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बहुरूपिया राजगुरू

विजयनगर राज्य में तेनालीराम की लोकप्रियता से राजगुरू बहुत उद्विग्न थे। हर रोज उन्हें तेनालीराम के कारण शर्मसार होना पड़ता था और नित्यप्रति ही राज दरबार में उनकी हंसी उड़ाई जाती थी।

वैसे भी यह दुष्ट कई बार महाराज के मृत्युदंड से भी बच निकला हैं। इससे छुटकारा पाने का केवल एक ही उपाय हैं कि मैं इसे अपने हाथों से ह्त्या कर दूं।

फिर राजगुरू ने अपनी कार्य योजना को अंतिम रूप दिया और कुछ दिनों के लिए तीर्थयात्रा के बहाने विजयनगर छोड़कर कहीं चला गया और एक जाने माने बहुरूपिये से रूप बदलने का प्रक्षिक्षण लेने लगा।

कुछ समय में वह एक कुशल बहुरूपिया बन गया और सारे करतब दिखाने में प्रवीण हो गया।

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एक दिन में राजदरबार में उपस्थित होकर उसने राजा से कहा कि वह तरह – तरह के कई करतब दिखा सकता हैं।

राजा कृष्णदेव ने पूछा, तुम्हारा सबसे अच्छा कौन सा स्वांग कर लेते हो ?

महाराज मैं शेर का स्वांग सबसे अच्छा कर लेता हूँ, लेकिन उसमें किसी के घायल होने का ख़तरा रहता हैं और व्यक्ति मर भी सकता हैं। इस स्वांग के लिए आपको मुझे एक खून माफ़ करना पड़ेगा। बहुरूपिये राजगुरू ने महाराज से कहा।

महाराज ने उसकी यह शर्त मान ली और स्वांग दिखाने के लिए कहा।

मेरी एक और शर्त हैं, महाराज ! मेरे स्वांग दिखाते समय तेनालीराम भी दरबार में अवश्य उपस्थित रहे। बहुरूपिये राजगुरू ने कहा।

ठीक हैं, हमें तुम्हारी यह शर्त भी स्वीकार हैं। महाराज ने कुछ सोचकर उत्तर दिया।

बहुरूपिये की यह शर्त सुनकर तेनालीराम का माथा ठनक गया। उसे लगा कि यह अवश्य उसका कोई शत्रु हैं, जो स्वांग रचने के बहाने के बहाने उसकी ह्त्या करना चाहता हैं।

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अगले दिन यह स्वांग होना था। तेनालीराम अपने कपड़ों के नीचे कवच पहनकर आया ताकि कोई गड़बड़ हो, तो उसके शरीर की रक्षा हो सके।

अगले दिन स्वांग शुरू हुआ। बहुरूपिये की कला का प्रदर्शन देखकर सभी दंग थे।

कुछ देर तक उछल कूद करने के बाद अचानक वह बहुरूपिया तेनालीराम के पास जा पहुंचा और उस पर झपट पड़ा।

तेनालीराम तो पहले से ही तैयार होकर आया था। उसने धीरे से अपने हाथों के नाखूनों से उस पर वार कर दिया। अब तो दर्द से तिलमिलाता हुआ वह बहुरूपिया जमीन पर जा गिरा। तेनालीराम पर हुए इस अनायास आक्रमण से राजा कृष्णदेव भी अचानक से घबरा गए अगर सचमुच में तेनालीराम को कुछ हो जाता, तो ? फिर उन्हें बहुरूपिये की शर्त का ध्यान आ गया।

एक खून को माफ़ करना और तेनालीराम का दरबार में उपस्थित रहना। अवश्य ही दाल में कुछ काला हैं। अवश्य ही तेनाली से शत्रुता रखने वाला कोई व्यक्ति हैं।

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फिर उन्होंने तेनालीराम को अपने पास बुलाकर पूछा, तुम ठीक तो हो न ? कहीं चोट तो नहीं लगी ? महाराज की वाणी में चिंता स्पष्ट रूप से झलक रही थी।

तभी तेनालीराम ने अपने वस्त्रों के नीचे पहना कवच दिखा दिया जिससे उसके शरीर पर खरोंच तक नहीं आयी थी।

फिर महाराज ने तेनालीराम से पूछा, क्या तुम्हें इस व्यक्ति पर शुरू से ही संदेह था या तुम कवच यूं ही पहन कर आये थे ?

महाराज, अगर इस बहुरूपिये की नीयत साफ़ होती तो यह दरबार में मेरी उपस्थिति की शर्त न रखता। तेनालीराम ने महाराज को समझाते हुए कहा।

महाराज बोले, इस दुष्ट को तो मैं कठोर दंड दूंगा। इसने तुम्हारे प्राण लेने की चेष्टा की हैं। मैं इसे अभी सजा – ए मौत दे सकता हूँ लेकिन मेरी इच्छा हैं कि तुम स्वयं इस बात का बदला लो।

जी हाँ, महाराज ! मैं स्वयं ही इससे निपटूंगा। तेनालीराम ने गंभीरता ओढ़ते हुए कहा।

बस भला कैसे ? हमें भी कुछ मालूम हो।

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बस आप देखते रहिये। तेनालीराम ने निश्चिततापूर्वक  कहा।

फिर तेनालीराम बहुरूपिये से कहा, महाराज, तुम्हारी कला से बहुत प्रसन्न हैं। वह चाहते हैं कि कल तुम सती होने का स्वांग दिखाओ, अगर उसमें भी तुम सफल हो गए, तो महाराज की और से तुम्हें पुरस्कार में दस हजार स्वर्ण मुद्राएं भी दी जाएँगी।

बहुरूपिया का वेश धरे राजगुरू ने मन ही मन विचार किया कि इस बार तो बहुत बुरे फंसे, अब तो स्वांग दिखाए बिना यहाँ से पीछा छूटने वाला नहीं था।

फिर सती के स्वांग की तैयारी शुरू हो गयी। तेनालीराम ने एक कुंड बनवाया और उसमें बहुत सी लकड़ियाँ डालकर उनमें अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी गयी।

 

राजवैद्य को भी बुलवा लिया गया ताकि तुरंत उपचार की आवश्यकता पड़े, तो उनकी सहायता ली जा सके।

बहुरूपिया सती का वेश धारणकर सभा में उपस्थित हुआ। उसका पहनावा इतना मोहक था कि कोई नहीं कह सकता था कि वह वास्तविक में स्त्री नहीं हैं।

आखिरकार इस बहुरूपिये को जलते हुए कुंड में बैठना ही पड़ा। कुछ ही क्षणों में उसका सारा शरीर अग्नि से झुलसने लगा।

मगर तेनालीराम से यह दृश्य देखा न गया। उसे बहुरूपिये पर दया आ गयी। और उसने बहुरूपिये को उस अग्निकुंड से तुरंत बाहर निकाल लिया।

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कुंड से बाहर निकलकर राजगुरू एकदम असली रूप में आ गया और बारम्बार तेनालीराम से क्षमा याचना करने लगा।

तेनालीराम ने भी हँसते हुए उसे माफ़ कर दिया और उपचार के लिए राजवैद्य के हवाले कर दिया।

राजवैद्य के उपचार के बाद जब राजगुरू स्वस्थ हो गए तो उन्होंने तेनालीराम से कहा, आज के बाद मैं कभी तुम्हारे लिए अपने मन में शत्रुता के विचार नहीं लाऊंगा। तुम्हारी उदारता ने मुझे जीत लिया हैं। आज से हम दोनों अच्छे मित्र बन गए हैं। जो एक – दुसरे के सुख – दुःख में साथ निभायेंगे।

फिर तो तेनालीराम ने राजगुरू को अपने गले से लगा लिया।

और इस घटना के बाद फिर कभी राजगुरू और तेनालीराम के बीच कटुता नहीं व्यापी। दोनों सच्चे मित्रों की भाँति रहने लगे।

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