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लोभपूर्ति के लिए दान – ज्ञानवर्धक कहानी

अथर्ववेद का एक अमूल्य वचन हैं –  सैंकड़ों हाथों से इकट्ठा करो और हजार हाथों से बाँट दो।

दान करुणा से निष्पन्न होता हैं। जो दान यश – प्रतिष्ठा या लोभ की भावना से दिया जाता हैं , वह दान नहीं होता हैं। यह तो वासनाओं का विस्तार ही होता हैं। करुणा से भींग कर दिया गया दान  सम्यक दान  कहलाता है और यश या लोभ के वसीभूत होकर दिया गया

 

दान  असम्यक दान  कहलाता हैं। वह अपनी गरिमा को खोकर विशिष्ट फलरहित हो जाता हैं। एक नगर में एक धनि सेठ रहता था। वह बहुत कंजूस था। उसकी तिजोतियाँ धन से भरी थी लेकिन उसका ह्रदय अभी रिक्त था। वह और भी धन चाहता था। उसके द्वार पर कोई याचक आता , तो वह उसे दुत्कार देता था।

एक दिन एक साधू उस सेठ के द्वार पर आया। उस सेठ ने उसकी झोली में एक पैसा डाल दिया। सांझ हुई। सेठ ने देखा , उसकी तिजोरी में एक स्वर्ण – मुद्रा बढ़ गयी थी। सेठ को बहुत प्रसन्नता हुई। साथ ही वह खेद्खिन्न भी हो उठा कि मैंने एक ही पैसा क्यों दिया।

 

बहुत सारे पैसे उस साधु को देता तो मुझे बहुत सारी स्वर्ण – मुद्राएं प्राप्त होती। दुसरे दिन वह साधु फिर आया। सेठ का हर्ष सहस्त्रगुणित हो गया। आज वह बहुत लाभ कमाना चाहता था। उसने एक स्वर्ण – मुद्रा उस साधु की झोली में डाल दी।

 

सेठ को विश्वास था की उसे आज बहुत सारी स्वर्ण – मुद्राएं प्राप्त होंगी। सांझ हुई और रात भी हो गयी। लेकिन अभी तक सेठ की तिजोरी में बहुत सारी स्वर्ण – मुद्राएं अवतरित नहीं हुई थी। रात्रि भी व्यतीत होने को थी। सेठ पश्चाताप करने लगा कि एक स्वर्ण – मुद्रा यों ही गंवाई। तभी आकाशवाणी हुई – सेठ ! त्याग फलता हैं , लोभ नहीं।

 

सहज भाव से किया गया त्याग या करुणा भाव से दिया गया दान ही महान फल देने वाला होता हैं। लोभवश किया गया सत्कर्म भी सुफल नहीं होता हैं। लेकिन कषाय और आसक्ति के रंग में रंगा हुआ मानव – मन कल्याणकारी सत्कर्मों से भी भौतिक और सांसारिक तृष्णाओं की ही पूर्ती करना चाहता हैं।

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