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छल विश्वास का परम शत्रु हैं

माया रुपी कषाय के सम्बन्ध में भगवान् की राय है –

माया मित्रों का नाश करने वाली होती हैं। माया का अर्थ हैं – छल। कपट व्यवहार। छल – कपट करने वाले व्यक्ति का कोई अपना नहीं होता हैं। मैत्री का आधार विश्वास होता हैं। छल विश्वास का परम शत्रु हैं। छली व्यक्ति मित्र – विहीन हो जाता हैं।

एक छली सियार ने एक सर्चलित ऊँट से दोस्ती की। एक दिन वह ऊँट को चने के खेत में ले गया और जल्दी ही पेट भर कर बोला – ऊँट मामा ! मुझे पेट भरने के बाद भोंकन बाई उठती हैं।

ऊँट बोला – तुम भोंकोगे तो शोर सुनकर खेत का मालिक जग जाएगा और हमें मारेगा। सियार तो चाहता यही था। वह ऊँट के मना करने पड़ भी भोंकने लगा। खेत का मालिक जाग गया और ऊँट की खूब पिटाई की।

ऊँट बड़ा दुखी हुआ। वह सियार की कपट मैत्री का सत्य समझ चुका था। उसने उससे बदला लेने की ठानी। एक दिन ऊँट सियार को बहलाते हुए एक हरे – भरे खेत का सपना दिखाकर अपने साथ ले चला।

मार्ग में एक बड़ी नदी थी। सियार  बोला – मामा ! मैं इस नदी को कैसे पार कर पाऊंगा। ऊँट बोला – तुम मेरी पीठ पर चढ़ जाओ। सियार ऊँट की पीठ पर चढ़ गया।

नदी के मध्य पहुँच कर ऊँट बोला – भांजे सियार ! मुझे जल के मध्य लेटने की इच्छा होती हैं। सियार कांपा और गिडगिडाया कि मैं पानी में डूब जाऊँगा, लेकिन ऊँट तो उसकी छल मैत्री का उसे सबक सिखाना चाहता था। वह नदी में लेट गया और सियार पानी में बह गया।

सत्य कहा है, जहां कपट होती है वहाँ मैत्री नष्ट हो जाती हैं।

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