो स्वर उभरता हैं वह हैं – तत्त्वमेव त्वमेव तत।

 

एक बार वैसाखी के पर्व पर आनंदपुर में काफी दूर – दूर से सिख लोग गुरु गोविन्द सिंह जी के उपदेश सुनने के लिए एकत्रित हुए थे। चारों ओर अपूर्व उत्साह था। तभी अचानक गुरु गोविन्द सिंह जी को सूचना मिली की मुगलों की एक बड़ी सेना उन पर हमला करने के लिए उनकी ओर बढ़ी आ रही है।

 

गुरु गोविन्द सिंह जी के निर्देश पर गुरु के सिख केसरिया बाना पहनकर युद्ध में कूद पड़े। संख्या में अल्प , किन्तु अत्यंत उत्साही सिखों ने गुरु के आदेश को अंजाम दिया। विशाल मुग़ल सेना तितर – बितर हो गयी। हजारों के शव धरती पर गिरे , हजारों घायल हुए और शेष पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए थे।

 

गुरु के कुछ सिख भी इस युद्ध में काम आ गए। कुछ घायल अवस्था में मैदान में पड़े थे। शेष सिख उनकी सेवा में जुट गए थे।

 

दुसरे दिन कुछ शिष्यों ने गुरु गोविन्द सिंह जी को शिकायत की कि कन्हैया नाम का एक सिख घायल मुग़ल सैनिकों को भी पानी पिला रहा हैं।

 

गुरु गोविन्द सिंह जी ने कन्हैया को अपने पास बुलाया और पूछा – क्या तुमने मुग़ल सैनिकों को भी पानी पिलाया ? कन्हैया ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया – जी हाँ , गुरु जी ! मुझे वहाँ न मुग़ल दिखाई दे रहे थे और न ही सिख। जहां भी मुझे प्यास दिखाई दे रही थी , मैं उसे बुझा रहा था।

 

मैं प्यास बुझा रहा था , मुग़ल और सिख का भेद करना उस स्थान पर असंभव हो रहा था। कन्हैया की बात सुनकर गुरु गोविन्द सिंह जी ने अपने शिष्य को गले लगाते हुए कहा – कन्हैया ! वस्तुतः तुम गुरु के सच्चे सिख हो।

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