Home / ज्ञानवर्धक कहानियाँ / बाढ़पीड़ितों की सहायता
baadh piriton ki sahayta
baadh piriton ki sahayta

बाढ़पीड़ितों की सहायता

एक बरस राजा कृष्णदेव के राज्य में भीषण वर्षा हुई। चारों ओर भीषण तबाही मच गयी। अनेक घर ढह गए। सैंकड़ों पशु भी बाढ़ की चपेट में आ गए। राजा कृष्णदेव को इस घटना की खबर मिली। उन्होंने तत्काल मंत्री को बुलाकर आदेश दिया कि तुरंत बाढ़पीड़ितों की सहायता की जाए और बाढ़ से घिरे लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया जाए। उनके रहने खाने और चिकित्सा का समुचित प्रबंध किया जाए। नदी नालों पर बने जो पुल ढह गए उन्हें फिर से बनाया जाए।

वह मंत्री तुरंत अगले दिन शाही खजाने से मोटी रकम निकालकर बाढ़पीड़ितों की सहायता के काम में जुट गया।

बहुत दिनों तक उस मंत्री के बारे में कोई सूचना न मिली।

राजा ने सोचा राहत का कार्य जोर शोर से चल रहा हैं इसलिए मंत्री को हमारे पास आने के लिए समय नहीं मिल पा रहा होगा। उधर तेनालीराम भी राहतकार्य से बेखबर नहीं था।

कुछ दिन बाद जब वह मंत्री दरबार में उपस्थित हुआ तब उसने खूब बढ़ा – चढ़ाकर अपनी प्रशंसा के पुल बाँधने शुरू कर दिए।

दरबार का विसर्जन हुआ तो राजा कृष्णदेव ने तेनालीराम से कहा, देखा तेनालीराम हमारे मंत्रीजी का कमाल। कितने कम समय में ही बाढ़पीड़ितों के दुःख को दूर कर दिया।

महाराज ! आपकी बात तो ठीक हैं लेकिन आप भी चलकर राहत कार्य का निरीक्षण कर लें। तेनालीराम ने राजा को सलाह दी।

राजा कृष्णदेव ने भी प्रसन्नता में बहते हुए इस बात के लिए अपनी रजामंदी प्रकट कर दी। और अगले ही दिन राजा कृष्णदेव और तेनालीराम घोड़ों पर सवार होकर राहत कार्यों का निरीक्षण करने चल दिए।

उस रास्ते में ही राजा का निजी बाग़ भी पड़ता था। राजा ने जब अपने बाग़ की ओर दृष्टि दौड़ाई तो देखा कि बहुत से पेड़ उस बाग़ से कटे हुए हैं। वह अपने बाग़ में पहुंचे और तेनालीराम से पूछा, यह पेड़ किसने काटे हैं ?

शायद तेज आंधी में टूट गए महाराज ! तेनालीराम ने उत्तर दिया।

लेकिन कृष्णदेव उसकी राय से संतुष्ट न हुए। दोनों जैसे ही एक नाले के पास पहुंचे तो एक जगह पुल के नाम पर कटे हुए पेड़ों के मोटे तने रखे देखे।

अरे क्या ये ही पुल बनाए गए हैं, इतना धन खर्च करके। ये पेड़ों के तने भी मुझे शाही बाग़ के दिखाई दे रहे हैं ?

छोटी मुंह बड़ी बात। महाराज ! मैं भला क्या कह सकता हूँ। ज़रा और आगे चलिए वहाँ का हाल भी देख ही लेते हैं।

मगर वहाँ भी वही हाल था। फिर राजा कृष्णदेव और तेनालीराम एक गाँव में पहुंचे, उस गाँव का आधा भाग अभी भी डूबा हुआ था। कई लोग ऊंची खुली जगह पर जीवन बसर कर रहे थे।

उन्हें देखते ही तेनालीराम चौंकता हुआ बोला, देखिये महाराज ! मंत्रीजी ने इन्हें बाढ़ से बचाकर खुले और ऊंचे जगह में पहुंचा दिया। भला इससे अच्छी सहायता उनके लिए और क्या हो सकती हैं। फिर उन्हें कुछ लोग ऐसे भी दिखाई दिए जो पेड़ों पर मचान बनाकर भी रह रहे थे।

यह सब देखकर राजा कृष्णदेव का क्रोध सांतवे आसमान पर पहुँच गया। उन्हें यह एहसास हो गया था कि मंत्री राजकीय कोष के सारे धन को स्वयं ही डकार गया था। वहाँ से लौटकर राजा मंत्री को दरबार में बुलवाया और उसे डांटते हुए कहा। जो पैसा तुमने हजम किया हैं या तो सीधी तरह बाढ़पीड़ितों की सहायता में लगा दो, अन्यथा जेल की हवा खाने को तैयार हो जाओ। और हाँ इस बार तुम जो भी कार्य करोगे उसकी निगरानी तेनालीराम करेंगे।

मंत्री राजा के मुख से ये बात सुनकर समझ गया कि ये सारी कारिस्तानी तेनालीराम की हैं अब वह कुछ नहीं कर सकता था क्यूंकि महाराज स्वयं उसकी करतूतों को अपनी आँखों से देख चुके थे।

फिर उसने जो पैसा हजम किया था उससे तेनालीराम की देखरेख में बाढ़पीड़ितों की सहायता करने में ही अपनी भलाई समझी।

About admin

आपने कीमती समय देकर ब्लॉग पढ़ा धन्यबाद, ये पोस्ट आपको पसंद आया हो तो शेयर करना न भूले, ताकि इसे ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें, अपना विचार जरूर लिखे, इससे हमें और ज्यादा अच्छी और लेटेस्ट जानकारियाँ लिखने के लिए प्रेरित करेगा.

Check Also

उद्यान में गायें – Hindi Kahani

विजयनगर के राजा कृष्णदेव नित्य सुबह – सवेरे अपने शाही उद्यान में टहलने जाया करते …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *