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डेबिट वैलेस ने संघर्ष से जीवन को सफल बनाया

12 नवम्बर 1889 को सेंट पॉल, मिनेसोटा में जन्मे डेविट बैलेस के मन में एक ऐसी पत्रिका शुरू करने का विचार आया, जिससे दूसरी पत्रिकाओं में छपे बड़ी लेखों को संक्षिप्त करके छापा जाए। इस नए विचार पर अमल करके उन्होंने रीडर्स डाइजेस्ट नामक अंतर्राष्ट्रीय मैगज़ीन शुरू की और दौलत तथा शोहरत दोनों हासिल की।

 

रीडर्स डाइजेस्ट 21 भाषाओं में छपती हैं और इसकी 3 करोड़ प्रतियां 170 से ज्यादा देशों में बिकती हैं। भारतीय संस्करण 1954 में पहली बार प्रकाशित हुआ और 2009 में रीडर्स डाइजेस्ट की पाठक संख्या 39.4 लाख थी। तब यह कल्पना कौन कर सकता था, जब 1300 डॉलर से यह कंपनी  शुरू हुई थी ?

 

डेविट बैलेस के जीवन में उल्लेखनीय मोड़ तब आया, जब 1918 में वे सेना के अस्पताल में भर्ती हुए। प्रथम विश्व युद्ध में घायल हो जाने के कारण उन्हें चार महीने तक अस्पताल में रहना पडा। बिस्तर पर लेटे – लेटे उनका वक़्त नहीं कटता था और समय काटने के लिए वे पत्रिकाएँ पढने लगे। उसे अधिकाँश लेख जरूरत से ज्यादा लम्बे लगे।

 

अचानक उनके दिमाग में यह विचार आया कि क्यों न इन लेखों को संक्षिप्त कर दिया जाय। उन्होंने सोचा कि अगर लेखों से अनावश्यक बातें हटा दी जाएं तो वे ज्यादा दिलचस्प और पठनीय बन सकते हैं। अस्पताल से घर लौटने के बाद वैलेस ने अपने इस विचार पर अमल करते हुए संक्षिप्त लेखों का संकलन तैयार किया, उसे रीडर्स डाइजेस्ट नाम दिया और इसका सैंपल देश भर के प्राकशकों के पास भिजवाया।

आज हम इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि कोई इस तरह के प्रस्ताव को ठुकरा सकता हैं, लेकिन उस वक़्त किसी भी प्रकाशक को सफलता की संभावना नज़र नहीं आ रही थी। कोई भी इसे छपने को तैयार नहीं था। सबका कहना था कि इस तरह की पत्रिका सफल नहीं हो सकती, लेकिन वैलेस को अपने विचारों पर भरोसा था।

 

प्रकाशकों की हतोत्साहित करने वाली बातों से वे निराश तो हुए, मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने खुद यह पत्रिका प्रकाशित करने का फैसला किया। इस तरह से देखा जाय, तो यह डेविट बैलेस के लिए अच्छा ही रहा की प्रकाशकों ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया, क्योंकी अगर कोई दुसरा प्रकाशक यह पत्रिका छपता, तो वैलेस को इतना धन और इतनी लोकप्रियता कभी नहीं मिलती।

इसी बीच लीला नामक युवती से वैलेस का विवाह हो गया, लेकिन वे रीडर्स डाइजेस्ट को नहीं भूले। हनीमून परे जाने से पहले उन्होंने संभावित ग्राहकों को सदस्यता शुल्क के आग्रह की चिट्ठियाँ भिजवाई।

 

जब नवविवाहित दंपत्ति वापस लौटे, तो उन्होंने पाया कि ग्राहकों ने 5000 डॉलर सदस्यता शुल्क भेज दिया। 5000 प्रतियों का पहला अंक छापने के लिए 6300 डॉलर की जरूरत थी, इसलिए वैलेस को 1300 डॉलर उधार लेने पड़े, तब कहीं जाकर वे फरवरी 1922 में रीडर्स डाइजेस्ट का पहला अंक प्रकाशित कर पाए।

 

बहरहाल, उन्हें सफलता आसानी से नहीं मिली। उन्हें हर कदम पर संघर्ष करना पडा और काफी समय तक करना पडा। वे पत्रिका को सफल बनाने के लिए दिन – रात मेहनत करते थे। न सिर्फ वैलेस, बल्कि लीला भी समर्पित थी।

 

उनकी आर्थिक हालत इतनी तंग थी कि उनके पास पत्रिकाएँ खरीदने के पैसे नहीं थे। इसलिए वैलेस हर सुबह में लाइब्रेरी जाते थे और वहाँ पत्रिकाओं में छपे लेख पढ़कर यह फैसला करते थे कि रीडर्स डाइजेस्ट के लिए कौन से लेख अच्छे रहेंगे। जब उन्हें कोई लेख पसंद आ जाता था, तो वे उसे शब्दशः पूरा उतार लेते थे।

 

वे यह काम तब तक करते रहते थे, जब तक कि उनकी आँखें तथा हाथ थक नहीं जाते थे। चूंकि वैलेस के पास किसी दुसरे काम के लिए समय ही नहीं था, इसलिए घर का खर्च चलाने की जिम्मेदारी उनकी पत्नी लीला पर आ गयी और वे नौकरी करने लगी। ऑफिस में आठ घंटे तक काम करने के बाद जब वे शाम को थकी – मांदी घर लौटती थी, तो घर का सारा काम निबटाकर रात को रीडर्स डाइजेस्ट का सम्पादन भी करती थी।

पति – पत्नी की मेहनत रंग लाई और कुछ समय बाद ही पत्रिका की सदस्य संख्या बढ़ने लगी। पहले अंक के प्रकाशन के 4 वर्ष बाद इसके 50000 ग्राहक बन चुके थे और 7 वर्ष बाद 2,28,000, डेविट वैलेस ने एक नया काम कर दिखाया था और सफलता का परचम लहरा दिया था।

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