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बगीचे की सिंचाई – हिंदी कहानी

एक बार विजयनगर राज्य में भीषण अकाल पड़ गया। चारों और त्राहि – त्राहि मची थी। फसलें सूख गयी थी। हरियाली का कहीं नामो – निशान नहीं था। वर्षा थी कि होने का नाम नहीं ले रही थी।

विजयनगर राज्य में तेनालीराम का घर तुंगभद्रा नदी के किनारों पर था। उसका बगीचा भी बिलकुल सूख गया था। हालांकि बगीचे के बीचोबीच एक कुआं था। लेकिन उसका जल – स्तर काफी नीचे गिर गया था जिससे कि उससे सिंचाई करने में बहुत ज्यादा धन खर्च हो जाता। सच बात तो यह थी कि यह खर्च बाग़ से होने वाली आमदनी से कहीं ज्यादा था।
एक दिन वह शाम को कुएं के पास बैठा सोच रहा था कि बाग़ की सिंचाई करने के लिए मजदूर लगाए जाएं या नहीं।

तेनालीराम का बेटा भी उसके पास ही बैठा था। तभी उसकी निगाह एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी, जो बड़े ध्यान से उसके मकान की और देख रहे थे। उसने मन में सोचा, सारे रास्तों का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं।

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तभी तेनालीराम ने ऊंचे स्वर में अपने पुत्र से कहा, बेटा राज्य में भीषण काल अकाल के दिन हैं। चोर, डाकू बहुत घूम रहे हैं। अब रत्नों से भरा यह कीमती संदूक घर में रखना ठीक नहीं हैं। चलो इस संदूक को इस कुएं में डाल दें। ताकि उसे कोई सहज ही नहीं चुरा सके। भला कोई कैसे जान पायेगा कि रत्नों से भरा एक संदूक कुएं में पड़ा हो सकता हैं।

इतना कहकर वह अपने बेटे के साथ मकान के अन्दर प्रवेश कर गया और हंसकर बोला, आज इन चोरों को कुछ ठीक ढंग से मेहनत करने का अवसर मिलेगा।

फिर पिता, पुत्र दोनों ने मिलकर एक संदूक में बहुत सारे पत्थर भरे और उसे उठाकर कुएं में फेंक दिया। संदूक को कुएं में डालने से काफी जोर से धम्म की आवाज हुई।

तेनालीराम ने फिर से ऊंचे स्वर में अपने पुत्र से कहा, अब हमारे कीमती रत्न बिलकुल सुरक्षित हैं।

वहाँ पर छिपे खड़े चोर मन ही मन मुस्कुराए और जैसे ही तेनालीराम और उसके पुत्र मकान में गए, वे चोर अपने काम में पूरी लगन से जुट गए।

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घंटों वे अपना पसीना बहाकर कुएं से पानी बाहर निकालते रहे। तभी तेनालीराम और उसका बेटा दोनों ही मकान के पिछले दरवाजे से बाग़ में जा पहुंचे और कुएं से निकले पानी को बगीचे की नालियों में काटने लगे। चोरों ने कुएं से इतना पानी निकाल दिया था कि बाग़ के लगभग हर पेड़ की सिंचाई हो सके।

जब वे चोर कुएं में से इतना पानी निकालने में सफल हो गए कि संदूक को उठाकर बाहर निकाला जा सके, तब तक सुबह होने को आ गयी थी। अब चोरों ने निर्णय किया कि पहले इस संदूक को खोलकर क्यों न देख लिया जाए। जब उन चोरों ने संदूक को खोलकर देखा तो उसमें रत्न नहीं बल्कि पत्थर  भरे थे, तो वे अपना सिर धुनकर रह गए और पछताने लगे कि आज तो वे मूर्ख बन गए। अब सुबह होने को आई कहीं पकड़े भी न जाए और वे दुम दबाकर वहाँ से भाग निकले।

सुबह जब तेनालीराम राजदरबार में पहुंचा तो रात वाली घटना से राजा कृष्णदेव को अवगत कराया। तेनालीराम के मुख से समूचा वृतांत सुन लेने पर राजा बहुत जोर से हँसे और बोले, तुम्हारी चतुरता का कोई जवाब नहीं हैं तेनालीराम।

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