Home / स्वास्थ / कुनख (नाखून में संक्रमण) सफेद दाग, मंडल रोग, कुष्ठ, एक्जिमा के कारण एबम घरेलू उपचार
charm rog
char rog ka desi upchar janen.

कुनख (नाखून में संक्रमण) सफेद दाग, मंडल रोग, कुष्ठ, एक्जिमा के कारण एबम घरेलू उपचार

कुनख (नाखून में संक्रमण)

कारण

यह फफूंदी के संक्रमण से होने वाला होने वाला रोग हैं , जिससे नाख़ून में विकृति आ जाती हैं। नाखून में संक्रमण फ़ैल जाने के बाद नाखून मोटा व कुछ सफ़ेद , भूरे रंग का हो जाता हैं। नाखून कुछ ऊपर भी उठ जाता हैं। नाखून के अगले सिरे के नीचे छिलकों का एक धूसर रंग का ढेर सा दिखता हैं। नाखून बाद में खुरदरा और भंगुर होता चला जाता हैं।

लक्षण

नाखून में संक्रमण मंडल (सोरायसिस) रोग में भी होता हैं , परन्तु दोनों में अंतर हैं। यदि फफूंदी का संक्रमण हैं , तो नाखून आगे से पीछे की ओर बढ़ता हैं। मंडल रोग के कारण नाखून में होने वाली विकृति में नाखून विवर्ण , मोटा व गढ़े प्रकार का होता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • नाखून में सुहागे का चूर्ण भर दें।
  • एक चमच्च त्रिफला चूर्ण रात को सोते समय पानी के साथ लें व त्रिफला के पानी से नाखून धोएं।
  • नींबू का रस नाखूनों पर रगडें।
  • यदि मंडल के कारण नाखूनों में विकृति हो , तो मंडल चिकित्सा के अंतर्गत वर्णित दवा का प्रयोग करें।

सफ़ेद दाग

कारण

शरीर पर सफ़ेद चकतों के रूप में दिखने वाला यह रोग हैं। इसमें शरीर के वे अंग जहां चकते है , बाद में जाकर शून्य हो जाते हैं।

त्वचा की कोशिकाओं में रंजक तत्व मेलेनिन की न्यूनता होने से यह रोग होता हैं। आयुर्वेद में इसका श्वित्र के नाम से उल्लेख आया हैं। सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरण इस रोग की उत्पत्ति में सहायक होती हैं। आनुवांशिक रूप से भी इस रोग की प्रवृत्ति पाई जाती हैं। रक्त में ताम्बे की कमी भी इस रोग की उत्पत्ति में मुख्य कारणों में से हैं।

लक्षण

शरीर के किसी भी भाग की त्वचा सफ़ेद रंग की हो जाती हैं।

घरेलू चिकित्सा

इस रोग में खटाई का पूर्णतः परहेज करें तथा धुप से बचे। नमक रहित भोजन से जल्दी आराम मिलता हैं।

  • बावची के तेल की 10 बूँद बताशे में डालकर सुबह खाली पेट रोगी को खिलाएं।
  • अंजीर के पत्तों का रस सुबह – शाम लगाएं।
  • करेले का 4 – 4 चमच्च रस सुबह – शाम लें।
  • कलौंजी के बीज को पानी में पीसकर प्रभावित स्थान पर लेप करें।
  • आंवले का रस 4 – 4 चमच्च सुबह – शाम लें या आंवले का चूर्ण 2 – 2 चमच्च सुबह – शाम लें।
  • आधा – आधा चमच्च चन्दन का चूर्ण सुबह – शाम एक – एक चमच्च की मात्रा में दूध या पानी के साथ लें।
  • सूरजमुखी का तेल सुबह – शाम एक – एक चमच्च की मात्रा में पिएं।
  • नीम का तेल और चालमोंगरा का तेल समान मात्रा में मिलाकर रख लें और प्रभावित स्थान पर सुबह – शाम लगाएं।
  • कुटज की छाल का चूर्ण 1 – 1 चमच्च सुबह – शाम लें।
  • सहिजन या करेले जैसी कड़वे स्वाद वाली सब्जियों का प्रयोग करें।

घरेलू चिकित्सा

सोमराजी योग , सोमराजीबीज घृत , बाकुचीहरीतकी चूर्ण , बाकुच्यादिवटी तथा कुष्ठराक्षस तेल का उपयोग किया जा सकता हैं।

पेटेंट औषधियां

पिगमैन्टों गोलियां (चरक) , आमलकी रसायन (वैद्यनाथ)।

 

 

मंडल रोग

कारण

भावनात्मक उद्दीपन के कारण शरीर में रक्त की अशुद्धि होने से यह रोग हो जाता हैं।

लक्षण

बाहरी वस्तुओं के संपर्क में अधिक आने वाले कोहनी , घुटने , कमर व पीठ आदि अंगों पर स्पष्ट किनारों वाला , ऊपर उठे हुए छोटे – छोटे दानें निकलते हैं , जिन पर सफ़ेद रंग का छिलका होता हैं। ये सूखे से एवं लाल रंग के होते हैं। आकार में धीरे – धीरे बढ़ते हुए इसका व्यास लगभग 3 से.मी. तक हो जाता हैं। आकार में बढ़ते जाने से आसपास के दाने मिलकर जाल की तरह दिखते हैं। ये प्रायः शरीर के दोनों ओर आमने – सामने निकलते हैं। आकार में गोल होने के कारण ही आयुर्वेद में इस रोग को मंडल के नाम से कहा गया है। जहां – जहां चकते बनते हैं , वहाँ बाल नहीं रहते।

घरेलू चिकित्सा

1 – 1 चमच्च कुटे हुए कुटकी व चिरायता लेकर चीनी मिट्टी या कांच के बर्तन में एक कटोरा पानी में रात को भिंगो दें। सुबह पानी निथार कर व छानकर पी लें। पुनः उस पात्र में अगले दिन के लिए पानी डाल दें। एक बार का डाला चिरायता व कुटकी चार दिन तक प्रयोग करें व चार दिन के बाद उसे फेंक दें। इस प्रकार हर चार दिन बाद दवा बदलते रहे। लगभग दो माह के प्रयोग से रोग ठीक हो जाएगा।

  • गोपाल कर्कटी के फल को पीसकर उसका रस लगाएं।
  • बादाम को पीसकर थोड़े से गर्म पानी में इतना उबालें कि वह चटनी की तरह गाढा हो जाए। इसे रात को सोते समय लगाएं व सुबह उठकर धो लें।
  • नींबू का रस लगाएं।
  • एक चमच्च चन्दन का चूर्ण एक गिलास पानी में उबालें। एक तिहाई रह जाने पर इसे उतार लें व ठंडा होने के बाद एक चमच्च गुलाब जल मिलाकर पिएं। ऐसी एक मात्रा दिन में तीन बार सेवन करें।
  • करेला , सहिजन , नीम के फूल आदि स्वाद में कडवे आहार द्रव्यों का प्रयोग करें। नमक , दही , मिर्च – मसालों का परहेज करें।

आयुर्वेर्दिक औषधियां

कुष्ठराक्षस तेल , गुग्गुल तिक्क्तक घृत , चित्रक गुटी , राजराजेश्वर रस , चित्रकादि लेप , गन्डौरादि लेप का प्रयोग इस रोग में सफलतापूर्वक किया जा सकता हैं।

 

कुष्ठ

कारण

यह रोग माइक्रोबैक्टीरियम लेप्री नामक जीवाणु के संक्रमण से फैलता हैं। शरीर में प्रविष्ट होने के तीन – चार वर्ष बाद इसका संक्रमण त्वचा में प्रकट होता हैं। रोग का जीवाणु रोगी के रोगग्रस्त भाग में तथा नाक के स्राव में पाया जाता हैं।

लक्षण

प्रारम्भ में रोगी के शरीर के विभिन्न भागों में खुजली होने लगती हैं। धूप में जाने या थोड़ी मेहनत करने पर त्वचा में जलन होने लगती हैं। धीरे – धीरे त्वचा सुन्न होने लगती हैं तथा उसमें लाल – लाल चकते बनने लगते हैं , जिनमें से मवाद निकलने लगती हैं। बाद में इस जगह पर घाव बन जाते हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • शंखपुष्पा का अर्क 6 – 7 चमच्च की मात्रा में दिन में तीन बार रोगी को दें।
  • मेहंदी के 20 ग्राम पत्ते रात को पानी में भिंगो दें। सुबह अच्छी तरह से पत्तों को मसलकर छान लें और शहद मिलाकर रोगी को खाली पेट खिलाएं।
  • एक भाग मीठा तेलिया व दो भाग काली मिर्च लें। इन दोनों के बराबर काली हरड़ लें। काली हरड़ के बराबर ही चित्रक की छाल लें। इनको बारीक पीसकर इसमें थोड़ा सा गाय का घी मिला लें। अब इसमें चार गुना शहद मिलाकर अवलेह बना लें। एक चमच्च दवा खाली पेट गुनगुने पानी के साथ रोगी को दें।
  • काले तिल व बावची के बीजों की मींगी का चूर्ण बराबर मात्रा में कूटकर रख लें। एक – एक चमच्च चूर्ण सुबह – शाम बराबर की मात्रा में शहद के साथ लें।
  • गिलोय का 2 चमच्च रस खाली पेट रोगी को दें। फिर थोड़ी देर बाद 2 चमच्च काले तिल रोगी को चबाने को दें। ऊपर से मिसरी मिला हुआ पाव भर दूध रोगी को पिलाएं।
  • तुलसी की 10 – 15 ताजी पत्तियां पीसकर आधा पाव दही में मिलाकर सुबह – शाम रोगी को खिलाएं। दही के विकल्प के रूप में 4 चमच्च शहद का प्रयोग किया जा सकता है।
  • काली मिर्च , आंवला , गोमूत्र में शुद्ध की हुई बावची , हरड़ की छाल व बहेड़े की छाल प्रत्येक एक भाग तथा नीम के पत्ते , फूल, जड़ व बीज प्रत्येक दो भाग लें। सबको पीसकर , छानकर लें। एक – एक चमच्च दवा प्रातः व सांय चार चमच्च मंजिष्ठादि क्वाथ के साथ दें।
  • रोगी को करेला , जिमीकंद , बथुआ व लहसुन का प्रयोग अधिक कराएं। खटाई व मीठे का पूर्णतः परहेज कराएं।
  • नीम व चालमोंगरा का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें व सुबह – शाम घावों पर लगाएं।
  • केले की जड़ को सुखाकर व जलाकर पीस लें। 1 ग्राम यह दवा एक चमच्च शहद मिलकर सुबह – शाम लें।

 

 

 

एग्जिमा

कारण

किसी भी द्रव्य के प्रति शरीर में असात्म्यता (एलर्जी) उत्पन्न होने से यह रोग होता हैं। तनाव , चिंता आदि मानसिक विकार भी इस रोग की उत्पत्ति में सहायक कारण हैं। आनुवांशिक रूप में भी यह रोग पीढी दर पीढी चलता हैं। धुप , साबुन , ऊनी या सिंथेटिक कपड़ों से भी एलर्जी उत्पन्न होता हैं।

लक्षण

खुजली व दानें पड़ना , दोनों ही मुख्य रूप से इस रोग के लक्षण हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • पके केले के गूदे को नींबू के रस में पीसकर दानों पर लगाएं।
  • कटहल के पत्तों को पीसकर लेप करें।
  • तुलसी की 20 पत्तियां सुबह खाली पेट चबाएं।
  • पाव भर सरसों का तेल लोहे की कड़ाही में उबालें। जब उबलने लगे , तो उसमें 50 ग्राम नीम की कोंपलें डाल दें। जब नीम की कोंपलें जलकर काली पड़ जाएं , तो कड़ाही उतार लें व तेल को छानकर रख लें। दिन में 2 – 3 बार यह तेल लगाएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

सिंदूरादि तेल , दूर्वादि तेल , हरिद्रादि तेल , मरिचादि तेल , गंधक पिष्टी तेल व तुम्बरू आदि चूर्ण का स्थानीय प्रयोग इस रोग में करते हैं।

Facebook Comments

About admin

आपने कीमती समय देकर ब्लॉग पढ़ा धन्यबाद, ये पोस्ट आपको पसंद आया हो तो शेयर करना न भूले, ताकि इसे ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें, अपना विचार जरूर लिखे, इससे हमें और ज्यादा अच्छी और लेटेस्ट जानकारियाँ लिखने के लिए प्रेरित करेगा.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *