स्वच्छ वायु

गर्मी की ऋतु थी। राजदरबार में काफी उमस हो रही थी। सारे दरबारी पसीने से लथपथ हो रहे थे। जब गर्मी उनकी सहनशक्ति से बाहर हो गयी तो दरबारियों ने महाराज से कहा, महाराज ! सुबह – सुबह बाहर की हवा कितनी शीतल और सुगन्धित होती हैं, क्या ऐसी स्वच्छ वायु दरबार में नहीं लाई जा सकती ?

        अन्य दरबारी उनके इस प्रश्न पर चुप साध गए। तभी महाराज ने कहा, जो कोई भी स्वच्छ वायु को दरबार में लाएगा, उसे दो हजार स्वर्ण मुद्राएं इनाम में दी जाएंगी ?

     दरबार में उपस्थित सारे लोग सोच रहे थे कि महाराज भी कैसी बात कर रहे हैं। भला बाहर से स्वच्छ वायु को दरबार में कैसे लाया जा सकता हैं।

          दुसरे दिन जब दरबार फिर से लगा तो महाराज ने सारे दरबारियों के चेहरे उतरे हुए देखे। वह ठंडी सांस भरकर बोले, लगता हैं, हमारी इस इच्छा को कोई भी पूरी नहीं कर पाएगा।

      तभी दरबार में उन्हें तेनालीराम की आवाज सुनाई पड़ी, महाराज, आप बिलकुल चिंता न करें, मैं बाहर से स्वच्छ वायु को आपके लिए कैद करके ले आया हूँ। आज्ञा हो तो उस हवा को राजदरबार में छोड़ दूं।

        तेनालीराम की यह बात सुनकर सारे दरबारी सन्न रह गए।

   तभी राजा कृष्णदेव राय ने तेनालीराम को आज्ञा देते हुए कहा, कहाँ हैं वह हवा, उसे तुरंत अपनी कैद से दरबार में छोड़ो।

        तेनालीराम को जैसे ही आज्ञा मिली, उसने फ़ौरन बाहर खड़े पांच आदमियों को राजदरबार में बुलवाया। उनके हाथों में खसखस, चमेली और गुलाब के फूलों से बने दस बड़े पंख इत्र से सुगन्धित, जल से पूरी तरह भींगे हुए थे। तेनालीराम का इशारा पाते ही पाँचों नौकर उन पंखों को लेकर महाराज के दायें – बायें व आगे – पीछे खड़े हो गए  और हाथों से उन पंखों को जोर – जोर से झलने लगे।

      थोड़ी ही देर में महकती ठंडी हवा से पूरा राजदरबार महक उठा। दरबारियों के भी पसीने सूख गए।

      तब महराज मन ही मन तेनालीराम की बुद्धिमत्ता को सराहते हुए बोले, तेनालीराम, तुम तो वाकई एक अजूबे इंसान हो। हर चीज हमारी सेवा में हाजिर कर देते हो।

          फिर महाराज ने तेनालीराम को कुछ स्वर्ण मुद्राएं इनाम के रूप में दी और अपने महल में वापस लौट गए। तेनालीराम भी स्वर्ण मुद्राएं लेकर और पाँचों सेवकों का भुगतान कर खुशी – खुशी अपने घर लौट गया। 

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