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परम उदारताः महाकवि माघ का दान – ज्ञानवर्धक कहानी

एक प्राचीन सूक्त है –

थोड़े में से जो भी प्रशस्त भावना – पूर्वक दिया जाता हैं , वह हजारों लाखों के दान की बराबरी करता हैं।

दान करुणा का प्रतिफल हैं। करुणा – पूर्ण ह्रदय बाँट देने में ही अपने सुख और सहज सम्पन्नता के दर्शन  करता हैं।

 

महाकवि माघ महान कवि यो थे ही , वे बहुत बड़े दानी भी थे। उनका ह्रदय उदारता , कोमलता और करुणा का आकर था। उनके पास अपार संपत्ति थी , लेकिन वह संपत्ति दीन – दरिद्र और अभावग्रस्त लोगों में बाँट दी थी।

 

एक बार उनके पास एक अतिनिर्धन व्यक्ति आया और बोला –  कविराज ! मेरी बेटी की शादी हैं , लेकिन घर में अन्न का एक दाना भी नहीं हैं। अपनी करुणा का मेघ मुझ पर बरसाइये।

 

माघ उस व्यक्ति को अपने घर ले आये। घर में देखा तो वहाँ कुछ नहीं था। वे उदास हो गए। तभी उनकी दृष्टि अपनी पत्नी के हाथों में पहने कंगनों पर पड़ी। उनकी आँखों में हर्ष की चमक उतर आई। वे अपनी पत्नी को एकांत में ले गए और लडखडाते शब्दों से बोले – देवी ! कुछ माँगना चाहता हूँ। निराश तो नहीं करोगी।

 

माघ की पत्नी बोली – स्वामी ! ऐसा क्यों कहते हो ! कोई वस्तु मेरे पास हैं क्या जो आपको मांगनी पड़ेगी ? मेरा तन – मन सर्वस्व ही तो आपका हैं। कहो , क्या अर्पित करूँ ?

 

माघ ने अपनी पत्नी के कंगनों पर हाथ रख दिया। उस वीर – पत्नी ने बिना एक पल लगाए , कंगन उतार कर पति को थमा दिए। पति ने कहा – धन्य हो तुम देवी ! हमारे द्वार पर आज एक ऐसा निर्धन व्यक्ति आया है जिसकी पुत्री की शादी होने वाली है। लेकिन वह इतना अभावग्रस्त हैं कि उसके पास अन्न का दाना तक नहीं हैं। तुम्हारा यह दान सर्वश्रेष्ठ हैं देवी।

 

पति – पत्नी का यह संवाद माघ की माता भी एक कोने में खड़ी होकर सुन रही थी। उसे अपने पुत्रवधू की इस महानता पर गर्व हो रहा था। माघ जैसे ही पत्नी के कंगन लेकर लौटने लगे तो उसकी माता उनके सामने खड़ी थी। उसके हाथ में भी दो कंगन थे। उस वीर – माता ने माघ से कहा – पुत्र ! कंगन तो फिर बन जाएंगे लेकिन उस निर्धन व्यक्ति की पुत्री के विवाह में निर्धनता काँटा नहीं बननी चाहिए।

 

वह दरिद्र व्यक्ति इस परिवार की इस महानता को देखकर गदगद हो उठा। उसने रोते हुए दान ग्रहण किया और अपने घर की ओर चल दिया इसी सन्दर्भ में कहा गया हैं –

देता भावे भावना , लेता करे संकोच। वीर कहें सुन गोयमा , दोनों जासि मोक्ष।।

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