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सज्जनता की पराकाष्ठा

उपकारी पर सज्जनता रखना सज्जन पुरुष की सज्जनता की कसौटी नहीं हैं। अपकारी पर भी सज्जनता रखना , सद् भाव रखना यही श्रेष्ठ पुरुष का लक्षण है।

 

हित का हित से उत्तर देना बड़ी बात नहीं है। यह तो जीवन का सहज गुण है। जीवन का श्रेष्ठ गुण तो यह है की अहित का भी हित पूर्वक उत्तर दिया जाए।

 

पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह एक बार जंगल से कहीं जा रहे थे। अचानक एक पत्थर उनके सिर में आकर लगा। सैनिक पत्थर की दिशा में दौड़े। देखा – झाड़ियों के पीछे खडा एक बालक अब भी झाड़ियों पर पत्थर फेंकने के लिए निशाना साध रहा है । सैनिकों ने उस बालक को गिरफ्तार कर लिया। महाराजा रणजीत सिंह बोले – पत्थर मारने वाले को कल दरबार में हमारे सामने पेश किया जाए।

 

दुसरे दिन दरबार लगा। महाराजा रणजीत सिंह के सम्मुख एक अबोध बालक को लौह – श्रृंखलाओं में बाँध कर लाया गया। वह बालक रो रहा था। महाराजा ने उसे बंधनों से मुक्त करने का आदेश दिया बालक के बंधन खोल दिए गए। महाराजा रणजीत सिंह ने उस बालक को अपने निकट बुलाया और पूछा – बालक! तुमने हमें पत्थर क्यों मारा? बालक ने भय से कांपते हुए कहा – मैंने! आपको पत्थर नहीं मारा था।

 

महाराजा ने पूछा – तब किसे मारा था? मैं तो झाड़ियों से बेर तोड़ रहा था और पत्थर से बेर तोड़ते हुए एक पत्थर आपको लग गया।

महाराजा रणजीत सिंह कुछ दुःखी हो गए। वे सोचने लगे – धिक्कार हैं मुझ जैसे राजा पर। जिसके राज्य में एक नन्हें बालक को श्रम करके अपनी बीमार माता का पेट भरना पड़े। गलती इस बालक की नहीं, अपितु मेरी है। दंड का अधिकारी यह नहीं है मैं हूँ।

 

इस प्रकार राजा ने अपने अनुचरों को आदेश दिया कि एक हजार स्वर्ण – मुद्राएं और भोजन – सामग्री इस बालक के घर पहुंचा दी जाए। इसकी माता बीमार है। राजा के इस आदेश को सुनकर कुछ दरबारी परेशान हो उठे। वे बोले – महाराज ! आप अपराधी को दण्ड दे रहे है या पुरस्कृत कर रहे है? इस बालक ने आपको पत्थर मारकर अक्षम्य अपराध किया है, इसे कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए।

 

महाराजा रणजीत सिंह बोले – कैसा दण्ड? क्यों है यह दंड का अधिकारी? इसने पत्थर मुझे नहीं मारा था। झाड़ियों को मारा था और निशाना चूकने से मुझे लग गया।

 

और सुनो, जब मूक झाड़ियाँ भी पत्थर मारने वाले को मधुर बेर देती है, तो क्या मैं उनसे भी गया – बीता हूँ। मैं तो मनुष्य हूँ, मुझे तो उनसे कुछ अधिक ही देना चाहिए। सुनकर दरबारी मौन हो गए।

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