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गुण – दृष्टि और दोष

गुण और दोष को सम्मुख पाकर गुण पर ही दृष्टि डालना चाहिए , दोषों पर नहीं।

गुणों को देखने से शनैः – शनैः मनुष्य में गुण दृष्टि का विकास हो जाता हैं और दोषों को देखने से वह दोष – दृष्टिसंपन्न हो जाता हैं। गुण – दृष्टिसंपन्न के लिए चतुर्दिक गुणवान ही गुणवान होंगे और दोष – दृष्टिसंपन्न के लिए चतुर्दिक दोषी ही दोषी दिखाई देंगे।

 

कौरव – पाण्डव कुमारों की शिक्षा लगभग पूरी हो चुकी थी। एक दिन गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को अपने पास बुलाया और उसे एक कागज़ और एक कलम देते हुए कहा – युधिष्ठिर ! नगरी में जाओ और बुरे व्यक्तियों के नामों की एक तालिका बनाकर लाओ।

 

युधिष्ठिर के जाने के बाद गुरु द्रोण ने दुर्योधन को अपने पास बुलाया और उसे भी एक कागज़ और एक कलम थमाते हुए कहा – ‘ वत्स ! तुम नगर में चले जाओ और नगर के सभी अच्छे लोगों के नाम इस कागज़ पर लिख लाओ।

दुर्योधन भी नगर में चला गया।

 

संध्या समय , युधिष्ठिर और दुर्योधन दोनों लौटे | लेकिन यह क्या ? दोनों के हाथों में कोरे कागज़ थे। गुरु द्रोण ने पहले दुर्योधन से प्रश्न किया – ‘क्यों वत्स ! कागज़ कोरा ही ले आये हो ?

 

दुर्योधन बोला – हाँ गुरुदेव ! मुझे पूरे नगर में एक भी अच्छा आदमी नहीं मिला। सभी में कुछ न कुछ दुर्गुण थे।

 

तत्पश्चात  गुरु द्रोण ने युधिष्ठिर से उसके कोरे कागज़ के बारे में जानना चाहा। युधिष्ठिर बोले – गुरुदेव ! मुझे तो पूरे नगर में एक भी बुरा व्यक्ति नहीं मिला। प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई गुण मौजूद था।

गुरु द्रोण ने अपने ह्रदय में ही कहा – वाह ! युधिष्ठिर तुम ही हस्तिनापुर के योग्य अधिकारी हो।

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